Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 55

उन्नति का मूल मंत्र-सेवा और प्रेम

38 सूत्र

साधु पुरुष की सम्पत्ति थोड़ी भी हो तो भी दूसरों के काम आती है किन्तु दुष्ट की विपुल सम्पत्ति भी किसी के काम नहीं आती है।
दान
भविष्य चाहे जितना भी सुखद हो, उस पर विश्वास न करो, भूतकाल की भी चिंता न करो, हृदय में उत्साह भर कर और ईश्वर में विश्वास कर वर्तमान में कर्मशील रहो।
पुरुषार्थ
अभ्यास की शक्ति तो देखो–निरन्तर अभ्यास से किसी विषय का अज्ञ उस विषय का ज्ञाता हो जाता है, पर्वत भी धीरे–धीरे घिसकर चूर्ण बन जाता है और बाण भी अपने सूक्ष्म लक्ष्य तक पहुँच जाता है। मनुष्य जिस–जिस वस्तु का लगातार चिन्तन करता है, अभ्यास वश उसी–उसी की ओर मन का झुकाव हो जाता है।
पुरुषार्थ
बुरे स्वभाव से अपने लिए नरक न बनाए। अपने स्वभाव से दूसरों के लिए स्वर्ग बनाए।
चरित्र
मूर्ति की तरह अपने आप को सुन्दर बनाओ रुको मत।
चरित्र
आयु का एक क्षण भी संसार के सब रत्नों के बदले भी नहीं पाया जा सकता है, उस आयु को यदि कोई व्यर्थ में खोता है, तो अहो! बड़ा भारी प्रमाद है।
समय
आलोचना की उपेक्षा कर पूर्ण शक्ति से उत्तम कार्य करो।
पुरुषार्थ
जो व्यक्ति छोटे कामों को ईमानदारी से करता है, वही बड़े कामों को ईमानदारी से कर सकता है।
चरित्र
हमें अपने आपको नहीं, अपने उत्तर दायित्वों को गंभीरता से लेना चाहिए।
चरित्र
जिनके हृदय में उत्साह होता है, वे पुरुष कठिन से कठिन कार्य आ पड़ने पर भी हिम्मत नहीं हारते हैं।
पुरुषार्थ
उत्साह ही प्राणियों को सब कामों में सदा प्रवृत्त करता है।
पुरुषार्थ
अपने को प्रकट किए बिना उपकार करना, छोटों को क्षमा कर देना, बिना माँगे देना, गुणों से प्रेम करना, बहुतों में से कुछ ही लोग जानते हैं।
दान
जैसे चन्द्रमा चाण्डाल को भी चाँदनी देता है वैसे ही सज्जन पुरुष गुणहीन प्राणियों पर भी दया करते हैं।
दान
दीन दु:खी एवं पीड़ित बंधुओं की सेवा करने में जो गौरव युक्त आनंद मिलता है, वह सभ्य समाज की दावतों में नहीं प्राप्त होता है।
दान
बिना उत्साह के कोई महान् उपलब्धि कभी नहीं हुई है।
पुरुषार्थ
उन्नति का मूल मंत्र, सेवा और प्रेम है न कि आज्ञा और बल प्रयोग।
दान
महापुरुषों के प्रति सद्भाव पूर्ण उपकार शीघ्र ही फल देता है।
दान
तलवार मारे एक बार, अहसान मारे बार–बार।
दान
पुत्र को सभा में अग्रिम स्थान में बैठने योग्य बनाना पिता का सबसे बड़ा उपकार होगा।
परिवार
तृण तुल्य भी उपकार क्यों न हो, उसके फल को समझने वाले उसे ताड़ के समान मानेंगे।
दान
उपदेश करो अपने लिए, तभी तुम्हारा उपदेश सार्थक होगा। जो दूसरों से करवाना चाहते हो, उसे पहले स्वयं करो; नहीं तो तुम्हारा उपदेश नाटक के अभिनय के सिवा और कुछ भी नहीं है।
चरित्र
कोई भी अक्षर अमंत्र नहीं है। कोई भी वृक्ष मूल अनौषध नहीं है। कोई भी पुरुष अयोग्य नहीं है। केवल उनके जानने वाले मनुष्य दुर्लभ होते हैं।
ज्ञान
लोक की हँसी सहने वाले ही लोक का निर्माण करते हैं।
पुरुषार्थ
अच्छे लोग दूसरों के सन्ताप से सन्तप्त रहते हैं, यही उनके लिए परमात्मा की सर्वोच्च आराधना है।
दान
करुणा से आर्द्र हृदय वाले व्यक्ति सभी के अकारण बंधु होते हैं।
दान
हमारी उन्नति का एक मात्र उपाय यह है कि हम पहले वह कर्त्तव्य करें जो हमारे हाथ में है और इस प्रकार धीरे–धीरे शक्ति संचय करते हुए क्रमश: हम सर्वोच्च अवस्था को प्राप्त कर सकते हैं।
पुरुषार्थ
मानव की वाणी की अपेक्षा उसका कर्म अधिक अच्छा नेतृत्व कर सकता है।
चरित्र
यह एक बात है कि किसी व्यक्ति को यह दिखाया जाये कि वह गलती पर है और यह दूसरी बात है कि उसे सत्य प्राप्त करा दिया जाये।
ज्ञान
धन, यश कमाने वाला नहीं, प्राणिमात्र के प्रति करुणा के भाव से जो चिकित्सा करता है, वह महान् है।
दान
धर्म और देश के लिए जीवित रहना ही यथार्थ जीवन है।
धर्म
वे जिनके हृदय में सदैव परोपकार की भावना रहती है उनकी आपदाएँ समाप्त हो जाती हैं और पग–पग पर धन की प्राप्ति होती है।
दान
करुणा करने वालों का शरीर परोपकारों से शोभा पाता है, चन्दन से नहीं।
दान
परोपकार के लिए मरने का सौभाग्य तो संस्कार वालों को ही प्राप्त होता है।
दान
जो दूसरों की भलाई करना चाहता है, उसने अपना भला तो कर ही लिया है।
दान
भलाई करना कर्त्तव्य नहीं आनन्द है क्योंकि वह तुम्हारे स्वास्थ्य और सुख में वृद्धि करती है।
दान
जो मेरे साथ भलाई करता है, वह मुझे भला होना सिखा देता है।
दान
जो मनुष्य दुष्ट से धन लेकर सज्जन को देता है, वह स्वयं को नाव बना कर दोनों को पार लगा देता है।
दान
डूबने वाले के साथ सहानुभूति का अर्थ यह नहीं कि उसके साथ डूब जाओ बल्कि तैरकर उसे बचाने का प्रयास करो।
दान