पहला सुख निरोगी काया, दूसरा सुख घर में हो माया, तीसरा सुख सुत आज्ञाकारी, चौथा सुख मृदुभाषी पतिव्रता नारी, पाँचवा सुख-सदन हो घर का, छठवाँ सुख कर्ज न हो पर का, सातवाँ सुख चले व्यापार, आठवाँ सुख सबको हो प्यार, नौवाँ सुख निराकुलता हो मन में, दसवाँ सुख न हो वैर-विरोध जीवन में, ग्यारहवाँ सुख मन लगे धर्म में, बारहवाँ सुख न फँसे कुकर्म में, तेरहवाँ सुख हो साधु समागम, चौदहवाँ सुख मर्मज्ञ जिनागम, पन्द्रहवाँ सुख जैन शील व्रतधारी, सोलहवाँ सुख हो अरिहंत पुजारी, ये सब पाय बने गृह त्यागी धन्य-धन्य वे नर अवतारी, इस भव साधु संत कहलावे, परभव सुरग मुक्ति पद पावे, नर भव सुकुल सफल जिनवाणी, बार-बार नहीं पावें प्राणी, करते 'प्रार्थना' धर्म कमावो, बार-बार नहीं नर तन पावो। संतोष 0 – भेजें
सुख भोगने के लिए स्वर्ग है तथा दुःख भोगने के लिए नरक है और सुख-दुःख दोनों से ऊँचे उठकर महान् आनन्द प्राप्त करने के लिए यह मनुष्य लोक है। धर्म 0 – भेजें
जो सूर्योदय के बाद भी सोये रहते हैं–उनका भाग्य भी सो जाता है और जो सूर्योदय के पूर्व उठते हैं, वे सूरज से चमकते हैं। पुरुषार्थ 0 – भेजें
हाथ की रेखाएँ टेढ़ी देखकर निराश मत होइए, अपने नजरिये को बेहतर बनाकर मेहनत कीजिए हस्तरेखाएँ स्वतः बदल जाएगी। पुरुषार्थ 0 – भेजें