Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 46

सोलह सुख

14 सूत्र

स्वतंत्रता जन्मसिद्ध अधिकार हो सकती है पर सफलता तो कर्मसिद्ध अधिकार ही है।
पुरुषार्थ
पहला सुख निरोगी काया, दूसरा सुख घर में हो माया, तीसरा सुख सुत आज्ञाकारी, चौथा सुख मृदुभाषी पतिव्रता नारी, पाँचवा सुख-सदन हो घर का, छठवाँ सुख कर्ज न हो पर का, सातवाँ सुख चले व्यापार, आठवाँ सुख सबको हो प्यार, नौवाँ सुख निराकुलता हो मन में, दसवाँ सुख न हो वैर-विरोध जीवन में, ग्यारहवाँ सुख मन लगे धर्म में, बारहवाँ सुख न फँसे कुकर्म में, तेरहवाँ सुख हो साधु समागम, चौदहवाँ सुख मर्मज्ञ जिनागम, पन्द्रहवाँ सुख जैन शील व्रतधारी, सोलहवाँ सुख हो अरिहंत पुजारी, ये सब पाय बने गृह त्यागी धन्य-धन्य वे नर अवतारी, इस भव साधु संत कहलावे, परभव सुरग मुक्ति पद पावे, नर भव सुकुल सफल जिनवाणी, बार-बार नहीं पावें प्राणी, करते 'प्रार्थना' धर्म कमावो, बार-बार नहीं नर तन पावो।
संतोष
सुख भोगने के लिए स्वर्ग है तथा दुःख भोगने के लिए नरक है और सुख-दुःख दोनों से ऊँचे उठकर महान् आनन्द प्राप्त करने के लिए यह मनुष्य लोक है।
धर्म
जो सूर्योदय के बाद भी सोये रहते हैं–उनका भाग्य भी सो जाता है और जो सूर्योदय के पूर्व उठते हैं, वे सूरज से चमकते हैं।
पुरुषार्थ
प्रतिभा स्वतंत्रता के वातावरण में ही मुक्त सांस ले सकती है।
ज्ञान
जवाबदारियाँ अवश्य निभाइये पर अपने मन को स्वतंत्र रखिये।
मन
आदमी अपना विनाश और विकास करने में स्वतंत्र है।
कर्म
स्वयं की भूल को स्वीकार करना ही अज्ञान से परदा उठाना है।
विनम्रता
अपने कार्य व कर्त्तव्यों को इतने आनंदपूर्वक कीजिए कि वे स्वर्ग के द्वार बन जाएँ।
पुरुषार्थ
स्वावलम्बन द्वारा सम्पादित कार्य से सुख उपजता है।
संयम
स्वावलम्बन परमार्थ के लिए जरूरी है।
संयम
हाथ की रेखाएँ टेढ़ी देखकर निराश मत होइए, अपने नजरिये को बेहतर बनाकर मेहनत कीजिए हस्तरेखाएँ स्वतः बदल जाएगी।
पुरुषार्थ
श्रम से डरने वाला विश्राम नहीं पा सकता है
पुरुषार्थ
जो जवानी में श्रम नहीं करता उसे बुढ़ापे में विश्राम नहीं मिलता है।
पुरुषार्थ