Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 4

पानी क्यों छानना चाहिए?

11 सूत्र

रात्रि में अन्न के बर्तन तथा अग्नि आदि में अनेक जीव पड़ते हैं, जिससे मांस खाने का दोष तथा हिंसा होती है, अतः रात्रिभोजन छोड़ने के योग्य है।
आहार
एक बार रात्रि में लाइट में भोजन बना, खाने बैठा तो लाइट चली गयी, उसने सोचा उजाले में तो बनाया, अब अंधेरे में खाने से क्या बाधा है, इसलिए जिसे वह अचार समझकर खा रहा था इतने में लाइट आ गयी देखा तो वह मेंढक था। इसी प्रकार बारात में रात्रि में खीर बनी, उसमें एक छिपकली गिर गयी थी, उसी खीर को खाने से अनेकों की मौत हो गयी, रात में नहीं खाने वाले जिनकी हंसी उड़ाई जा रही थी केवल वे ही बचे थे।
आहार
दया से परिपूर्ण हृदय वाला जो गृहस्थ छने हुए जल से सब कार्य करता है वह मोक्ष को प्राप्त होता है।
अहिंसा
सत्पुरुषों ने जैनधर्म के नीति मार्ग में ऐसा ही कहा है कि पानी का छानना धर्म है, जैनियों का यह धर्म तीनों लोकों में प्रसिद्ध है।
अहिंसा
जिनेन्द्र भगवान् ने पृथ्वी पर जीव दया की सिद्धि के लिए मोटे सूत के दुहरे वस्त्र से पानी छानने को पुण्य कहा है।
अहिंसा
श्रीमज्जैनधर्म में निपुण तथा जीवदया में सदा तत्पर रहने वाले मनुष्यों को पानी छानने की शुभ क्रिया में प्रमाद नहीं करना चाहिए।
अहिंसा
जो छना जल पीते हैं वे इस जगत् में भव्य एवं बुद्धिमान् हैं, अन्यथा पाप से विकल हृदय वाले पुरुष पशु तुल्य हैं।
अहिंसा
छने, निर्मल और समीचीन मन्त्र से पवित्र किए हुए जल से जिनपूजा के लिए, विधि पूर्वक प्रतिदिन स्नान करना चाहिए। वह जल नाली आदि में नहीं जाना चाहिए।
भक्ति
स्त्री समागम, आहार, मल विसर्जन तथा आरम्भादि में लीन रहने वाला और अशुद्ध वस्तुओं को स्पर्श करने वाला गृहस्थ स्नान कर तथा धुले हुए पवित्र वस्त्र धारण कर ही पूजा करें।
भक्ति
पूजा के लिए स्नान करने से जीवघात होता है, ऐसा जो कहता है वह पसीना आदि मल को दूर करने के लिए स्नान करता हुआ लज्जित क्यों नहीं होता है?
विवेक
नदियों और तालाबों का जो गहरा पानी, वायु तथा घाम से अच्छी तरह स्पृष्ट है, उस जल में प्रवेश कर स्नान के योग्य नहीं माना गया है बर्तन में लेकर प्रयोग कर सकते हैं।
अहिंसा