Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 33

दारिद्र्य विजयी-लक्ष्मी

32 सूत्र

मैंने कुछ ऐसे भी गरीब देखे हैं जिनके पास पैसे के सिवा कुछ भी नहीं है।
धन
कंजूस की दुनिया धन की रखवाली में बसी होती है।
दान
कंजूस अर्थात् कम-जूस जिसमें होता है, वह कंजूस है।
दान
कंजूस का उद्देश्य—रिश्ता भाई भाई का, हिसाब पाई पाई का।
दान
कंजूस परमात्मा से नहीं, पैसे से प्यार करता है।
दान
कंजूस दान कोड़ियों का करता है, संग्रह करोड़ो का करता है।
दान
कंजूस को राम से नहीं, दाम से प्रयोजन है क्योंकि उसने सुन रखा है— दाम करे सब काम, ये सोचे आठों याम।
दान
कंजूस धन का रक्षक होता है उसका जीवन गाय चराने वाले चरवाहा की तरह होता है, जो दिन भर गाय चराता है रात भर मच्छर उड़ाता है।
दान
कंजूस व्यक्ति प्याले का आकार देखता है, रसिक व्यक्ति प्याले का पदार्थ देखता है।
दान
सूर्योदय के पहले सभी को सोकर उठ जाना चाहिए यदि पति न भी उठ पाये तो पत्नि को तो उठ ही जाना चाहिए क्योंकि यदि गृहलक्ष्मी सूर्योदय के बाद तक सोती रहती है तो उसके यहाँ की धनलक्ष्मी भाग जाती है।
समृद्धि
जो दुःख से पीड़ित, प्रमादी, नास्तिक, आलसी, अजितेन्द्रिय और उत्साह रहित है, उनके यहाँ लक्ष्मी का वास नहीं होता है।
समृद्धि
ऐश्वर्य पाप का बीज है, दरिद्रता पाप का फल है।
धन
परमेश्वर पर विश्वास करने वाले व्यक्ति को ऐसा कोई व्यवहार नहीं करना चाहिए जिससे किसी को असुविधा हो।
भक्ति
आर्थिक पराधीनता ही संसार में दुःख का कारण है, मनुष्य को उससे मुक्ति पानी चाहिए।
धन
नंगे (भिखारी) के पास कुछ भी न हो लेकिन मूर्छा (ममत्व) हो तो परिग्रह है ऐसा समझना चाहिए।
अनासक्ति
यदि नदी में नहाते हो तो सैंकड़ों टन पानी सिर पर होने पर भी वजन मालूम नहीं होता किन्तु जब उस पानी को घड़े में भरकर सिर पर रखते हो तो पानी भार लगता है, कारण पानी को अपना मान लिया, ठीक उसी प्रकार संसार में, परिवार में, पदार्थों में रहना परिग्रह नहीं है किन्तु उन्हें अपना मानना परिग्रह है।
अनासक्ति
अधिक मिलने पर भी संग्रह न करें, परिग्रह वृत्ति से अपने को दूर रखें।
अनासक्ति
दुनिया में सबसे बड़ा ग्रह परिग्रह है, जिसके पास परिग्रह है उसे ही नवग्रह परेशान करते हैं। आश्चर्य है, लोग जीने के लिए धन कमाते हैं और धन की सेवा करते-करते मर जाते हैं। भोजन को पचाना आसान है, पर दूसरों के धन को पचाना आसान नहीं है।
अनासक्ति
जिसके पास धन है वह धन्य नहीं बल्कि जिसके पास धर्म रूपी धन है वही व्यक्ति जगत् में धन्य है।
धर्म
दूसरे का धन तुम्हारा हो सकता है किन्तु दूसरे का धर्म कदापि तुम्हारा नहीं हो सकता है। पैसे कमायें मगर कमाते वक्त यह भी सोचें कि हमारा लक्ष्य क्या है?
धर्म
पैसे से भले ही खुशियाँ न खरीदी जा सकें, लेकिन तकलीफें जरूर कम की जा सकती हैं।
धन
जिसकी जेब में पैसा नहीं, उसकी जुबान में अच्छे शब्द होना चाहिए।
धन
रुपया छठी इन्द्रिय है, बिना इसके अन्य पाँच इन्द्रियों का पूरा उपयोग नहीं हो सकता है।
धन
पैसा बहुत जरूरी है, लेकिन इतना जरूरी भी नहीं कि उसे पाने के लिए कुछ भी किया जाए।
धन
धन यदि अच्छे मार्ग से आता है तो वह अच्छे कार्यों में ही खर्च होगा और यदि अन्यायपूर्वक कमाया गया होगा तो उसके व्यय के रास्ते भी पाप के ही होंगे।
धन
वृद्ध पुरुषों में भी जिनके पास धन है, वे तरुण हैं और जो धनहीन हैं, वे युवावस्था में ही वृद्ध हो जाते हैं।
धन
पैसे से भोजन खरीदा जा सकता है, लेकिन भूख नहीं, पैसे से हँसी खरीदी जा सकती है मगर खुशी नहीं, पैसे से बिस्तर मिल सकते हैं नींद नहीं, किताबें मिल सकती है मगर ज्ञान नहीं, घड़ी मिल सकती है मगर समय नहीं, साथी मिल सकता है मगर दोस्त नहीं, चमक-दमक मिल सकती है मगर खूबसूरती नहीं, मकान मिल सकता है मगर घर नहीं, दवा मिल सकती है मगर सेहत नहीं, अँगूठी मिल सकती है मगर जीवन साथी नहीं, इसलिए पैसों को ज्यादा महत्त्व न दें, उसका अहंकार न करें, पर स्वाध्याय से आप जो चाहे वह सब मिल सकता है।
धन
जिस व्यक्ति को उसके इर्द-गिर्द की जनता चाहती है, वह सच्चा धनी है।
धन
समय और धन की बचत जीवन के कठिन समय को बर्दाश्त करने की वह कुंजी है जिससे बहुत सी मुश्किलें आसान हो जाती हैं।
धन
मनुष्य जो कमाता है वो नहीं, बल्कि जो बचाता है वह उसे धनी बनाता है।
धन
इस दुनिया में परमात्मा सभी को नब्बे रुपये देकर भेजता है किन्तु लोग पूरे सौ करने के चक्कर में नब्बे का सुख नहीं भोग पाते, लेकिन हाँ, जो दस कम है उसका दुःख जरुर भोगते हैं और सौ कभी होते नहीं हैं, किसी के इंक्यानवे, बानवे, तेरानवे हो जाते हैं तो किसी के चौरानवे, पंचानवे, छयानवे हो जाते हैं और किसी-किसी के तो निन्यानवे तक हो जाते हैं किन्तु सौ किसी के भी नहीं हो पाते और वे सब यहीं छोड़कर चले जाते हैं।
संतोष
दुनिया में वे लोग अभागे नहीं जिनके पास दुकान-मकान, कार-बंगला, धन-दौलत, पुत्र-सम्पदा नहीं, बल्कि सच्चे अभागे तो वे हैं जिनके पास प्रभु भक्ति के लिए और सत्संग के लिए समय नहीं है अर्थात् जिनके ऊपर प्रभु की छत्रछाया व गुरु की कृपा नहीं है।
भक्ति