Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Dharma

धर्म

423 सूत्र · पृष्ठ 2 / 6

जिसमें धर्म की रक्षा हो वही कार्य श्रेष्ठ मानना चाहिए।
धर्म
कामना, भय, लोभ अथवा जीवन रक्षा के लिए भी 'धर्म' का त्याग नहीं करना चाहिए, धर्म नित्य है जबकि सुख-दुःख अनित्य हैं, जीव नित्य है तथा बन्धन का हेतु अनित्य है।
धर्म
स्वदेश ही नहीं समूचे विश्व का व्यवहार जिसके बल पर सुचारू रूप से चलता है, उसे ही धर्म कहते हैं।
धर्म
दस प्रकार के लोग धर्म के तत्त्व को नहीं जानते हैं –१. नशे में मतवाला, २. असावधान, ३. पागल, ४. थका हुआ, ५. क्रोधी, ६. भूखा, ७. जल्दवाद, ८. लोभी, ९. भयभीत, १०. कामी।
धर्म
यज्ञ में मन्त्र बोलकर द्रव्य चढ़ाई जाती है तप में समता की मुख्यता होती है।
धर्म
भीतर का अभिप्राय शुद्ध न हो तो दान, यज्ञ, तप, शौच, तीर्थ यात्रा, शास्त्र श्रवण और स्वाध्याय- ये सभी अतीर्थ हो जाते हैं।
धर्म
अपना हृदय पवित्र रखो, धर्म का समस्त सार इसी उपदेश में समाया है शेष कथन सब इसी का विस्तार है।
धर्म
व्रत पालन करना आध्यात्मिक जीवन की आधारशिला है।
धर्म
व्रत हीन जीवन बिना ब्रेक की गाड़ी के समान खतरनाक होता है।
धर्म
व्रत एक प्रकार का आत्मानुशासन है, जिससे व्यक्ति सतर्क रहता है।
धर्म
प्राणों का अंत भी क्यों न हो जाए लेकिन गुरु की साक्षी में लिए व्रत भंग मत करना, यदि प्राणों का अंत होगा तो मात्र उसी समय दुःख होगा किन्तु जिसने एक बार व्रत को भंग कर दिया वह भव-भव में दुःखी होगा।
धर्म
संसार के दुःखों से छुटकारा प्राप्त करना चाहते हो तो वैराग्यपूर्वक व्रतों को धारण करो। व्रत पालन के लिए भी प्रबल पुण्य चाहिए।
धर्म
जो भोगों को तो छोड़ता नहीं है मात्र मुनि मुद्रा को ग्रहण करता है, उसका तप और ध्यान, मौन आदिक सभी श्रम व्यर्थ हैं।
धर्म
गाड़ी में पेट्रोल के समान संहनन के बिना मोक्ष प्राप्त नहीं होता है।
धर्म
नरकों में उपदेश देने वाले आचार्य नहीं होते फिर भी पूर्व संस्कार से सम्यग्दर्शन हो जाता है।
धर्म
चाण्डाल धीवरादि सम्यग्दर्शन प्राप्त कर सकते हैं अणुव्रत धारण कर सकते हैं पर अभिषेक नहीं कर सकते हैं क्योंकि जैन दर्शन में पर्याय की प्रधानता से क्रियायें होती हैं।
धर्म
रत्नत्रय धर्म को पाकर विषय सुख में रंजित होना भस्म के लिए चंदन को जलाने के समान निष्फल है। विषय विरक्त होने पर भी तप भावना, धर्म भावना सुखपूर्वक मरणादि रूप समाधि अति दुर्लभ है।
धर्म
आज का मनुष्य धर्म के लिए लड़ेगा, मरेगा, लिखेगा पर धर्म के लिए जियेगा नहीं।
धर्म
धर्म के नाम पर शर्म करने वालों को सुख की प्राप्ति नहीं होती है।
धर्म
जिनके अभिमान, काम क्रोधादि कषाय शान्त नहीं हुई है, जिनको इन्द्रियजन्य विषय भोगों से विरक्ति नहीं हुई है, जो जन्म-मरणादि के दुःख से भयभीत नहीं हैं जिन्हें शरीर सम्बन्धी सुख आदि से अभी वैराग्य नहीं हुआ है ऐसे प्राणियों की दीक्षा संसार में मात्र उदर पूर्ति के लिए ही है, मुक्ति प्राप्ति के लिए नहीं है, अतः ऐसे गुरुओं को तो दूर से ही त्याग देना चाहिए।
धर्म
मनुष्यों का गृहस्थ रहना अच्छा परन्तु इन्द्रिय, आहार दोष और रागद्वेषादिक के द्वारा कलंकित मुनिपद अच्छा नहीं है।
धर्म
जो हितकारी तप, दान, धर्म तथा चारित्र ग्रहण आदि की प्रेरणा देकर कराते वे श्रेष्ठ हैं।
धर्म
जो श्रावक श्रावकत्व को छोड़कर मुक्ति प्राप्त करने की चेष्टा करता है वह अशिक्षित घोड़े के समान उन्मार्गगामी हो जाता है।
धर्म
जिनेन्द्र देव की वीतराग वाणी स्वतंत्र बनाती है, स्वच्छंद नहीं बनाती है।
धर्म
राष्ट्र उत्कर्ष हेतु संत समाज का योगदान आपेक्षित है।
धर्म
जिसके देव-शास्त्र-गुरु की भक्ति, दान, दया और पूजन है तथा जो आठमद और सप्त व्यसनों से रहित है उसे जिनेन्द्र भगवान् ने श्रावक कहा है।
धर्म
धर्म गुरुओं से लोग त्याग, न्याय, सत्य और ईमानदारी के पथ पर चलने की शिक्षा लेते हैं, अतः धर्म गुरु अनीति और अधर्म से बचें।
धर्म
जो मनुष्य प्रतिष्ठा को करने वाला है उसे संघ का अधिपति जानना चाहिए क्योंकि धर्म की वृद्धि किसी अन्य द्वारा नहीं होती है।
धर्म
भावना सहित प्राणी कदाचित् ज्ञान और चारित्र से च्युत भी हो जाता है तो वह स्वर्गादि के सुख प्राप्त कर मुक्ति का स्वयंवर होता है।
धर्म
निस्संदेह दान की बहुत प्रशंसा हुई है परन्तु दान से धार्मिक आचरण ही श्रेष्ठ है।
धर्म
जो लोग न्याय, निष्ठा और धर्म पालन के द्वारा अपना और दूसरों का भला करते हैं; संसार उनके स्वभाव का बड़ा आदर करता है।
धर्म
लोक में वीतराग को छोड़कर दूसरा कोई देव, ब्रह्मचर्य को छोड़कर दूसरा कोई तप, अभयदान को छोड़कर दूसरा कोई दान और मुनिराज को छोड़कर दूसरा कोई पवित्र प्राणी नहीं है।
धर्म
भारत के साधु यदि नशेबाजी और दुर्व्यसनों का त्याग कर देश के रचनात्मक कामों में लग जाएँ, तो वे जनता को अपने पक्ष में कर सकते हैं।
धर्म
धर्म के साथ सहनशीलता सबसे ऊँची तपस्या है।
धर्म
धर्मात्मा जीव वही है जो कष्ट में भी धर्म को न छोड़ें।
धर्म
धर्म से धन आता है, धन से धर्म नहीं होता।
धर्म
धर्म के साथ सहनशीलता सबसे ऊँची तपस्या है।
धर्म
धर्मात्मा जीव वही है जो कष्ट में भी धर्म को न छोड़ें।
धर्म
धर्म के लिए धन नहीं चाहिए, मन चाहिए।
धर्म
संसार में धन की इच्छा से शाश्वत धर्म का त्याग कभी नहीं करना चाहिए।
धर्म
सन्तों को साधनों से नहीं साधना से स्नेह रखना चाहिए।
धर्म
सच्चे साधु वही हैं जो अपनी आयु को मनुष्य और प्राणीमात्र की भलाई के लिए लगा देते हैं।
धर्म
जिस प्रकार चन्दन जलाये जाने या घिसे जाने पर भी अपनी सुरभि का परित्याग नहीं करता, उसी तरह सच्चे सन्त संकट आने पर अपनी साधना का त्याग नहीं करते हैं।
धर्म
जो समयानुसार धर्म, अर्थ और काम का सेवन करता है, वह इहलोक व परलोक में भी धर्म, अर्थ और काम को प्राप्त करता है।
धर्म
उदयसुन्दर की हँसी भी ठीक थी क्योंकि वज्रबाहु को मोक्षमार्ग में लगा दिया था।
धर्म
जो समयानुसार धर्म, अर्थ, काम का सेवन करता है, वह इस लोक व परलोक में भी धर्म अर्थ और काम को प्राप्त होता है।
धर्म
जिसके पास धन है वह धन्य नहीं बल्कि जिसके पास धर्म रूपी धन है वही व्यक्ति जगत् में धन्य है।
धर्म
दूसरे का धन तुम्हारा हो सकता है किन्तु दूसरे का धर्म कदापि तुम्हारा नहीं हो सकता है। पैसे कमायें मगर कमाते वक्त यह भी सोचें कि हमारा लक्ष्य क्या है?
धर्म
संसार में रत्नत्रय से बढ़ा कोई वैभव नहीं है, अतः उसकी रक्षा करनी चाहिए मनुष्य वस्त्रों के बिना शोभित हो सकता परन्तु लज्जा व धैर्य के बिना नहीं।
धर्म
धर्मात्माओं के उपदेश एक दृढ़ लाठी के समान हैं क्योंकि वह पतन से बचाते हैं।
धर्म
जो धर्म के पीछे दौड़ता है, धन उसके पीछे दौड़ता है।
धर्म
जो व्यक्ति नास्ता लिए बिना लम्बे मार्ग पर चल देता है वह चलता हुआ भूख-प्यास से पीड़ित होकर दुःखी होता है, इसी प्रकार जो व्यक्ति धर्म किए बिना परभव में जाता है वह व्याधि रोग से पीड़ित एवं दुःखी होता है।
धर्म
धार्मिक कर्तव्यों का अनुष्ठान, उत्साहपूर्वक धनोपार्जन, प्रसन्नतापूर्वक कामपुरुषार्थ में प्रवृत्ति, शरीर शुद्धि तथा दुष्टजनों के स्पर्श से उत्पन्न हुए दोषों को दूर करने के लिए स्नान किया जाता है।
धर्म
स्नान तन को, ध्यान मन को, दान धन को, योग जीवन को, प्रार्थना आत्मा को, व्रत स्वास्थ्य को, क्षमा रिश्तों को और परोपकार किस्मत को शुद्ध करता है।
धर्म
जगत् और भगत क्रमशः साधनों और साधना में जीते हैं, एक को मौत दूसरे को मोक्ष मिलता है।
धर्म
काम, अर्थ और यश में किया गया यत्न निष्फल भी हो सकता है पर धर्म कार्य के प्रारम्भ का संकल्प निष्फल नहीं होता क्योंकि मन में भाव आते ही पुण्य बंध प्रारम्भ हो जाता है।
धर्म
विकारी और भिखारी से कभी जिनशासन नहीं चल सकता है।
धर्म
अत्यन्त लोभी का अर्थ और अधिक आसक्ति रखने वालों का काम ये दोनों ही धर्म को हानि पहुँचाते हैं, जो मनुष्य काम से धर्म और अर्थ को, अर्थ से धर्म और काम को तथा धर्म से अर्थ और काम को हानि न पहुँचा कर धर्म, अर्थ और काम तीनों का यथोचित रूप से सेवन करता है, वह अत्यन्त सुख प्राप्त करता है।
धर्म
व्रत रहित जीवन उस जहाज की तरह है जिसके नाविक ने अपने गन्तव्य स्थान का निश्चय न किया हो।
धर्म
उधार धर्म कहने कि लिए नगद धर्म करने के लिए होता है।
धर्म
किसी धर्म-सम्प्रदाय को इसलिए ग्रहण न करो कि उसके प्रवर्तक राजा या राजकुमार हैं क्योंकि राजा-महाराजा प्रायः आध्यात्मिकता में दरिद्र होते हैं।
धर्म
बुद्धिमानों को चाहिए कि नियमों की रक्षा करते हुए लोक व्यवहार का निर्वाह करें क्योंकि नियमों के द्वारा निश्चय किए गए धर्म-मार्ग पर सर्व साधारण भी चलते हैं।
धर्म
जहाँ अपूज्यों की पूजा होती है तथा पूज्यों का अपमान होता है, वहाँ दुर्भिक्ष, मरण तथा भय ये तीनों होते हैं।
धर्म
संसार धर्मात्मा और न्याय परायण पुरुष की निर्धनता को हेय (हीन) दृष्टि से नहीं देखता है।
धर्म
दुष्टों को मृत्यु दण्ड देना अनाज के खेत से घास को बाहर निकालने के समान है।
धर्म
जो मनुष्य अधिकारी व्यक्ति के सामने स्वेच्छापूर्वक अपने दोष शुद्ध हृदय से कह देता है और फिर कभी न करने की प्रतिज्ञा लेता है, उसी का प्रायश्चित्त शुद्धतम है।
धर्म
उद्यापन में समाज को भोजन कराने की इस विकृत परम्परा के कारण असमर्थ लोग व्रत करने से डरने लगे हैं।
धर्म
प्राणों का परित्याग करना अच्छा है परन्तु व्रतादि का भंग करना श्रेष्ठ नहीं है, गुरु तथा देव की आज्ञा का लोप करने से यह जीव नरक एवं तिर्यञ्च गति को प्राप्त होता है।
धर्म
धर्म-धर्मात्मा का सदा पक्ष लेना चाहिए।
धर्म
जो पुरुष मनुष्य भव में समीचीन धर्म को छोड़कर संसार में उत्पन्न सुख को भोगता है वह अमृत को छोड़कर महाविष को ग्रहण करता है।
धर्म
जो लोग माँगते हैं उनसे आचार्य एक भिक्षा माँगते हैं कि यदि तुम्हें माँगना ही है, तो उन लोगों से माँगो जो देने में हीला-हवाली नहीं करते हैं।
धर्म
साठ साल के व्यक्ति को और आठ साल के बच्चे को घर छोड़ देना चाहिए, बच्चे को शिक्षा के लिए और व्यक्ति को दीक्षा के लिए।
धर्म
सम्यग्दृष्टि के पास समता का कवच होता है।
धर्म
जैसे कामधेनु, कल्पवृक्ष, चिन्तामणि रत्न, रसायन और पारसमणि को पाने वाला मनुष्य यथेच्छ सुख भोगता है उसी प्रकार सम्यक्त्व को पाने वाला जानो।
धर्म
कर्त्तव्य और धर्म एक सिक्के के दो पहलू हैं इसलिए कर्तव्य के बिना धर्म नहीं हो सकता है और न ही धर्म के बिना कर्त्तव्य हो सकता है।
धर्म