Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
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संतोष

330 सूत्र · पृष्ठ 3 / 5

दीन वह है जो सांसारिक सुख का लोभी है।
संतोष
बाह्य पदार्थ तो छूटा ही है लोभ कषाय छोड़ना है।
संतोष
बाह्य परिकर (भोग-उपभोग की सामग्री एवं नौकर चाकर) से भी शान्ति नहीं मिलती है इसके उदाहरण देखने हो तो सम्राट, मन्त्री, श्रीमन्तों के समीप जाकर देखो।
संतोष
सम्पत्तिशाली व लोकमान्य तिलक बनने में शान्ति नहीं मिलेगी।
संतोष
तीनों लोकों में जो दोष हैं वे लोभ से उत्पन्न हुए हैं व गुण लोभ के त्याग से प्राप्त हुए हैं।
संतोष
धन से धर्म और काम पुरुषार्थ करना चाहिए परन्तु स्त्रियाँ धर्म और काम से धन खरीदती हैं अतः उनकी इस बढ़ी हुई लोलुपता को धिक्कार है।
संतोष
लोभ से ही क्रोध उत्पन्न होता है, लोभ से ही काम की प्रवृत्ति होती है और लोभ से माया, मोह, अभिमान, उद्दण्डता तथा पराधीनता आदि दोष प्रकट होते हैं।
संतोष
जिस व्यक्ति में लोभ है, उसे दूसरे अवगुण की क्या आवश्यकता है?
संतोष
यदि लोभ को हटाना चाहते हो तो तुम्हें पहले उसकी माँ विलासिता को हटाना होगा।
संतोष
जो किसी बात की लालसा नहीं रखता, उसको कोई दुःख नहीं होता परन्तु जो वस्तुओं के लिए मारा-मारा फिरता है, उस पर निरन्तर आपत्तियाँ आती रहती हैं।
संतोष
इस दुनिया में परमात्मा सभी को नब्बे रुपये देकर भेजता है किन्तु लोग पूरे सौ करने के चक्कर में नब्बे का सुख नहीं भोग पाते, लेकिन हाँ, जो दस कम है उसका दुःख जरुर भोगते हैं और सौ कभी होते नहीं हैं, किसी के इंक्यानवे, बानवे, तेरानवे हो जाते हैं तो किसी के चौरानवे, पंचानवे, छयानवे हो जाते हैं और किसी-किसी के तो निन्यानवे तक हो जाते हैं किन्तु सौ किसी के भी नहीं हो पाते और वे सब यहीं छोड़कर चले जाते हैं।
संतोष
खुश नसीब वो नहीं जिसका नसीब अच्छा है, खुश नसीब वो हैं जो अपने नसीब से खुश हैं।
संतोष
गरीब मंदिर के बाहर अमीर मंदिर के भीतर भीख माँगता है।
संतोष
सबके मन की तो वह तीन लोक के नाथ भी नहीं कर सकते हैं।
संतोष
जिसके भीतर कोई भी इच्छा नहीं होती, उसकी आवश्यकता की पूर्ति प्रकृति स्वतः करती है।
संतोष
निरोग रहना, ऋणी न होना, परदेश में न रहना, अच्छे लोगों के साथ मेल होना, अपनी वृत्ति से जीविका चलाना और निडर होकर रहना; ये छह मनुष्य लोक के सुख हैं।
संतोष
ईर्ष्या करने वाला, घृणा करने वाला, असन्तोषी, क्रोधी, सदा शंकित रहने वाला और दूसरे के भाग्य पर जीवन निर्वाह करने वाला; ये छह सदा दुःखी रहते हैं।
संतोष
जो दूसरों से (अपने लिए) सुख चाहता है, उसको भयंकर दुःख भोगना ही पड़ेगा।
संतोष
अच्छी जिंदगी जीने के दो तरीके हैं, जिसे पसंद करते हैं उसे हासिल कीजिए या फिर जो हासिल है उसी को पसंद करना शुरू कर लीजिए।
संतोष
किसी से कुछ नहीं चाहना ही सुख और दूसरे से आशा करना ही दुःख है।
संतोष
प्रत्येक लक्ष्य का अंतिम लक्ष्य सुख-शान्ति प्राप्त करना है।
संतोष
यदि दुःखी रहना चाहते हो तो कोई व्यवस्था सम्भाल लो, बस उसी क्षण से दुःख अशान्ति प्रारम्भ हो जायेगी।
संतोष
ध्यान रखना सुख वस्तु से नहीं संतुष्टि से मिलता है, जिसे जिसमें संतुष्टि है उसे उसमें सुख है।
संतोष
कोई भी चीज अपने न्याय नीति से कमाये पैसों से खरीदो तो शौक अपने आप कम होंगे।
संतोष
सुख ही शान्ति है यह भ्रम है, शान्ति ही सुख है यह सच है।
संतोष
निष्परिग्रहत्व अधन ही जीव का धन है, धन आधा धन है, धान्य महद् धन है तथा विद्या, तप और कीर्ति अति धन है।
संतोष
'कुछ दीजिए' यह वचन मुख से निकलते ही मनुष्य के शरीर की ये पाँच देवियाँ–बुद्धि, श्री, लज्जा, शान्ति और कीर्ति तत्काल निकलकर चली जाती हैं। याचकता सैकड़ों गुणों को हर लेती है।
संतोष
नीचे की ओर (अपने से छोटों की ओर) देखने से किसकी महिमा नहीं बढ़ जाती? ऊपर (अपने से बड़ों की ओर) देखने पर सभी दरिद्र हो जाते हैं।
संतोष
सब्र के बिना कब्र ही शरण होती है।
संतोष
सीमित खर्च को बुद्धिमत्ता की पुत्री, संयम की बहन और स्वतंत्रता की माता कहा जा सकता है। खर्चीला व्यक्ति शीघ्र ही निर्धन हो जाता है और निर्धनता परावलम्बन के लिए बाध्य करती है तथा भ्रष्टाचार को निमंत्रित करती है अतः जो भी आपके पास है उससे कम व्यय करो।
संतोष
धन, जीवन, स्त्री और भोजन के विषय में सब प्राणी अतृप्त होकर गये, जा रहे हैं और जायेंगे।
संतोष
धर्म, अर्थ, काम, कीर्ति और जीवन इनके विषय में सब प्राणी सदा अतृप्त रहकर मरे हैं, मरेंगे और मर रहे हैं।
संतोष
जहाँ-कहीं भी जो कुछ खाकर, जैसा-तैसा वस्त्र पहन कर जहाँ-कहीं भी रहकर जो आत्म संतुष्ट रहता है, निर्जन स्थान में रहता है और दूसरों के संसर्ग को त्यागता है अर्थात् हर परिस्थिति में सन्तुष्ट रहने वाला सुखी होता है।
संतोष
गरीब वह नहीं है, जिसके पास कम है, बल्कि वह है जो अधिक चाहता है।
संतोष
अपनी स्त्री, भोजन और धन इन्हीं तीनों में संतोष करना चाहिए, विद्या पढ़ना, जाप करना-कराना और दान देने में संतोष नहीं करना चाहिए।
संतोष
जिसमें तुम्हारा कोई बस नहीं, उसके लिए दुःख करना बन्द कर दो।
संतोष
संसार में परमात्मा भी सबके मन की नहीं कर सकता है।
संतोष
खोये का रोना क्या? जो पाया नहीं है उसका सोचना क्या? जो है उसे कर्म की व्यवस्था मानकर सुख शान्ति से जिएं।
संतोष
जितनी जरूरत हो उतना रखो, जितनी शक्ति हो उतना करो, यही सुखी होने का उपाय है।
संतोष
पहला सुख निरोगी काया, दूसरा सुख घर में हो माया, तीसरा सुख सुत आज्ञाकारी, चौथा सुख मृदुभाषी पतिव्रता नारी, पाँचवा सुख-सदन हो घर का, छठवाँ सुख कर्ज न हो पर का, सातवाँ सुख चले व्यापार, आठवाँ सुख सबको हो प्यार, नौवाँ सुख निराकुलता हो मन में, दसवाँ सुख न हो वैर-विरोध जीवन में, ग्यारहवाँ सुख मन लगे धर्म में, बारहवाँ सुख न फँसे कुकर्म में, तेरहवाँ सुख हो साधु समागम, चौदहवाँ सुख मर्मज्ञ जिनागम, पन्द्रहवाँ सुख जैन शील व्रतधारी, सोलहवाँ सुख हो अरिहंत पुजारी, ये सब पाय बने गृह त्यागी धन्य-धन्य वे नर अवतारी, इस भव साधु संत कहलावे, परभव सुरग मुक्ति पद पावे, नर भव सुकुल सफल जिनवाणी, बार-बार नहीं पावें प्राणी, करते 'प्रार्थना' धर्म कमावो, बार-बार नहीं नर तन पावो।
संतोष
सुखी रहने का मूल मंत्र – C.A.R. (1) Change the changable (2) Accept the unchangable (3) Remove yourself from unchangable बदलने लायक है, बदलना आवश्यक है, बदल सकते हो तो बदल दो। जिसे बदल नहीं सकते हो उसे स्वीकार कर लो। जिसे बदल नहीं सकते एवं स्वीकार भी नहीं कर सकते, उससे दूर हो जाओ। उपरोक्त तीनों बिन्दुओं को अगर ठीक से आत्मसात कर लिया जाये तो जीवन में कुछ भी समस्या नहीं बचेगी।
संतोष
सुख की खोज में मनुष्य अपना जीवन असंतुलित कर लेता है, जबकि असली सुख तो संतुलित जीवन में छुपा है।
संतोष
इस बात को स्वीकार करने तैयार रहे कि हम कुछ चीजें नहीं बदल सकते हैं। विपरीत परिस्थितियों में कुछ लोग टूट जाते हैं, कुछ रिकार्ड तोड़ते हैं।
संतोष
जो हो चुका है वह बदला नहीं जा सकता है।
संतोष
जो कुछ हमारे पास है उसमें संतोष करना उचित है लेकिन हम जो हैं उससे संतुष्ट कभी नहीं रहना चाहिए।
संतोष
मनुष्य अपनी कम से कम जरूरत से ज्यादा जितना भी लेता है, वह चोरी करता है।
संतोष
जीवन का सच्चा पथ यह नहीं कि-जो हमें प्राप्त नहीं है उसके लिए हम रोते रहें बल्कि जो है उसमें संतोष का सच्चा सुख प्राप्त करें।
संतोष
कभी–कभी उपहार हमारी पसंद के विपरीत भी हो सकता है किन्तु हमे उपहार धैर्य व प्रसन्नता से स्वीकार करना चाहिए।
संतोष
संतोषी सदा सुखी रहता है और लोभी सदा दु:खी रहता है।
संतोष
संसार में संतोष ही उत्कृष्ट सुख का खजाना है।
संतोष
गरीब वह नहीं जिसके पास थोड़ा धन है, अपितु सच्चे गरीब तो वे हैं जो बहुत के पीछे भाग रहे हैं।
संतोष
संतोषी कभी प्रश्न नहीं उठाता है।
संतोष
सत्कारपूर्वक स्वीकार किया गया सत्कार ही संतोष उत्पन्न करता है।
संतोष
आप जितने बुद्धिमान होंगे उतनी ही आपको अधिक सन्तुष्टि मिलेगी।
संतोष
सुख के लिए सामग्री नहीं संतोष चाहिए और संतोष भी तत्त्व ज्ञान बिना संभव नहीं है।
संतोष
एक से अधिक कार्य करने के लिए शारीरिक क्षमता की आवश्यकता नहीं है, उसके लिए मानसिक क्षमता की आवश्यकता है जितनी चादर उतने पैर पसारो, सदा एक नाव में सवार होओ, जितना सँभाल सको उतना ही करो, ज्यादा करोगे तो दूसरों के लिए, पैसा ज्यादा हो तो बुरी आदतें लग जाती हैं।
संतोष
हम जीवन भर में यह तय नहीं कर पाते कि हमारी जरूरत कितनी है कितना हमारे सुखी जीवन के लिए पर्याप्त है।
संतोष
गरीबी का शान्ति मय जीवन श्रेष्ठ है लेकिन धनाढ्य की अशान्ति ठीक नहीं मानी जाती है।
संतोष
वैभव से सुख शान्ति नहीं मिलती अपितु दुःख अशान्ति मिलती है, सुख शान्ति तो संतोष और समता से मिलती है।
संतोष
आकांक्षा अन्तरंग आनन्द को समाप्त कर देती है।
संतोष
यदि कम पुण्य में अधिक आकांक्षा करोगे तो विषय-कषाय के मच्छर और हीन भावना की ठंड लगेगी, जीवन नरक न हो इसलिए जितनी चादर उतने पैर फैलाओ।
संतोष
निराकुल होने के लिए आशा का त्याग आवश्यक है।
संतोष
जो आशा के दास होते हैं वे संसार के दास होते हैं, आशा जिनकी दासी होती है, संसार उनका दास होता है।
संतोष
चाह रहित मनुष्य का हृदय कोमल होता है, चाह वाले का कठोर होता है।
संतोष
दिन की शुरूआत में हमें लगता है कि जिन्दगी में पैसा बहुत जरूरी है, पर दिन ढलने पर हमें पता चलता है कि जिन्दगी में शान्ति सुकून जरूरी है।
संतोष
जरूरत के अनुसार जिंदगी जियो अपेक्षाओं के अनुसार नहीं क्योंकि जरूरत तो भिखारियों की भी पूरी हो जाती है और अपेक्षायें बादशाहों की भी अधूरी रहती हैं।
संतोष
जीवन वही श्रेष्ठ है, जहाँ जीना भारभूत न हो, जीने में प्रसन्नता हो।
संतोष
जीवन में हानि-लाभ का पैमाना दुःखी-सुखी होना है। यदि दुःखी हुए तो हानि हुई, दुःखी नहीं हुए तो हानि नहीं हुई समझना चाहिए।
संतोष
अपने दुःख दूर हो सकते हैं, यदि दूसरे के दुःखों से तुलना कर लें तो।
संतोष
रास्ते कहाँ खत्म होते हैं जिन्दगी के इस सफर में, मंजिल तो वही है जहाँ इच्छाएँ रुक जायें।
संतोष
जिन्दगी का सच एक ये भी है—एक गरीब रोज सुबह जल्दी निकलता है पेट भरने के लिए और एक अमीर आदमी रोज सुबह घर से जल्दी निकलता है पेट कम करने के लिए।
संतोष
सुखी जीवन की तीन बातें—अतीत की चिंता मत करो, भविष्य पर विश्वास मत करो और वर्तमान को व्यर्थ मत जाने दो।
संतोष
सुखी रहने के ६ सूत्र—यदि पूजा कर रहे हो तो विश्वास करना सीखो, बोलने से पहले सुनना सीखों, खर्च करना है तो कमाना सीखो, अगर लिखना है तो सोचना सीखो, हार मानने से पहले फिर से कोशिश करना सीखों, मरने से पहले खुलकर जीना सीखों।
संतोष
विद्या के समान नेत्र नहीं, सत्य के समान तप नहीं, राग के समान दुःख नहीं, त्याग के समान सुख नहीं, चिन्ता के समान संताप नहीं, शान्ति के समान आनंद नहीं, तृष्णा के समान रोग नहीं, संतोष के समान सुख नहीं।
संतोष
अगर आप यह मान लेते हैं कि आपके पास पर्याप्त है तो आप सच्चे धनवान हैं।
संतोष