Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Attachment & Detachment

अनासक्ति

630 सूत्र · पृष्ठ 2 / 9

दूसरों के रूपों को देखने के कारण आज तक हमारी आत्मा रूपातीत न हो पायी है।
अनासक्ति
सबको अपना बनाने की चाह शव बना देती है, सब कुछ छोड़ने की चाह शिव बना देती है।
अनासक्ति
इन्द्रिय विषयों की अभिलाषा आभ्यन्तर परिग्रह है।
अनासक्ति
शरीर से भोगों के त्यागी और भावों से भोगों के रागी का शुभ उपयोग नहीं हो सकता है।
अनासक्ति
जैसे-जैसे मोह घटता है और योग निर्मल होता है वैसे-वैसे गुणस्थान बढ़ता है और जैसे-जैसे मोह बढ़ता है वा योग चंचल होता है तो गुणस्थान गिरता है।
अनासक्ति
संसार की असारता ही संसार में सदा ध्यान करने योग्य है।
अनासक्ति
जब मेरा भव ही शाश्वत नहीं तो वैभव कैसे शाश्वत होगा?
अनासक्ति
विषय कषाय की ज्वाला आत्मा को दग्ध करती है, अन्दर ही अन्दर झुलसाती है, बाहर धुँआ भी दिखाई नहीं देता है।
अनासक्ति
जो ज्ञानी जीव है वह विषयों का संग होने पर भी उनसे लिप्त नहीं होता, जैसे मल के मध्य में पड़ा सोना मल से लिप्त नहीं होता है।
अनासक्ति
इस जीव ने अचेतन से सुख प्राप्त करने के भ्रम में अनन्त जन्म धारण किए हैं।
अनासक्ति
यदि किसी को अपना बनाना चाहते हो तो उसका नाम लो, नाम सभी को प्रिय होता। जितने भी भूतल पर सो गये, सोयेंगे वे सब नाम के राग में निज को खो गये। बाहर की ख्याति अन्दर से खाली कर देती है।
अनासक्ति
मुनिराज परिग्रह में नहीं निज गृह में विचरण करते हैं। नारी सबसे बड़ा परिग्रह है।
अनासक्ति
जो हुआ अच्छा हुआ, जो हो रहा है अच्छा हो रहा, जो होगा अच्छा होगा, तुम्हारा क्या गया जो तुम रोते हो? तुम क्या लाये थे, जो तुमने खो दिया ? तुमने क्या पैदा कर दिया, जो नष्ट हो गया? तुमने जो लिया यही से लिया, तुमने जो दिया यही पर दिया; जो आज तुम्हारा है, वह ''कल किसी और का था, कल किसी और का होगा, परिवर्तन संसार का नियम है'' तुम इसे अपना मान रहे हो, बस यही तुम्हारे दुःख का कारण है।
अनासक्ति
जैसे पिंजड़े का तोता पिंजड़े से मुक्त होना चाहता है, निकट भव्य शरीर से मुक्त होना चाहता है।
अनासक्ति
शरीर का रोग तो सिर्फ वर्तमान की पर्याय को नष्ट कर सकता है किन्तु भोगों का रोग भव-भव की पर्यायों को नष्ट कर देता है।
अनासक्ति
जिसका मन सदा शुद्धज्ञान में रमा रहता है अन्य किसी कार्य में जिसकी कोई प्रवृत्ति नहीं होती है उसके भोग आसक्ति के अभाव में संसारवर्धक नहीं होते हैं।
अनासक्ति
वैराग्य के बिना चारित्र विधवा स्त्री के शृंगार के समान है।
अनासक्ति
जब परमात्मा का राग परमात्मा नहीं बनने देता तब पाप का राग परमात्मा कैसे बनने देगा? एक लाख शिखर बंद जिन मंदिर की सुरक्षा करना सरल है, परन्तु एक क्षण के विशुद्ध परिणामों की सुरक्षा करना कठिन है।
अनासक्ति
वैराग्य योगी को नहीं, भोगी को होता है, योगी वैराग्य को सुरक्षित रखते हैं और वैराग्य योगी को सुरक्षित रखता है।
अनासक्ति
मोह में हम बुराइयाँ नहीं देख पाते और घृणा में हम अच्छाइयाँ नहीं देख पाते हैं।
अनासक्ति
अपने छूट जाते हैं तो दूसरे अपने हो जाते हैं, अपना स्थाई कोई नहीं है।
अनासक्ति
तन और धन के राग में ही जीव का पुण्य क्षीण होता है।
अनासक्ति
जीवन में किसी से राग और किसी से द्वेष भी मत करना, माँ के तीव्र राग ने सुकौशल मुनि को व्याघ्री बनकर खाया था और भाभी के द्वेष ने स्यालिनी बनकर सुकुमाल मुनि को खाया था।
अनासक्ति
जब पर्याय शाश्वत नहीं, परिणाम शाश्वत नहीं है तो फिर पर की पर्याय में राग क्यों ?
अनासक्ति
जो निज में वास न करने दे उसका नाम है 'वासना'।
अनासक्ति
जैसे बहुत समय से दुर्गन्धित मल-मूत्र वाले घड़े से दुर्गन्ध नहीं छूटती, वैसे ही सम्यक्त्व रूपी जल से धोने पर भी ज्ञानामृत से पूर्ण होने पर भी अनादिकालीन दुर्वासना आसानी से नहीं छूटती है। जैसे खोटे बर्तन में खीर सुरक्षित नहीं रहती वैसे ही विषय-कषाय से खट्टी आत्मा में जिनवाणी नहीं रहती। विषयों में प्रवृत्ति भूल से नहीं राग से होती है।
अनासक्ति
जैसे वायु का चक्रवात अपने साथ रास्ते की सब चीजों को उड़ा ले जाता है, वैसे ही विषयों की वायु का चक्रवात पुण्य के भण्डार को अपने साथ उड़ाकर ले जाता है।
अनासक्ति
हलाहल विष तो एक पर्याय को नष्ट करता है परन्तु विषयों का विष अनंत पर्यायों को नष्ट करता है।
अनासक्ति
वैराग्य का अर्थ परिवार या निमित्तों का नाश नहीं अपितु निज स्वभाव में दृष्टि का आना है।
अनासक्ति
यदि समर भूमि में सेनापति का भाषण नहीं होता, तो योद्धाओं की भुजायें नहीं फड़कती और समवसरण में प्रभु की देशना नहीं खिरती तो किसी को वैराग्य नहीं होता।
अनासक्ति
वैराग्य को अहंकार कहाँ, अहंकारी को वैराग्य कहाँ?
अनासक्ति
जब वैराग्य होता है तो एक लँगोटी भी भारभूत नजर आती है और रागी को चक्रवर्ती की विभूति में भी भार नहीं दिखता है।
अनासक्ति
दीपक में जब तक स्नेह/तेल रहता है तब तक उसे जलना पड़ता है और जब स्नेह/तेल समाप्त हो जाता है तब वह निर्वाण को प्राप्त हो जाता है-बुझ जाता है, इसी प्रकार संसारी जीव स्नेह-प्रीति के कारण दुःखी होता है और प्रीति त्यागकर निर्वाण-मोक्ष को प्राप्त होता है। स्नेह रहित को इष्टवियोग और अनिष्ट संयोग से उत्पन्न दुःख नहीं होता।
अनासक्ति
आपने घी खाया, दूध पिया फिर भी सिर के बाल सफेद हो गये, आप अपने बालों को झड़ने से नहीं रोक पाये, तो फिर दूसरों को अपनी इच्छा से कैसे परिणमन करा सकते हो? जब निज देह का परिणमन अपने वश में नहीं है तो फिर पर का परिवर्तन कैसे कर सकते हो? क्योंकि कण-कण स्वतंत्र है।
अनासक्ति
जो रूप के पीछे स्वरूप को भूल जाता है वह लंकेश की तरह नरक जाता है।
अनासक्ति
राख होने से पहले राख होने वाले रूपों को देखना छोड़ दो। यदि रूपातीत होना है तो स्वरूप में लीन हो जाओ।
अनासक्ति
सम्बन्ध से संकल्प-विकल्प होते हैं जिससे अनेक प्रकार के कर्मों का बंध होता है, जिससे संसार में परिभ्रमण होता है अतः सम्बन्ध बनाने से बचें।
अनासक्ति
सहज भाव से जीने वाला साधु ही स्वानुभूति का सही अनुभव कर पाता है। जिस साधु को देह से भी राग नहीं होता उसे नाम का भी राग नहीं होता है।
अनासक्ति
जो साधु श्री और स्त्री को महत्त्व देता है उसकी साधना समाप्त हो जाती है और लोकापवाद भी होता है।
अनासक्ति
संसार में दुःख अनन्त है तथा सुख अत्यल्प है इसलिए दुःखों से घिरे सुखों पर दृष्टि नहीं लगानी चाहिए।
अनासक्ति
यह दुर्भाग्य की बात है कि हम आत्मिक स्वतंत्रता खोकर सांसारिक सुखों को खरीदते हैं।
अनासक्ति
अनुरक्त व्यक्ति जिस चीज की प्रशंसा करता है विरक्त व्यक्ति उसी की निंदा करता है और मध्यस्थ व्यक्ति उस सम्बन्ध में उदासीन रहता है।
अनासक्ति
राग-द्वेष की हानि से ही सारे गुण प्रकट हो जाते हैं।
अनासक्ति
वस्तु के प्राप्त न होने पर लोगों का उसमें अनुराग होता है तथा प्राप्त हो जाने पर वैराग्य होता है।
अनासक्ति
हेमन्त ऋतु में आग की कामना होती तथा ग्रीष्म में पुनः हिम की आवश्यकता होती है।
अनासक्ति
भोग में रोग का भय है, कुल आचार में भ्रष्टता का भय है, धन में राजा का भय है, अभिमान में दीनता का भय है, सामर्थ्य में शत्रु का भय है, सौन्दर्य में वृद्धावस्था का भय है, शास्त्रज्ञान में तर्कशील विवादी का भय है, गुण में दुष्ट का भय है और शरीर में मौत का भय है, इस संसार में सभी वस्तुएँ भययुक्त हैं, वैराग्य ही अभय है।
अनासक्ति
सौन्दर्य पर आधारित प्रेम सौन्दर्य की ही भाँति शीघ्र नष्ट हो जाता है।
अनासक्ति
बंधन दो प्रकार के होते हैं–पहला प्रेम का बंधन दूसरा द्वेष का बंधन।
अनासक्ति
दुर्लभ मनुष्य जन्म पाकर जिसने भोगों में नष्ट किया है उसने मानों ईंधन के लिए कल्पवृक्ष को उखाड़ डाला है।
अनासक्ति
वैराग्य एवं तपस्या की कमी के कारण आज कल लोग परमात्मा तो बनना चाहते हैं किन्तु महात्मा नहीं बनना चाहते हैं।
अनासक्ति
दो अक्षरों का 'मम' (यह मेरा है ऐसा भाव) मृत्यु है और तीन अक्षरों का 'न मम' (यह मेरा नहीं है, ऐसा भाव) अमरता है।
अनासक्ति
हे भव्य! यह समझ लो मोक्ष का रहस्य वैराग्य ही है।
अनासक्ति
काम करने पर भी बोझ न लगे यह अनासक्ति का रूप है।
अनासक्ति
यौवन, रूप, जीवन, धन-संग्रह, आरोग्य और प्रियजनों का समागम ये सब अनित्य हैं विवेकशील पुरुषों को इनमें आसक्त नहीं होना चाहिए।
अनासक्ति
सबसे अधिक अच्छी लगने वाली वस्तुओं का संग्रह ही पुरुष के लिए दुःखदायी है एवं जो अकिंचन है, वह विद्वान् अनंत सुख पाता है।
अनासक्ति
अंग गल गए हैं, बाल सफेद हो गए हैं, दाँत गिर गए हैं, काँपते हाथों में डंडा लिया हुआ है, फिर भी 'आशा' मनुष्य का पिण्ड नहीं छोड़ती है।
अनासक्ति
'आशा' एक नदी है जिसमें मनोरथ रूपी जल है, तृष्णा रूपी तरंगें उठ रही हैं, राग रूपी मगरमच्छ है, वितर्क रूपी पक्षी है, यह नदी धैर्य रूपी वृक्ष को उखाड़ फेंकने वाली है, इसमें अज्ञान रूपी भँवर हैं, जिनके पार जाना कठिन है और जो अतिगहन हैं, इसके चिन्ता रूपी तट बहुत ऊँचे हैं, इसके पार जाकर विशुद्ध मन वाले योगीराज ही आनन्दित होते हैं।
अनासक्ति
आशा मनुष्यों की कोई आश्चर्यमयी शृंखला है, जिससे बँधे हुए मनुष्य तो दौड़ लगाते हैं तथा उससे मुक्त व्यक्ति पंगु के समान स्थिर रहते हैं अर्थात् आशावान को दौड़ धूप करना पड़ती है।
अनासक्ति
यह ''स्नेहमय पाश'' ज्ञान और वैराग्य, ज्ञान वैराग्य के बिना नहीं तोड़ा जा सकता है।
अनासक्ति
हर कहीं, हर किसी वस्तु में मन को मत लगा बैठिए।
अनासक्ति
इच्छा से पाप का बंध होता है, इच्छा से दुःख होता है, इच्छा को दूर करने से पाप दूर हो जाता है, पाप दूर होने से दुःख दूर हो जाता है।
अनासक्ति
इच्छा रखनी ही है तो पुनः जन्म न लेने की इच्छा रखनी चाहिए।
अनासक्ति
निश्चय ही इस संसार में कर्मों के अनित्य सम्बन्ध से कभी कोई वस्तु स्थिर नहीं रहती है।
अनासक्ति
मनुष्य का जितना चित्त इन्द्रियों के विषयों में आसक्त होता है उतना यदि आत्मा में हो जाये तो बंधन से मुक्त हो जाये।
अनासक्ति
योगी विरक्ति रूपी स्त्री के साथ बड़े वैभवशाली राजाओं की तरह सुख और शान्तिपूर्वक सोता है, पृथ्वी ही उसकी सुन्दर शय्या है, हाथ ही बड़ा तकिया है, आकाश ही चंदोबा है, अनुकूल पवन ही उसका पंखा है, चन्द्रमा ही उसका प्रकाशमान दीपक है।
अनासक्ति
बाहर और भीतर जो कुछ भी मन को फँसाने वाली चीजें हैं, उन सबको छोड़ने से मनुष्य त्यागी होता है, केवल घर छोड़ देने से त्याग की सिद्धि नहीं होती है।
अनासक्ति
जब जगत् का वियोग निश्चित है, तब धर्म के लिए परिवार से स्वयं पृथक् हो जाना अवश्य श्रेष्ठ है।
अनासक्ति
उस व्यक्ति को क्या लाभ जो सम्पूर्ण विश्व को प्राप्त कर ले किन्तु अपनी आत्मा को भूल जाये। धन खोकर अगर हम अपनी आत्मा को पा सकें, तो यह कोई मँहगा सौदा नहीं है।
अनासक्ति
अरे! यह खाल क्या ऐसी अमूल्य वस्तु है, जो अपनी प्रतिष्ठा बेचकर भी इसे बचाये रखना चाहते हो?
अनासक्ति
यदि तुम्हें किसी बात की कामना करनी ही है, तो पुनर्जन्म के चक्र से छुटकारा पाने की कामना करो और वह छुटकारा तभी मिलेगा जब तुम कामना को जीत लोगे।
अनासक्ति
जो विषयों में फँसा है, वही असमर्थ है।
अनासक्ति
विषय-वासनाएँ व्यक्ति को अंधा बनाती हैं।
अनासक्ति
योगी की बाहर की आँखें बंद होती हैं और अंदर की खुलती हैं किन्तु भोगी की बाहर की आँखें खुलती हैं अंदर की बंद हो जाती हैं।
अनासक्ति
वासनाओं का त्याग करो, चिंताएँ स्वयं पीछा छोड़ देंगी।
अनासक्ति
संसार दुःख का कारण नहीं संसार के प्रति आसक्ति दुःख का कारण है।
अनासक्ति