पुण्य झड़ता-पाप गड़ता- पाप काँटे की तरह है, पुण्य फूल की तरह है, काँटे को किसान बुद्धि पूर्वक जला देता है, फूल स्वयं झड़ जाते हैं, उसी प्रकार पाप को साधु बुद्धि पूर्वक छोड़ देता है, पुण्य की निर्जरा चौदहवें गुण स्थान के अन्त में स्वयं हो जाती है। कर्म 0 – भेजें
विपत्ति में धैर्य, ऐश्वर्य होने पर क्षमाभाव, सभा में वचनों की चतुराई, युद्ध में पौरुष, यश में अभिरुचि, स्वाध्याय का व्यसन इतनी विशेषताएँ महात्माओं में स्वभाव से होती है। चरित्र 0 – भेजें
बंदर के अंदर-माया का समन्दर- एक किसान के पास तीन बैल थे, दो को जोतता था एक बँधा रहता था, बैल के समीप एक सीका था जो पेड़ पर टाँग रखा था, जिसमें किसान अपना नाश्ता रखता था, बन्दर बदमाशी करता था, डिब्बा खोलकर भोजन करके जूठन बैल के मुँह में लगा देता था, किसान ने भोजन गायब पाया और बैल का मुँह जूठा देखकर पिटाई करने लगा, बन्दर रोज चालाकी करता, दस-पन्द्रह दिन बीत गये, पड़ोसी ने देखा कि बैल को व्यर्थ में पीटता है, समझाया इसे क्यों पीटते हो? बैल इतने ऊँचे सीके तक कैसे पहुँच सकता है, वह इससे बहुत ऊपर है, किसान ने कहा जूठन तो इसी के मुँह में लगी है फिर सन्देह कैसा? उसने कहा! एक दिन तुम छिपकर देखों मामला क्या है, किसान ने स्वीकार किया, प्रतिदिन की तरह बन्दर आया, खाना खाया, जूठन बैल के मुँह में पोत दी, उसी तरह बैल तो हुआ पुण्य एवं बन्दर हुआ पाप, खोटी प्रवृत्ति पाप करता है, अपयश पुण्य का होता है। कर्म 0 – भेजें
किसी भाग्यशाली मनुष्य की ही लक्ष्मी परोपकार के लिए, विद्या विवेक के लिए और सन्तान समाधि के लिए सहायक होती है। धन 0 – भेजें
संसार में पुण्यशाली मनुष्य की लक्ष्मी विवेक के साथ, बुद्धि शास्त्र के साथ, शक्ति शान्ति के साथ, प्रभुता न्याय/नीति के साथ और श्रद्धा धर्म के साथ मिलकर सफल होती है। समृद्धि 0 – भेजें
औषध, मित्र, नक्षत्र, शकुन, वास्तु और ज्योतिष पुण्य के उदय में अनुकूल होते हैं और पाप के उदय में वे सब प्रतिकूल हो जाते हैं। कर्म 0 – भेजें