जो रत्नत्रय से विशुद्ध हैं, पात्र पर स्नेह करने वाले हैं, परोपकार करते हैं, धर्म का पालन करते हैं, ऐसे संसार से तारने वाले गुरु होते हैं। भक्ति 0 – भेजें
जो विषयों की आशा से रहित हैं, आरम्भ परिग्रह से रहित हैं, ज्ञान-ध्यान-तप में लीन रहते हैं वे तपस्वी प्रशंसनीय हैं। संयम 0 – भेजें
मन्त्र, तीर्थ, व्रती, भगवान्, ज्योतिषी, वैद्य और गुरु में जिसकी जैसी श्रद्धा होती है उसको वैसी ही सिद्धि होती है। भक्ति 0 – भेजें
वर्तमान मुनियों में, प्रतिमाओं में जिनेन्द्र भगवान् की तरह पूर्व मुनियों की स्थापना करके भक्तिपूर्वक पूजा करनी चाहिये क्योंकि केवल चर्चा करने वालों का कल्याण नहीं होता है। भक्ति 0 – भेजें
गङ्गा पाप को, चन्द्रमा सन्ताप को और कल्पवृक्ष दीनता को दूर करता है, किन्तु साधु का समागम पाप सन्ताप और दीनता तीनों को दूर करता है। संगति 0 – भेजें
कलिकाल है, मन चञ्चल है, शरीर अन्नादि का कीड़ा है, पर यह आश्चर्य है कि आज भी जिन लिङ्ग के धारी मनुष्य इस धरा पर हैं। धर्म 0 – भेजें
श्रद्धा है तो गुरु में भी भगवान् के दर्शन कर लेता है, जैसे एकनलव्य ने मिट्टी के गुरु के सामने लक्ष्य प्राप्त कर लिया। नहीं तो रावण के सामने राम, कंस के सामने कृष्ण खड़े थे, पर उन्हीं के निमित्त से दुर्गति प्राप्त कर ली थी। भक्ति 0 – भेजें