कर्म सूक्ष्म हैं जैसे शब्द बोलते समय दिखते नहीं, पकड़ नहीं सकते, किन्तु टेप पूरा ग्रहण कर लेता है, इसी प्रकार कर्म दिखते नहीं किन्तु फल देते हैं, तब पता चलता है। कर्म 0 – भेजें
तेली और क्षत्रिय का झगड़ा हो गया, तेली ने क्षत्रिय को पटक कर दबा दिया, जाति पूँछने पर जोश आया, क्षत्रिय ने तेली को क्षणभर मे नीचे दबा दिया, इसी प्रकार आत्मा क्षत्रिय है, कर्म तेली है, लेकिन अभी कर्मों की जाति नहीं जानी इसलिए आत्मा दबी हुई है। कर्म 0 – भेजें
इन पाँचों का वर्णन पहले हो चुका है, ''तत्त्वार्थश्रद्धानं सम्यग्दर्शनम्'' इसका प्रतिपक्षी मिथ्यात्व। 'हिंसानृतस्तेयाब्रह्म परिग्रहेभ्योव्रतिर्व्रतं' यहाँ अविरति का। ''प्रमत्तयोगात्प्राण व्यपरोपणंहिंसा'' यहाँ प्रमाद का। 'गतिकषायलिङ्ग' इत्यादि एवं 'इन्द्रिय कषायाव्रतक्रिया' इत्यादि सूत्र में कषाय का। 'काय वाङ्मनः कर्मयोगः' यहाँ योग का वर्णन हो गया है। कर्म 0 – भेजें
नागश्री ने अणुव्रत पिता की आज्ञा के विना ले लिये, पिता जी को मालूम चला, तो व्रत वापस करने मुनिराज के पास गये। रास्ते में एक व्यक्ति की पिटाई हो रही थी, कारण पूँछा, बताया कि इसने हिंसा की है इसलिये पीटा जा रहा है। नागश्री ने पिता से कहा कि यही व्रत तो मैंने लिया है इसको छोड़कर शेष वापस कर दो। आगे जिव्हा छेदन, हाँथ काटना, लिङ्ग छेदन, छापा मारी आदि प्रसङ्ग पाकर पाँचों व्रतों की स्वीकृति ले ली, पिता ने सोचा चलो मुनिराज को उलाहना तो दे आयें, विना पूँछे व्रत क्यों दिये? मुनिराज ने कहा ये मेरी पुत्री है इसलिए व्रत दिये, वह घबरा गया और राजा से शिकायत कर दी, राजा मुनिराज से नम्रता पूर्वक पूँछते हैं, तो मुनिराज ने उन्हे अपने भव एवं पहले के रिश्ते बताये, राजा गद-गद हो गया और पुत्री ने कहा वास्तव में आप मेरे जन्म दाता हैं। धर्म 0 – भेजें
पर की निन्दा के समान पाप न भूत में हुआ है न भविष्य में होगा और अपनी निन्दा के समान पुण्य न भूत में हुआ है न भविष्य में होगा। वाणी 0 – भेजें