Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 351

मध्यलोक के अकृत्रिम जिनलय। 169 महापुरुष।

12 सूत्र

नव निधियाँ-1.कालनिधि- में ज्योतिष्शास्त्र, निमित्तशास्त्र, न्यायशास्त्र कलाशास्त्र, व्याकरणशास्त्र पुराण आदि का सद्भाव होता है। 2.महाकालनिधि- में विद्वानों के द्वारा निर्णय करने योग्य पञ्च लोह आदि नाना प्रकार के लोहों का सद्भाव होता है। 3.पाण्डुकनिधि- में शालि, ब्रीही, जौं आदि समस्त प्रकार के धान्य तथा कड़वे-चरपरे आदि पदार्थों का सद्भाव होता है। 4.माणवकनिधि-में कवच, ढाल, तलवार, बाण, शक्ति, तोमर, चक्रादि नाना प्रकार के दिव्य शस्त्रों का सद्भाव होता है। 5.सर्पनिधि- में शय्या, आसन आदि नाना प्रकार की वस्तुओं तथा घर के उपयोग में आने वाले नाना प्रकार के बर्तनों का सद्भाव होता है। 6.सर्वरत्ननिधि- इन्द्रनीलमणि, महानीलमणि, वज्रमणिआदि बड़ी-बड़ी दो शिखा के धारक उत्तमोत्तम रत्नों का सद्भाव होता है। 7.शङ्खनिधि-भेरी, शङ्ख, नगाड़े, वीणा, छल्लरी और मृदङ्ग आदि आघात से तथा फूँककर बजाने योग्य नाना प्रकार के बाजों का सद्भाव होता है। 8.पद्मनिधि- पाटाम्बर, चीन, महानेत्र, दुकूल, उत्तम कम्बल तथा नाना प्रकार के रङ्ग-बिरङ्गे वस्त्रों का सद्भाव होता है। 9.पिङ्गलनिधि-कड़े कटि सूत्र आदि स्त्री-पुरूषों के आभूषण और हाथी-घोड़ा आदि के आभूषणों का सद्भाव होता है। ये नवनिधियां कामवृष्टि नामक गृहपति के अधीन होती हैं और सदा चक्रवर्ती के मनोरथों को पूर्ण करती हैं।
Misc.
श्वेताम्बर मान्यता- नन्दीश्वरद्वीप तक विद्याधर जा सकते हैं, और ऋद्धिधारी मुनि तेरहवे रुचकगिरि द्वीप तक जा सकते हैं।
Misc.
इस अध्याय में वर्णनीय विषय: 1. जम्बूद्वीप का वर्णन नक्शा द्वारा, 2. सुमेरुपर्वत का वर्णन एवं उसकी गणना, कौन सा वन कहाँ है, कितनी ऊँचाई पर है 3. नन्दीश्वर द्वीप का वर्णन, सभी द्वीप और समुद्रों को दूना करके एक सौ त्रेसठ करोड़ चौरासी लाख योजन प्रमाण निकलता है, 4. छियानवे अन्तर्द्वीप का वर्णन, 5. पैतालीस लाख योजन प्रमाण ढाईद्वीप का नक्शा द्वारा वर्णन करना चाहिए, 6. मध्यलोक के चार सौ अठ्ठावन जिनालय का वर्णन, 7. पाँच भरत, पाँच ऐरावत के त्रिकाल सम्बन्धी तीस चौबीसी के सात सौ बीस तीर्थङ्करों का वर्णन करना चाहिए।
Misc.
मध्यलोक के चार सौ अठ्ठावन अकृत्रिम जिनालय- ढाईद्वीप में पञ्चमेरु के अस्सी,
भक्ति
आज्ञा- राष्ट्रपति भवन में राष्ट्रपति का पूरा परिवार रहता है, किन्तु आज्ञा राष्ट्रपति की चलती है, इसी प्रकार स्वर्गों में आज्ञा इन्द्र की ही चलती है।
विविध
सौधर्मेन्द्र अपनी सभा को सम्बोधित करते हुये ऐसे भाव विभोर हो जाते हैं, कि देखों हमारे पास रत्नत्रय धारण करने की योग्यता ही नहीं है, देव कहते हैं कि हे सुरेश्वर! मनुष्य बनकर रत्नत्रय धारण कर सकते हैं, तब इन्द्र ने कहा जो मनुष्य बन जाता है, उनको कल्याण करने की भावना ही नहीं होती है, पृथ्वी पर ब्रह्मलोक से गये रामचन्द्रजी कैसे राग में फँसे हुये हैं, अभी तक कल्याण की भावना ही नहीं हो रही, उनको राज्य और रानियों से मोह नहीं, किन्तु लक्ष्मण जी से अधिक मोह है, इस बात को सुनकर देव उनके स्नेह की परीक्षा करने आये, लक्ष्मणजी से मिले और कहा रामचन्द्रजी मर गये, यह सुनते ही लक्ष्मण जी की मृत्यु हो गयी।
अनासक्ति
पाण्डुक वन में चारों दिशाओं में चार स्वर्ण शिलायें हैं, जम्बूद्वीप से धातकीखण्ड का क्षेत्रफल एक सौ चवालीस गुना है, जम्बूद्वीप से कालोदधि का क्षेत्रफल छः सौ बहत्तर गुना है, जम्बूद्वीप से पुष्करार्ध का क्षेत्रफल ग्यारह सौ गुना है।
विविध
अवसर्पिणी में समुद्र नीचे जाता है, उत्सर्पिणी में समुद्र ऊपर बढ़ता है, इससे सिद्ध है कि क्षेत्र की भी हानि वृद्धि होती है।
समय
पञ्चमकाल के तीन वर्ष, साढ़े आठ माह शेष रहने पर कार्तिक वदी अमावस्या को प्रातः स्वाति नक्षत्र में मुनि, आर्यिका, श्रावक, श्राविका चारों एक साथ स्वर्ग जायेंगे।
समय
भरत-ऐरावत में उत्सर्पिणी-अवसर्पिणी का विधान है, विजयार्द्ध पर्वत और म्लेच्छखण्ड में नहीं, अतःपञ्चम काल के अन्त में कुवृष्टि के समय विद्याधर और देव विजयार्द्ध की गुफाओं में मनुष्यों को छिपा देते हैं।
विविध
एक सौ उनहत्तर महापुरुष- चौबीस तीर्थंकर, अड़तालीस माता-पिता, चौबीस कामदेव, बारह चक्रवर्ती, नौ नारायण, नौ प्रतिनारायण, नौ बलभद्र, चौदह कुलकर, ग्यारह रूद्र, नौ नारद।
विविध
मिथ्यादृष्टि देव भी नन्दीश्वर की वन्दना करने जाते हैं तभी तो लिखा है ''वयन नहीं कहे, लखि होत सम्यक धरम''।
भक्ति