Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 343

द्रव्य परावर्तन के दृष्टान्त।

34 सूत्र

गति मार्गणा- औदयिक भाव के 'गतिकषाय.... ' इत्यादि सूत्र से।
ज्ञान
इन्द्रिय मार्गणा-'पञ्चेन्द्रियाणि, द्विविधानि' सूत्र से।
ज्ञान
काय मार्गणा- 'संसारिणस्त्रसस्थावरा:' सूत्र से।
ज्ञान
योग मार्गणा- 'विग्रहगतौ कर्मयोग:' सूत्र से।
ज्ञान
वेद मार्गणा- 'गतिकषायलिङ्ग....50-51-52 आदि सूत्र से।
ज्ञान
कषाय मार्गणा-'गतिकषायलिङ्ग...' सूत्र से।
ज्ञान
ज्ञान मार्गणा- 'ज्ञानाज्ञानदर्शन...' इत्यादि 4-5-7 वें सूत्र से।
ज्ञान
संयम मार्गणा- '5 वे 6' वें सूत्र से।
ज्ञान
दर्शन मार्गणा- 'ज्ञानाज्ञानदर्शन....' आदि चौथेसूत्र से।
ज्ञान
लेश्या मार्गणा- '6' वें सूत्र में औदायिक भाव से।
ज्ञान
भव्य मार्गणा- 'जीवभव्याभाव्यत्वानि च' सूत्र से।
ज्ञान
सम्यक्त्व मार्गणा-'1-6-7' वें सूत्र से।
ज्ञान
द्रव्यपरावर्तन- लवणसमुद्र का विस्तार दो लाख योजन है, उसमें पूर्व दिशा से जुँआरी और पश्चिम से सेल डाला जाए, लहराते-लहराते जब सेल जुँआरी के छेद में घुस जाये, उतने काल को द्रव्य परावर्तन कहते हैं।
समय
वृक्ष की राख उड़ जाये, पुन: उसी स्थान पर वृक्ष बनने में जितना समय लगे, वह एक द्रव्यपरावर्तन कहलाता है।
समय
नित्य निगोदिया जीव के पञ्च परावर्तन नहीं होते हैं क्योंकि 66,336 बार जन्म-मरण नहीं होते हैं।
कर्म
संसारी जीव राशि अक्षय अनन्त है, छ: माह आठ समय में छ: सौ आठ जीव मोक्ष जाते हैं, सिद्धों की वृद्धि तथा संसार की हानि होने पर भी कभी संसार खाली नहीं होगा, जैसे लवणसमुद्र का पानी एक तृण में एक बूँद लेकर कालोदधि में डालने से, कालोदधि की वृद्धि हुयी, और लवणसमुद्र एक बूँद खाली हुआ।
कर्म
संसारिणो मुक्ताश्च- बहुवचन का मतलब है मुक्त जीव दो भेद वाले हैं, जीवन मुक्त (केवली भगवान), शरीर मुक्त (सिद्ध भगवान), संसारी जीव भी एकेन्द्रियादि के भेद से अनेक प्रकार के हैं।
धर्म
जीवकाण्ड की बीस प्ररूपणाएँ तत्त्वार्थसूत्र के दूसरे अध्याय में इस प्रकार से निकलती हैं जैसे-
ज्ञान
संज्ञी मार्गणा- ' समनस्कामनस्का: '11 वें सूत्र से।
ज्ञान
आहार मार्गणा- 'एकं द्वौ त्री न्वानाहारका:' सूत्र से।
ज्ञान
गुणस्थान प्ररूपणा- '1-5-6-7' वे सूत्र से।
ज्ञान
जीव समास प्ररूपणा-'पृथिव्यप्ते..,द्वीन्द्रियादय..' आदि सूत्र से।
ज्ञान
प्राण प्ररूपणा- 'पञ्चेन्द्रियाणि' सूत्र से।
ज्ञान
संज्ञा प्ररूपणा- 'एकं द्वौ त्रीन्वानाहारक:' सूत्र से।
ज्ञान
पर्याप्ति प्ररूपणा- 'पञ्चेन्द्रियाणि' सूत्र से।
ज्ञान
उपयोग प्ररूपणा- 'उपयोगोलक्षणं' सूत्र से।
ज्ञान
जैसे पुराणों में कथा चालू होती है, उसी प्रकार दूसरे अध्याय के बारहवें सूत्र से संसारी जीव की कथा चालू होती है।
ज्ञान
पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, केवली, आहारकशरीर, देव और नारकियों के शरीर में निगोदिया जीव नहीं होते हैं, शेष सभी जीवों के शरीर में निगोदिया जीव होते हैं।
प्रकृति
लिफाफा को टिकिट ले जाता है या टिकिट को लिफाफा, कर्म जीव को विग्रह गति में ले जाता है उसे अनुश्रेणि गति कहते हैं।
कर्म
गर्भ जन्म वालों को ही रत्नत्रय की प्राप्ति होती है, अन्य जन्म वालों को नहीं।
धर्म
सूक्ष्म निगोदिया मनुष्य पर्याय धारण कर देशव्रती बन सकता है, पर अग्निकाय, वायुकाय जीव तिर्यञ्च ही बनते हैं।
कर्म
पृथ्वी जलादि को कायिक कहते है निगोद को कायिक नहीं जीव कहते हैं।
प्रकृति
अग्निकाय, वायुकाय के चार शरीर राजवार्तिकार मानते हैं- औदारिक, तैजस, कार्मण और वैक्रियक।
प्रकृति
जिस प्रकार भार ढोने वाला पुरुष कांवर के द्वारा भार ढोता है, उसी प्रकार संसारी जीव शरीर रूपी कांवर के द्वारा कर्मों के भार को ढोता है।
कर्म