Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 334

अंधे के हाथ में लेम्प। राजामधु। अशान्तिसागर। वज्रकर्ण। धवलसेठ।

22 सूत्र

क्षमा का अर्थ है भूलों पर ध्यान न देना।
क्षमा
अन्धे के हाथ में लेम्प- किसी ने अन्धे को धक्का मार दिया, उसका घड़ा फूट गया, फिर भी उसी को डाँटते हैं, क्यों अन्धे हो दिखता नहीं ? अन्धे ने जबाब दिया जी नहीं दिखता, दूसरे दिन अन्धा हाथ में लेम्प लेकर पानी भरने जा रहा था, वही व्यक्ति उसको फिर मिला, पूछा ! आप कल कह रहे थे, हम अन्धे हैं फिर आपने लेम्प क्यों ले रखा है ? उसने जबाब दिया आप जैसे आँखों वालों को राह दिखाने के लिये, सज्जन पुरूषों का कितना भी नुकसान हो जाये वे क्रोधित नहीं होते हैं।
क्षमा
क्षमा का अर्थ है गुणों की ओर दृष्टि रखना एवं सबकी आत्मा को समान समझना।
क्षमा
भटके हुए को शाम तक इष्टमार्ग पर लौटने का अवसर ही क्षमा है।
क्षमा
अन्तः करण की उदारता का नाम क्षमा है।
क्षमा
सामाजिक क्षमा- समाज के दबाव वश अपराधी को क्षमा करना।
क्षमा
पारिवारिक क्षमा- परिवार में सन्तुलन और शान्ति बनाने के लिए अपराध को क्षमा करना।
क्षमा
कौटुम्बिक क्षमा- पारिवारिक सम्बन्ध बिगड़ न जाए, अतः सम्बन्ध कायम रखने के लिए क्षमा करना।
क्षमा
राष्ट्रीय क्षमा- देश के उत्थान के लिए महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों के अपराध क्षमा करना।
क्षमा
व्यवहारिक क्षमा- लोक व्यवहार के लिए क्षमा करना, जैसे किसी ने आपको धक्का मार दिया, आपने कहा दिखता नहीं, उसने क्षमा माँग ली, आप चुप हो गये, यह व्यवहारिक क्षमा है।
क्षमा
किसी ने निमन्त्रण दिया आप नही पहुँचे, वह मिला थोड़ा क्रोध का अभिनय किया, क्षमा मांग ली।
क्षमा
धर्म किसी व्यक्ति विशेष का नहीं होता, जो पाले उसका होता है।
धर्म
आत्मा आँखों से दिखाई नहीं देती, अनुभव से जानी जाती है, जैसे हवा दिखाई नहीं देती, पर अनुभव से जानी जाती है।
ज्ञान
मैं सब जीवों को क्षमा करता हूँ, सभी जीव मुझे क्षमा करें, मेरी सभी से मित्रता है किसी से भी बैर नहीं है।
क्षमा
बेटे ने पिता जी से पूँछा, आज क्या है? पिताजी बोले क्षमावाणी है, पिता जी यह क्या होता है ? बेटा ! जो क्रोध करता है, वह नरक जाता है। बेटे ने पापा की जेब से चुपके से पाँच रूपये निकाल लिये। पिता क्रोधित होकर पूँछने लगे, किसने निकाले ? बेटा ने कहा पापा आपकी क्षमावाणी बड़ी सस्ती है, पाँच रुपये में बिक गयी। ''हम को सीख लेना चाहिए कि पैसों की नहीं धर्म की कीमत है।''
क्षमा
राजा मधु की क्षमा- शत्रुघ्न को मथुरा का राज लेने के लिये राजामधु से घमासान युद्ध करना पड़ा, जब मधु का शरीर वाणों से जर-जर हो गया, तो हाथी पर बैठे-बैठे सब परिग्रह का त्याग कर मुनि बन गए, शत्रुघ्न को मालूम हुआ तो क्षमा माँगी, नमस्कार किया, राजा ने कृतज्ञता ज्ञापित की कि आपने बहुत उपकार किया कल्याण का अवसर दिया।
क्षमा
नाम अशान्ति सागर- एक व्यक्ति अपनी स्त्री से बार-बार कहता है मैं दीक्षा ले लूँगा, लेकिन लोग उसे लौटा लाते, इस बार किसी ने नहीं रोका, दीक्षा ले ली, नाम शान्तिसागर हो गया, किसी लड़के ने नाम पूँछा, बता दिया, दो-तीन बार पूँछने आया तो गुस्से में बोले अब नहीं आना, नहीं तो पीटूँगा, उसने नाम बदल दिया शान्ति नहीं अशान्ति सागर हैं आप।
क्षमा
एक सज्जन ने स्वाध्याय का नियम ले लिया, दीवाली की सफाई में चौका, लेम्प, शास्त्र कहीं रख कर भूल गया, नहीं मिलने पर, डण्डा उठाकर सबको पीटना शुरू कर दिया, अतः स्वाध्याय ऐसा करें कि शास्त्र कहीं शस्त्र न बनें।
क्षमा
वज्रकर्ण का नियम- एक बार वज्रकर्ण ने मुनि महाराज से नियम लिया कि मैं देव-शास्त्र-गुरु के अलावा किसी को नमस्कार नहीं करूँगा, जब वह अपने स्वामी सिंहोदर के सामने जाता था तो अपनी अङ्गूठी में मुनिसुव्रतनाथ भगवान् के चित्र को नमस्कार करता था, एक बार किसी ने सिंहोदर राजा से शिकायत कर दी, कि वज्रकर्ण आपको नमस्कार नहीं करता है, तो सिंहोदर ने आदेश दे दिया कि ! वज्रकर्ण का सर्वस्व हरण करके बन्दी बना लो, इसी समय राम-लक्ष्मण-सीता वहाँ पहुँचते हैं, लक्ष्मण को भोजन के लिए आया जानकर वज्रकर्ण ने तीनों को स्वादिष्ट भोजन कराया, रामचन्द्रजी लक्ष्मण से कहते हैं ! 'ऐसा भोजन तो कोई अपने जमाई को भी नहीं करायेगा', अतः इस धर्मात्मा की विपत्ति दूर करना चाहिए, लक्ष्मण जाकर सिंहोदर को बन्दी बना लाते हैं, वज्रकर्ण से पूँछते हैं कि इसको क्या सजा दी जाय ? तब वज्रकर्ण कहता है की ये हमारे स्वामी हैं, इनको क्षमा कर दीजिये, सिंहोदर ने क्षमा से प्रभावित होकर आधा राज्य वज्रकर्ण को दे दिया।
क्षमा
बाली ने रावण को गृहस्थ अवस्था में क्षमा किया और मुनि अवस्था में कैलाश पर्वत पर भी क्षमा किया था।
क्षमा
धवल सेठ ने श्रीपाल जी को समुद्र में गिरा दिया, उनकी पत्नी रयणमञ्जूषा से बलात्कार करना चाहा, श्रीपाल जी को भाण्ड सिद्ध करने की भी कोशिश की, फाँसी लगने की नौवत आ गयी, इसके बाद भी राजा से कहा कि ये हमारे धर्म पिता हैं, इन्हें फाँसी पर न चढ़ाया जाये और धर्मात्मा श्रीपाल जी ने पाँच सौ लोगों के साथ धवलसेठ का निमन्त्रण किया, अपने हाथ से पड्डा झुलाते हुए खीर-पुड़ी का भोजन कराने लगे, सेठ को अत्यधिक पश्चात्ताप व आत्मग्लानी हुयी और हृदयाघात से मरण को प्राप्त हो गया था।
क्षमा
दस लक्षण पर्व के तत्काल बाद मनाया जाने वाला क्षमावाणी पर्व एक ऐसा महापर्व है जिसमें हम बैरभाव को छोड़कर एक दूसरे से क्षमा याचना करते हैं, इसे क्षमापना भी कहते हैं, मन के मैल को धो डालने वाला यह पर्व आज मात्र शिष्टाचार बन कर रह गया है, यह बात नहीं कि इसे हम बड़े उत्साह से न मनाते हों, आज न हम इससे उदास हुये हैं तथा मात्र उत्साह से ही नही, अति उत्साह से मनाते हैं, इस अवसर पर सारे भारत वर्ष में लाखों रूपयों के कार्ड छपाये जाते हैं, उन्हें चित्रित सुन्दर लिफाफों में रखकर हम इष्ट मित्रों को भेजते हैं, लोगों से गले लगकर मिलते हैं, क्षमा याचना भी करते हैं, पर यह सब यन्त्रवत् चलता है, हमारे चेहरे पर मुस्कान भी होती है पर बनावटी, हमारी असलियत न मालूम कहाँ खो गयी है? क्षमा याचना जो कि बिल्कुल व्यक्तिगत चीज थी, वह आज बजारू बन गयी है, वास्तविक क्षमावाणी तो यह होना चाहिए कि अपनी गलतियों का उल्लेख करते हुए विनय पूर्वक आमने-सामने या पत्र द्वारा शुद्ध हृदय से क्षमा याचना करें एवं पवित्र भाव से दूसरों को क्षमा करें अर्थात् क्षमा भाव धारण करें, इस प्रकार जब हमारा हृदय दश धर्मों की आराधना से क्षमा भाव से आकण्ठ आपूरित हो उठे और वाणी में भी छलकने लगे, तब वस्तुतः क्षमावाणी होती है।
क्षमा