Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 289

धन्यकुमार चरित्र दान का श्रेष्ठतम फल।

19 सूत्र

पानी बाढ़े नाव में, घर में बाढ़े दाम। दोनों हाथ उलीचिये यही सयानो काम।।
दान
भिखारी भीख नहीं माँगते हैं घर-घर जाकर शिक्षा देते हैं कि हे लोगों! दान दो-दान दो मैंने पहले दान नहीं दिया था इसी कारण मुझे आज भीख माँगनी पड़ रही है।
दान
राजा अरिञ्जय ने दो चारणऋद्धि धारी मुनियों को आहारदान दिया, पञ्चाश्चर्य हुये, सोलहकारण भावना भायी, तीर्थंङ्कर प्रकृति का बन्ध किया, वे 16वें तीर्थंङ्कर शान्तिनाथजी बने।
दान
दानवीर की चेरी- दानवीर सेठ की लक्ष्मी रोज सेवा करती थी, किसी ने इसका रहस्य समझना चाहा, लक्ष्मी ने कहा मेरा पति वह है जो मेरा सदुपयोग करता है मैं उसकी चरण चेरी बन जाती हूँ, जो सञ्चित करता है उसके लिये खञ्जर बन जाती हूँ।
दान
सुख अभिलाषी मनुष्य पवित्राचरण से पुण्य सम्पादन करें।
चरित्र
गिरते ही उसे णमोकार मन्त्र याद आया।
णमोकार
इसी महा मन्त्र का ध्यान करने से जो शुभकर्म का बन्ध होता है उससे दुष्टों द्वारा किये घोर उपद्रवों का भी नाश हो जाता है।
णमोकार
जो मूर्ख दूसरे का धन लेते हैं वे पाप के उदय से अपनी लक्ष्मी का भी नाशकर जन्म-जन्म में दरिद्री होते हैं।
कर्म
जितनी भी वस्तुएँ दुःख का कारण होती हैं वह सब पाप का फल है, इस अनिष्ट का कारण पाप को प्राण जाने पर भी नहीं करना चाहिए।
कर्म
लक्ष्मी पुण्य से आती है और पुण्य पात्रदान से होता है, और साधु को केवल आहारदान दिया जा सकता है, इसलिए जिनालय वनवाकर लक्ष्मी का सदुपयोग करना चाहिए, क्योंकि मन्दिर में सारे पवित्र कार्य होते हैं, हजारों वर्ष तक प्रतिमाएँ पूजी जाती हैं।
दान
सच है अधिक पाप का अथवा अधिक पुण्य का उदय उसी वक्त हो जाता है, पूजा करने वाले स्वर्ग में जाते हैं, निर्माल्य खाने वाले नरक में जाते हैं, विष खा लेना अच्छ परन्तु निर्माल्य खाना अच्छा नहीं है।
कर्म
दान दुर्गति का नाशक है, हित करने वाला है, अतः दान में आलस नहीं करना चाहिए, दान के द्वारा ही गृहस्थी गुणवती मानी गयी है, बुद्धिमानों का प्रयत्न दान के लिए हुआ करता है, दान को छोड़कर कोई उत्तम सुख का देने वाला नहीं है, समझदार ही दान देते हैं, दान ही पात्र के मन को अपनी ओर खींचता है, अतः यही कहना है, कि सब लोग दान जरूर दिया करें।
दान
णमो अरहन्ताणं इत्यादि मन्त्र का स्मरण करता हुआ आ रहा था, पाप के उदय से भूखे व्याघ्र ने खा लिया, मन्त्र के प्रभाव से समाधिमरण कर सौधर्म स्वर्ग में महा ऋद्धिधारी देव हुआ।
णमोकार
अकृतपुण्य ने अवधिज्ञान से स्वर्ग का कारण पात्रदान व्रतादि की भावना को जाना।
दान
सुपात्र दान णमोकार स्मरण आदि उत्तम भावना भाओ।
दान
अन्याय करने से थोड़े ही दिनों में जितना पुराना और नवीन धन था सब नष्ट हो गया।
कर्म
पुण्य से राज वैभव आदि मिलता है, देवता मुख्य जान सत्कार करते हैं, अतः पुण्य करना चाहिए।
कर्म
देखो दुःखी और दरिद्र अकृतपुण्य केवल दान की भावना से तथा थोड़े से दान के फल से धन्यकुमार हुआ फिर तपकर सर्वार्थसिद्धि गया अतः गृहस्थों को दान की शिक्षा लेना चाहिए।
दान
धन्यकुमार चरित्र- अकृतपुण्य नामक दरिद्र जीव ने पूर्व भव में बलभद्र माँ के घर रहते हुए मासोपवासी सुव्रत मुनि को दान की भावना व नवधाभक्ति सहित खीर का आहार दिया, उसी पुण्य से वह अगले भव में धनपाल वैश्य का पुण्यशाली पुत्र धन्यकुमार हुआ, जिसके पुण्य से निधियाँ प्रकट हुईं; ईर्ष्यालु भाइयों के अनेक उपद्रव णमोकार मन्त्र व पुण्य के प्रभाव से टलते रहे, अन्त में वर्धमान भगवान् के समवसरण में दीक्षा लेकर, बाईस परीषह सहते हुए महामुनि बनकर सल्लेखना पूर्वक मरण कर सर्वार्थसिद्धि में अहमिन्द्र हुआ और मोक्षगामी है — यह कथा दान के श्रेष्ठतम फल को दर्शाती है।
दान