Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 281

धनार्जन मे कष्ट- विसर्जन...।

11 सूत्र

जो जीर्णोद्धार, प्रतिष्ठा, जिनपूजा और तीर्थ यात्रा के अवशिष्ट धन निर्माल्य को भोगता है, वह बाद में नरक के दुःख भोगता है।
कर्म
सज्जन को पुत्र मरण का इतना शोक नहीं होता, जितना आहारदान से रहित दिन का शोक होता है।
दान
यौवन में भोग भोगना और बुढ़ापे में त्याग करना, आम चूस कर बाद में, गुठली का दान करने जैसा है।
अनासक्ति
त्यागी हुई वस्तु ग्रहण करना वमन ग्रहण करने के तुल्य है।
अनासक्ति
जैसे बिल में सर्प अकेला ही जाता है, वह घर भी बिल के सामान है जहाँ अतिथि नहीं आते हैं, रोटी, कपड़ा और मकान से मनुष्य पर्याय की सार्थकता नहीं होती है।
दान
दान करने वालों को दवा नहीं खाना पड़ती, जो दान नहीं करता उसका धन दवाखाने में जाता है।
दान
पहले लोग सोचते थे कोई आवे तो हम खावें, अब सोचते हैं ये जावें तो हम खावें, यही संस्कृति में विकृति है।
दान
सिर के एक सफ़ेद बाल को देखकर सज्जनों को शीघ्र ही वैराग्य हो जाता है किन्तु दुर्जनों की जैसे-जैसे वृद्धावस्था आती है वैसे-वैसे तृष्णा बढ़ती जाती है।
अनासक्ति
कञ्जूस के समान दाता न हुआ है न होगा, क्योंकि वह धन को छुए विना ही दूसरों को दे देता है, अर्थात् स्वयं दान व भोग न करके पूरा छोड़ करके चला जाता है।
अनासक्ति
उखली, चक्की, चूल्हा, जल का घड़ा, झाड़ू इनके कारण गृहस्थ को मोक्ष नहीं होता है।
अहिंसा
रागी जीव कर्मों से बँधता है, वैरागी जीव कर्मों से छूटता है, ऐसा जिनेन्द्र भगवान् का उपदेश है, इसलिए किसी भी पदार्थ में राग मत करो।
अनासक्ति