Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 264

तीनों अवस्था व्यर्थ।

7 सूत्र

जैसे चलनी में डाला गया जल सर्व प्रयत्न करने पर भी नष्ट हो जाता है, उसी तरह चञ्चल चित्त से धारण किया गया व्रत-तप नष्ट हो जाता है।
मन
भोगों को इतना भोगा कि खुद को ही भोग बना डाला। साध्य और साधन का अन्तर, मैंने आज मिटा डाला॥
अनासक्ति
तप करते यौवन गयो, द्रव्यगयो मुनि दान। प्राण गये सन्यास में, तीनो गये न जान॥
समय
यमराज का पत्र- सेठ ने यमराज से दोस्ती की और कहा आने के पूर्व पत्र देना, उसने वादा किया, पहला पत्र- सफेद बाल किये पर सेठ ने हेयर डाय करा लिया, दूसरा पत्र दाँत गिराये तो बत्तीसी लगवा ली, तीसरा पत्र आँख कान खराब किये, तो चश्मा और मशीन लगवा ली, चौथा पत्र अटैक आया तो बायपास सर्जरी करवा ली, जब यमराज लेने आया तो सेठ ने कहा आपने धोका किया, यमराज ने कहा हमने चार पत्र दिये थे पर आपने आत्म कल्याण के लिए प्रयत्न नहीं किया।
समाधि
विवेकहीन जीव जिस देह से संसार बीज का सिञ्चन करते हैं, विवेकी जीव उसी देह से संसार बीज को सुखा देते हैं।
विवेक
मनुष्य की उम्र चालीस वर्ष (बाल कहानी)- ब्रह्माजी ने मनुष्य, कुत्ता, गधा और उल्लू इनको चालीस-चालीस वर्ष की उम्र दी, मनुष्य ने अपना काम पूछा, कि हमें क्या करना है? ब्रह्माजी ने बताया तो मनुष्य ने कहा, बहुत कम उम्र है, गधे ने कहा हम कब तक भार ढ़ोते रहेंगे। कुत्ते ने कहा हम कब तक द्वारे-द्वारे जाकर अपमानित होकर टुकड़े खाते रहेंगे, उल्लू ने कहा हम कब तक अन्धे बनकर जियेंगे, तब इन जीवों की आधी-आधी उम्र लेकर मनुष्य को दे दी, इसलिए मनुष्य चालीस वर्ष के बाद गधे की तरह भार ढ़ोता रहता है, साठ वर्ष के बाद कुत्ते की तरह द्वार पर बैठा रहता है और अस्सी के बाद उल्लू की तरह अन्धा बनकर बैठा रहता है।
समय
तीनों अवस्था व्यर्थ खो दीं- एकगरीब व्यक्ति पर प्रसन्न होकर राजा ने उसे तीन घण्टे के लिए रत्नों के कोठे में प्रवेश दे दिया, इतने समय में तुम जितने रत्न ले जाना चाहो ले जाओ, इसके बाद उस कोठे से एक भी रत्न नहीं ले सकते, उस मूढ़ ने रत्नमयी गोरख धन्धे का खिलौना देखा, हाँथ लगाते ही वह बिखर गया, द्वारपाल ने कहा इसको ठीक करो, तभी आगे जा सकते हो, उसने उसे ठीक करने में ही सारा समय निकाल दिया, एक भी रत्न नहीं ले पाया, द्वारपाल ने पकड़कर बाहर कर दिया। कृपालु राजा ने दुबारा उसे तीनघण्टे के लिए सोने, चाँदी, के कोठे में भेजा वहाँ पर स्त्रियाँ स्वागत के लिए खड़ीं थी, उनके स्वागत में वह भूल गया और सोने-चाँदी का कुछ भी सामान नहीं ले पाया, अन्त में राजा ने पीतल-ताम्बे के कोठे में भेजा, वहाँ पर भोजन-पानी रखा था, वह खा पीकर सो गया और सारा समय खत्म कर दिया और खाली हाथ घर गया, इसी तरह मानव बाल अवस्था खेल-खिलौनों में, जवानी भोगों में, बुढापा खा-पी कर सोने में गुजार देता है और मानव पर्याय में कुछ भी आत्महित नहीं करता है।
समय