Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 208

लालच का इलाज।

15 सूत्र

जो दस बीस पचास भये, शत लक्ष करोड़ की चाह लगेगी, अरब खरब लो उदय भये तो, धरापति होने की आश लगेगी। उदय अस्त तक राज्य भयो, पर तृष्णा और ही ओर बढ़ेगी, सुन्दर एक सन्तोष विना नर, तेरी तो भूख कबहुँ न मिटेगी।।
संतोष
जीवन की विसङ्गति को नियंत्रित करना चाहते हो तो लोभ को नियन्त्रित करो।
संतोष
सन्तोष ही उन्नत धन है।
संतोष
निमित्त मिलने पर भी जो क्रोधादि नहीं करता है, वह गुणों में अधिक होने से गुणियों का भी गुरू है।
क्षमा
सम्पत्ति की मित्रता पुण्य से है, व्यक्ति से नहीं।
कर्म
पेट भर सकता है, पेटी नहीं।
संतोष
लाभ के बाद लोभ होता हैं, इसलिए सन्तोष रुपी अमृत का पान करना चाहिए।
संतोष
राम के भाई भरत ने खड़ाऊ रखकर राज्य किया था।
अनासक्ति
समय से पहले किस्मत से ज्यादा किसी को नहीं मिलता हैं।
संतोष
जर, जोरू, और जमीन झगड़े की जड़ तीन।
धन
यदि सम्मान घटा कर आय बढ़ती है तो उस धन से निर्धनता ही श्रेयस्कर है।
चरित्र
जैसे तुषारपात से कमल मुरझा जाते हैं वैसे ही लोभ कषाय के उदय में सम्यग्दर्शनादि गुण नष्ट हो जाते हैं।
कर्म
राग–द्वेष खून–मांस से भी अपवित्र है, क्योंकि खून–मांस के रहते केवलज्ञान हो जाता है, पर राग–द्वेष के रहते नहीं हो सकता है।
अनासक्ति
सनतचक्रवर्ती के पास देव जब उनकी सुन्दरता के दर्शनार्थ आये थे तब उतना शौच धर्म नही था, जितना मुनि अवस्था में कोढ़ हो जाने पर था।
धर्म
बहिरात्मा देह की उज्ज्वलता, स्नानादि को शौच धर्म कहते हैं, शौच धर्म आत्मा को उज्ज्वल करने से होता है।
धर्म