Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 207

उत्तम शौच धर्म- लोभ मचाता क्षोभ।

17 सूत्र

सब अपने लिये रोते हैं।
अनासक्ति
अग्नि की सङ्गति से लोहा पिटता है और लोभ की सङ्गति से आत्मा पिटती है।
संगति
दुनिया में दो ही बड़े, दामोदर अरू दाम। दामोदर बैठे रहें, दाम करे सब काम।।
धन
जैनों में भी ऐसे लोग हैं, जो न महावीर को न राम को सिर्फ, दौलत राम को मानते हैं।
धन
लोभी हमेशा भविष्य की चिन्ता में खोया रहता है।
धन
पैदा हुये व्यापार सीखा, धन कमा बूढ़े हुये। बन्धुजन को छोड़कर धन, इस जगत से चल दिये।।
अनासक्ति
जो साधु वैराग्य को धारण कर लेते हैं उन्हे शौच धर्म होता है।
धर्म
सोने को देख कर मन तो भर सकता है, पर पेट नहीं।
संतोष
सन्तोष रूपी जल से जो लोभ रूपी मल को धोता है और भोजन में लालसा रहित होता है, वह शौचधर्म को प्राप्त होता है।
संतोष
तृष्णा की खाई खूब भरी, पर रिक्त रही वह रिक्त रही।
संतोष
चींटा–चींटी का इतना तीव्र लोभ होता है, कि उनकी गर्दन अलग हो जाये पर त्वचा नहीं छोड़ते हैं।
धन
जिनको पचास वर्ष शास्त्र सुनते हो गये हैं, फिर भी उन्हे धर्म का ज्ञान नहीं हुआ, यह सब अन्याय का धन और अभक्ष्य भक्षण का फल है।
कर्म
गुरू द्रोही, धर्म द्रोही, मित्र द्रोही, कृतघ्नी, विश्वासघाती ये सदा मलिन रहते हैं।
चरित्र
कौरवों के मन में उमड़ी सत्ता और साम्राज्य की लालसा महाभारत का कारण बनी।
धन
अतीत में जितने झगड़े हुये थे, वे सब लोभ के कारण हुए थे, जैसे कौरव–पाण्डवों का युद्ध, ''नहीं रहे वे लोभी कौरव जूँझ मरे रण में''।
धन
गरीबी नहीं, तृष्णा दुष्कर्मों की जननी है।
संतोष
नीतिकारों के अनुसार राम स्वर्ण मृग के पीछे गये तो सीता हरण हो गया, उसी प्रकार हमारा आत्माराम भी लोभ लिप्साओं के स्वर्ण मृग के पीछे लगा है, अतः सुख शान्ति रूपी सीता खो गयी है।
धन