Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 57

पुजारी बने भिखारी नहीं

18 सूत्र

परमात्मा प्राप्ति की उत्कृष्ट अभिलाषा न होने में खास कारण है–सांसारिक सुख की इच्छा, आशा और भोग।
अनासक्ति
भगवान् को मनाने में नहीं अपितु भगवान् को मानने में कल्याण होता है।
भक्ति
भोजन शरीर की खुराक है और भजन आत्मा की खुराक है।
भक्ति
भगवान् तक आवाज तभी पहुँचती हैं, जब हृदय पवित्र हो और हृदय पवित्र करने का उपाय पवित्र भोजन करना है। मांस–मछली, अण्डे, शराब आदि गलत वस्तुओं का सेवन करते हो, तो आपकी आवाज प्रभु के पास तक नहीं पहुँच पाएगी।
आहार
जैसे श्रद्धा के बिना वैद्य की औषधि काम नहीं करती, उसी प्रकार आस्था के बिना मन्त्र भी काम नहीं करता है।
भक्ति
केवल ईश्वर का चिन्तन करने वाला मन, केवल मधु ही पीने वाले भ्रमर के समान है।
भक्ति
मनुष्य के द्वारा चमत्कार और देवों के द्वारा अतिशय होता है।
विविध
आज व्यक्ति परमात्मा से अपने लिए स्वर्ग माँगने की जगह दूसरों के लिए नरक माँग रहे हैं।
विविध
संसार का संपूर्ण विस्मरण और परमात्मा का सतत् स्मरण ही मुक्ति है।
भक्ति
संसार की तरफ चलने वाले का कोई भी साथी नहीं होता, पर भगवान् की तरफ चलने वाले के सब साथी हो जाते हैं।
भक्ति
पुण्य के सृजन और पाप के विसर्जन में ही इहलोक व परलोक में सुख मिलता है।
कर्म
सुख के लिए परमात्मा की प्रार्थना होना चाहिए, याचना नहीं।
भक्ति
संसार से सम्बन्ध जोड़ें तो दु:खों का अन्त नहीं है और भगवान् से सम्बन्ध जोड़ें तो सुखों का (आनन्द का) अन्त नहीं है।
भक्ति
जिसकी बुद्धि में जड़ता (सांसारिक भोग और संग्रह) का ही महत्त्व है, ऐसा मनुष्य कितना ही विद्वान् क्यों न हो, उसका पतन अवश्यम्भावी है, परन्तु जिसकी बुद्धि में जड़ता का महत्त्व नहीं है और भगवत्प्राप्ति ही जिसका उद्देश्य है, ऐसा मनुष्य विद्वान् न भी हो तो भी उसका उत्थान अवश्यम्भावी है।
भक्ति
मनुष्यों के रूप में परमात्मा सदा आपके सामने है, अत: उनकी सेवा करो।
दान
विचारों का सम्मान होता है पर आचरण की पूजा होती है।
चरित्र
पूजा करने वाला पूजा करने में अपने उत्तम गुणों को बाहर लाता है।
भक्ति
भगवान् की पूजा के लिए सबसे अच्छे पुष्प हैं–श्रद्धा, भक्ति, प्रेम, दया, मैत्री, सरलता, साधुता, समता, सत्य, क्षमा आदि दिव्य गुण।
भक्ति