Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 35

मौन रखता कौन

41 सूत्र

वही मैत्री घनिष्ठ है, जिसमें अपने प्रीति-पात्र की इच्छा के अनुकूल व्यक्ति अपने को समर्पित कर दे।
संगति
सच्ची मित्रता वही है, जिसमें मित्र आपस में स्वतंत्र रहें और एक-दूसरे पर दबाव न डालें। विज्ञजन ऐसी मित्रता का कभी भी विरोध नहीं करते हैं।
संगति
जो व्यक्ति यह सोचते हैं कि हमें उस मित्र से कितना मिलेगा, वे उस श्रेणी के लोग हैं, जिन की चोरों और बाजारू औरतों में गिनती होती है।
संगति
जिस समय तुम कोई ऐसा काम करने में लगे हो, जिसे तुम पूरा कर सकते हो; उस समय यदि कोई तुम्हारे मार्ग में रोड़े अटकाता है तो उससे तुम एक शब्द भी न कहो, बल्कि धीरे-धीरे उससे सम्बन्ध छोड़ दो।
संगति
मित्र सिर्फ साथी ही नहीं सारथी भी होता है।
संगति
मौन प्रार्थनाएँ परमात्मा तक जल्दी पहुँचती हैं क्योंकि वह मुक्त होती हैं, शब्दों के बोझ से।
वाणी
मधुर बोलना कला है मौन रहना महाकला है।
वाणी
आदमी बोलकर ज्यादा फँसता है।
वाणी
मौन आगमन सम्बन्धी विघ्नों को हरने वाला है, मित्रता को करने वाला है, रत्नत्रय का सम्मान करने वाला है, समय पर अज्ञान हरने वाला है।
वाणी
राजा, अधिक विद्वान्, अधिक तपस्वी, बहु संख्या में उपस्थित मूर्ख, शत्रु तथा गुरुओं को उत्तर नहीं देना चाहिए, उनकी भर्त्सना को चुपचाप सुन लेना चाहिए।
वाणी
मौन बुद्धिमान और मित्र बनाता है।
वाणी
मौन आत्मशक्ति के विकास का अच्छा निमित्त है, दूसरों से बोलने में समय बिताने से मुझ एकाकी को क्या मिलेगा?
वाणी
मनुष्य जितना बोलकर अपना काम बिगाड़ता है उतना मौन से कभी नहीं।
वाणी
मौन के वृक्ष पर शान्ति के फल लगते हैं।
वाणी
क्रोध को जीतने में मौन जितना सहायक होता है, उतनी अन्य कोई भी वस्तु नहीं।
वाणी
वाणी का वर्चस्व चाँदी है किन्तु मौन सोना है।
वाणी
ज्ञानियों की सभा में मौन अज्ञानियों का आभूषण है।
वाणी
जो सही जीवन जीता है और सही है; उसके मौन में दूसरे के शब्दों से अधिक शक्ति होती है।
वाणी
मौन समस्त विवादों को समाप्त कर देता है।
वाणी
मौन रहने वाला ही मौज में रह पाता है।
वाणी
यदि आप चुप रहेंगे तो आपको पछताना नहीं पड़ेगा।
वाणी
मौन के द्वारा इन्द्रियों पर नियंत्रण आसान हो जाता है।
संयम
व्यक्ति भाषा के द्वारा दूसरों से और मौन के माध्यम से स्वयं से संपर्क स्थापित करता है।
वाणी
हमारे पवित्रतम विचारों का मंदिर मौन है।
वाणी
शब्द दूसरों से जोड़ते हैं और मौन स्वयं से जोड़ता है।
वाणी
शब्द संवाद-विसंवाद उत्पन्न करते हैं किन्तु मौन स्वयं का स्वाद उत्पन्न करता है।
वाणी
शब्द हीरे-मोती से भी ज्यादा अमूल्य हैं, आवश्यकता पड़ने पर ही बोलें अन्यथा मौन रहें।
वाणी
मौन रहने से सत्य मृत नहीं हो जाता है।
सत्य
जब तुम्हें कषाय की तीव्रता हो, तब तुम मौन ले लो क्योंकि उस समय निकले वचन दूसरों के अहित और क्लेश करने वाले होंगे जिससे तुम्हें पछताना होगा।
वाणी
बोलना आकुलता की जननी है किन्तु मौन परमार्थ का मित्र है।
वाणी
यह तो सुनिश्चित है कि बोलने के काल में बोलने वाला स्वलक्ष्य का श्रद्धानी चाहे बना रहे, परन्तु स्वलक्ष्योपयोगी नहीं रहता अतः अधिक मौन रहो, मौन मुमुक्षु का सर्वोपरि कार्य है।
ध्यान
स्वाधीन कार्य है लेखन व स्वाध्याय।
ज्ञान
अपने राज दूसरों को बताने से आप बर्बाद हो जायेंगे।
वाणी
अनुभव कहता है खामोशियाँ बेहतर हैं क्योंकि लोग शब्दों से रूठते बहुत हैं।
वाणी
मौन रहने से अथवा सत्यवचन बोलने से वचन सिद्धि होती है।
वाणी
जहाँ विचारों का सम्मान न हो और सत्य अप्रिय लगे वहाँ मौन रहना अच्छा है।
वाणी
मौन से वृद्धावस्था में आनंद एवं सम्मान का जीवन बीतता है।
वाणी
मौर्ख्य के कारण नूपुर पैरों में रखा जाता है और चुप रहने के कारण हार हृदय पर सुशोभित होता है।
वाणी
मौन के फल से इस जन्म में सुखी परभव में नर मोक्ष पाता है नारी पुरुषत्व पाती है। यदि वृद्धों को सुखपूर्वक जीना है अथवा शान्तिपूर्वक मरना है तो मौन रहना चाहिए। मौन और एकान्त आत्मा के सर्वोत्तम मित्र हैं।
वाणी
तिरस्कार दिखाने का सबसे अच्छा ढंग है-मौन।
वाणी
मौन निद्रा के सदृश है, यह ज्ञान में नई स्फूर्ति पैदा करता है।
वाणी