Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 11

अनुमोदना

20 सूत्र

निरपराधी मनुष्य पर अपराध का आरोप लगाना महापाप है।
अहिंसा
लोक में विश्वास घात से बढ़कर दूसरा कोई पाप नहीं है।
चरित्र
पाप का परिवार-पिता-लोभ, माता-हिंसा, भाई-झूठ, बहन-चिंता, पुत्र-परिग्रह, पुत्री-माया, मूल मुखिया क्रोध है।
कर्म
पाप का बोध परिवर्तन लाता है।
कर्म
भूखा मनुष्य क्या पाप नहीं करता? दुर्बल (भूख से व्याकुल) मनुष्य निर्दयी हो जाते हैं।
अहिंसा
मानसिक पीड़ा शारीरिक पीड़ा की अपेक्षा अधिक कष्टप्रद होती है।
मन
यदि मनुष्य शरीर में जो भी क्रूरता और कठोरता का भाव धारण करता है तो वह मनुष्य रूप में नारकीय जीव या यमदूत माना जायेगा।
अहिंसा
शाकाहार से हिंसात्मक विचार नहीं उठते हैं।
आहार
संस्कृति की रक्षा से ही प्राणियों की रक्षा सम्भव है।
अहिंसा
सत्य और दया को नहीं त्यागें उन्हें अपनी ग्रीवा पर माला की तरह पिरो लें, अपने हृदय पटल पर अंकित कर लें।
अहिंसा
जो दूसरे को दुःख देता है, उसका पूजन-भजन में मन नहीं लगता है।
अहिंसा
जो दूसरों का बुरा करता है, वह वास्तव में अपना ही महान् बुरा करता है और जो दूसरों को सुख पहुँचाता है, वह वास्तव में अपने को ही सुखी बनाता है।
अहिंसा
जितनी छूट या स्वतंत्रता आप अपने लिए चाहते हैं उतनी दूसरे को क्यों नहीं देना चाहते हैं? सिर्फ स्वाद, सौन्दर्य और सम्पदा (सम्पत्ति) के लिए हिंसा होती है।
अहिंसा
अपनी मान्यताओं को दूसरों पर थोपना हिंसा है।
अहिंसा
जीने के लिए साधु नहीं बना जाता, समाधि के लिए बना जाता है। अतः कितनी बड़ी बीमारी आ जाये परन्तु हिंसा की औषधि मत लेना।
अहिंसा
घर में पिच्छी होने पर पिच्छी लेने की याद बनी रहती है एवं अचानक किसी की सल्लेखना हो तो भी काम आ सकती है।
समाधि
ज्ञान, वैभव और आनंद जितना बाँटो वह अनेक गुना वापस लौटेगा।
दान
संसार में वह गरीब नहीं जिसके घर खाना न हो, गरीब तो वह है जो गुणियों के गुण कहने में दरिद्रता रखता हो।
विनम्रता
महिलाएँ पारिवारिक जीवन बखूबी निभा सकती हैं, शर्त यह है कि परिवार में उनकी तारीफ होती रहे।
परिवार
''परिवार रूपी बगीचे के माली बने मालिक नहीं।''
परिवार