Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Humility

विनम्रता

456 सूत्र · पृष्ठ 2 / 7

अहंकार को तोड़ने का तरीका है-झुकना सीखो।
विनम्रता
अहंकार उत्थान के नहीं, पतन के मार्ग खोलता है।
विनम्रता
अहम् से बढ़कर पाप नहीं, रहम से बढ़कर धर्म नहीं।
विनम्रता
अभिमान से देव दानव बन जाता है, विनम्रता से दानव भी देव बन जाता है।
विनम्रता
दूसरों को कमजोर अपने को बड़ा समझने वाला कालांतर में खजूर का वृक्ष बनता है।
विनम्रता
आदमी बड़ा विचित्र है, पकड़ता है अहंकार को और पाना चाहता है आनन्द को।
विनम्रता
अहंकारी को आध्यात्मिक आनन्द की अनुभूति कदापि नहीं हो सकती है।
विनम्रता
अभिमान ही पराभव का द्वार है।
विनम्रता
नाश के पूर्व मनुष्य अहंकारी हो जाता है किन्तु नम्रता सदैव मनुष्य को सम्मान प्रदान करती है।
विनम्रता
अहंकार करना मूर्खों का काम है।
विनम्रता
अहंकार एक ही सुख जानता है दूसरों को नीचा दिखाने का।
विनम्रता
अहंकार चाहता है कि सब मुझे ध्यान दें और मैं सबकी उपेक्षा करूँ।
विनम्रता
अहंकारी व्यक्ति से बड़ा दीन व्यक्ति खोजना असंभव है।
विनम्रता
जिस प्रकार पत्थर पर फूलों के पौधे नहीं उगते, उसी प्रकार अहंकारी के आचरण से सदाचार का पौधा अंकुरित नहीं होता है।
विनम्रता
अहंकार का गिरना ही आत्म साक्षात्कार है।
विनम्रता
मनुष्य जितना अहंकारी होगा, उसका व्यक्तित्व उतना ही घटिया होगा।
विनम्रता
परमात्मा झगड़ने से नहीं झुकने से मिलते हैं, अकड़ने से नहीं सिकुड़ने से मिलते हैं।
विनम्रता
अहंकार को जीतने के लिए हमेशा अपने अतीत और औकात को याद रखें।
विनम्रता
अहंकारी व्यक्ति मिट सकता है, पिट सकता है, लुट सकता है लेकिन झुक नहीं सकता है जबकि झुके बिना कभी झोली भरती ही नहीं है।
विनम्रता
गुरुजनों के क्रोधित होने पर जवाब न देना और उनकी सेवा-शुश्रुषा करना उनके क्रोध शान्ति की औषधि है।
विनम्रता
नम्रता व्रतों की अपेक्षा ज्यादा जरूरी है।
विनम्रता
सत्य का पालन करने वाले के लिए विनम्र होना आवश्यक होता है।
विनम्रता
नम्रता से देवता भी मनुष्य के वश में हो जाते हैं।
विनम्रता
ज्ञानियों का विश्वास है कि वास्तव में महान् व्यक्ति का लक्षण उसकी नम्रता है।
विनम्रता
नम्रता को बहुत से विद्वानों ने एक व्रत कहा है।
विनम्रता
नम्रता मनुष्य का आभूषण है।
विनम्रता
नम्रता तो सबके साथ हो, पर निकटता कुछ लोगों के ही साथ होना चाहिए।
विनम्रता
नम्रता सभी के प्रति रखी जा सकती है किन्तु विनय पूज्यों के प्रति होना चाहिए।
विनम्रता
जिसे दूसरे की सुविधा व दूसरे को निभाने की दृष्टि से झुकना और राह छोड़ना नहीं आता है वह जिंदगी में कुछ भी नहीं कमा पाता है यहाँ तक कि संतोष भी नहीं मिलता है।
विनम्रता
आश्चर्य है, आदमी मान-सम्मान पत्र चाहता है जबकि चार प्रकार की कषायों में मान भी एक कषाय है।
विनम्रता
नम्रता सारे सद्गुणों का दृढ़ स्तंभ है।
विनम्रता
विनम्रता के मार्ग से ही विपत्तियों के दलदल को पार किया जा सकता है।
विनम्रता
विनम्रता और श्रद्धा के सामने सभी तर्क बेअसर हो जाते हैं।
विनम्रता
पाँव का जूता सिर पर आये, इससे पहले सिर चरणों में रख दो, इज्जत बच जायेगी।
विनम्रता
जो झुकना जानता है, दुनिया उसे उठाती है, जो केवल अकड़ना ही जानता है, दुनिया उसे उखाड़कर फेंकती है।
विनम्रता
मान-सम्मान से दूर रहकर ही सच्ची विरक्ति प्राप्त हो सकती है।
विनम्रता
अपने से बड़ों के खड़े रहने पर स्वयं न बैठे रहो। जो गुरु के आने पर खड़े नहीं होते वह मरने के बाद अजगर बनते हैं।
विनम्रता
विनयशील, कर्त्तव्यपरायण व्यक्ति को परमात्मा भी अपनी गोद में बैठा लेना चाहता है।
विनम्रता
अनुशासित शिष्य शिक्षा को सुगमता से प्राप्त कर लेता है।
विनम्रता
भाग्य से ज्यादा, समय से पहले वही पाता है जो सन्त के चरणों में माथा झुकाता है।
विनम्रता
सम्मान की आकांक्षा में ही अपमान छुपा है।
विनम्रता
सत्कारपूर्वक स्वीकार किया गया सत्कार ही संतोष उत्पन्न करता है।
विनम्रता
सम्मान उसे ही देना चाहिए जो सम्मान को पचा सके और उतना ही देना चाहिए जिससे उसका अभिमान न जागे और अपना भी सम्मान बना रहे।
विनम्रता
जो अपने गुरुजनों का आदर नहीं करता वह अपना ही अपमान करता है।
विनम्रता
जब गृह पर शत्रु के भी आने पर उसका सम्मान किया जाता है तो फिर महापुरुषों के आने पर उनका सम्मान क्यों नहीं किया जाना चाहिए?
विनम्रता
आपका अपमान आपके सम्मान की आकांक्षा है।
विनम्रता
जिन लोगों को परामर्श का ज्ञान होता है उनका अपमान मत करो।
विनम्रता
स्वार्थ और अभिमान-इन दो चीजों से स्वभाव बिगड़ता है अतः साधक को स्वार्थ और अभिमान का सर्वथा त्याग कर देना चाहिए।
विनम्रता
झुको उनके चरणों में जिन्होंने स्वयं की इन्द्रियों को झुका दिया है।
विनम्रता
उसके आगे हमेशा सिर झुकाओ जिसने तुम्हें सिर उठाना सिखाया है।
विनम्रता
हमारी संस्कृति हाथ मिलाने और हाथ हिलाने की नहीं, अपितु हाथ जोड़ने की है।
विनम्रता
नम्रता की परीक्षा अधिक गुणी या अधिक यश वाले पुरुषों के समागम में होती है।
विनम्रता
सम्मान सुख का साधन नहीं आत्मज्ञान सुख का साधन है।
विनम्रता
निरभिमानता की परीक्षा अभिमान या अपमान का निमित्त मिलने पर होती है प्रशंसा के काल में तो सभी नम्र बन जाते हैं।
विनम्रता
जिसने मान का मर्दन कर दिया हो, वही बड़भागी वैय्यावृत्य कर सकता है।
विनम्रता
विनम्रता से हर उम्र में, हर जगह, हर क्षेत्र में इंसान की पहचान बनती है।
विनम्रता
जैसे पृथ्वी समस्त जीवों का आधार है वैसे ही 'विनय' समस्त सद्गुणों का आधार है।
विनम्रता
जिसके पास विनय है, कल्पवृक्ष उसका सेवक है, चिन्तामणि रत्न उसके हाथ में है तथा यश उसके निकट है।
विनम्रता
शोक से बचना है तो शौक करना छोड़ दो। लघुता से प्रभुता प्राप्त होती है।
विनम्रता
महानता अहंकार में नहीं विनय में हुआ करती है। अहं से मौजूद गुण नष्ट हो जाते हैं।
विनम्रता
जीवन में सरलता से बढ़कर सुख नहीं, यदि पलकें झुकाकर जियोगे तो दुनिया पलकें बिछा देगी। दूसरों के प्रति उदारता, अपने प्रति कृपणता रखना ही दयालुता है।
विनम्रता
विनय के बिना विद्या, विज्ञान, दर्शन, चारित्र इत्यादि गुण भी आदर को प्राप्त नहीं होते हैं।
विनम्रता
जो प्रभु के सामने झुकता है वह सबको अच्छा लगता है लेकिन जो सबके सामने झुकता है, वह प्रभु को अच्छा लगता है।
विनम्रता
जो व्यक्ति जितना गुणवान होता है, वह उतना ही विनय से भरा होता है।
विनम्रता
अहंकार दिखाकर किसी रिश्ते को तोड़ने से अच्छा है कि माफी माँगकर उस रिश्ते को निभाया जाये।
विनम्रता
विनम्रता इंसान को सर्वत्र लोक प्रिय बनाती है शत्रु को मित्र बनाती है।
विनम्रता
विनम्रता वह चीज है जो पहाड़ को भी झुका सकती है, चट्टान को भी रुला सकती है।
विनम्रता
जहाँ से विनम्रता हटती है, वहाँ से सहज ही प्रभु की अनुकम्पा समाप्त हो जाती है।
विनम्रता
विनम्रता संसार सागर से तरने का श्रेष्ठ साधन है।
विनम्रता
विनय से गुरु, सर्व संघ, राजा, परिवार, शत्रु आदि सभी वश में हो जाते हैं।
विनम्रता
अज्ञानी मिथ्यादृष्टि ही परमेष्ठी की अवज्ञा करता है।
विनम्रता
जितनी जिनवाणी-जिनदेव के प्रति विनय होती है उतनी ही जिनेश्वर के लघुनन्दन मुनिराज की विनय करना चाहिए।
विनम्रता
शिक्षा का फल विनय है, विनय का फल सर्व कल्याण, विनय से संयम, तप, ज्ञान की वृद्धि होती है।
विनम्रता
जितनी विनय असंयमी संयमी की करता है उससे अधिक विनय संयमी को अपने संयम की करना चाहिए।
विनम्रता
फल युक्त वृक्ष और कुलीन मनुष्य नम्र होते हैं परन्तु सूखे वृक्ष और मूर्ख मनुष्य कभी नम्र नहीं होते हैं।
विनम्रता