किसी निश्चय पर पहुँचना यही विचार का उद्देश्य है और जब किसी बात का निश्चय हो गया है, तब उसको कार्य रूप में परिणत करने में विलम्ब करना भूल है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
किसी भी काम में सफलता प्राप्त करने का यही मार्ग है कि जो मनुष्य उस काम में दक्ष है, उससे उस काम का रहस्य मालूम कर लेना चाहिए। पुरुषार्थ 0 – भेजें
किसी भी क्षेत्र में उत्कृष्टता एक पूरे जीवन काल के परिश्रम के द्वारा ही प्राप्त की जा सकती है, इससे कम मूल्य पर उत्कृष्टता को नहीं खरीदा जा सकता है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
जिस प्रकार श्रम शरीर को शक्ति प्रदान करता है, उसी प्रकार कठिनाइयाँ मनुष्य को शक्ति–सम्पन्न बनाती है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
यदि झुर्रियाँ हमारे माथे पर पड़नी ही हैं तो भी उन्हें हृदय में मत पड़ने दो। उत्साह को कभी वृद्ध नहीं होना चाहिए। पुरुषार्थ 0 – भेजें
अच्छा काम करते रहो कोई सम्मान करे या न करे, सूर्य का उदय तब भी होता है जब करोड़ों लोग सोये होते हैं। पुरुषार्थ 0 – भेजें
साहस और धैर्य ऐसे गुण हैं जिनकी कठिन परिस्थितियों में बड़ी आवश्यकता होती है। संकट में साहस का होना आधी मंजिल तय कर लेना है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
भविष्य चाहे जितना भी सुखद हो, उस पर विश्वास न करो, भूतकाल की भी चिंता न करो, हृदय में उत्साह भर कर और ईश्वर में विश्वास कर वर्तमान में कर्मशील रहो। पुरुषार्थ 0 – भेजें
अभ्यास की शक्ति तो देखो–निरन्तर अभ्यास से किसी विषय का अज्ञ उस विषय का ज्ञाता हो जाता है, पर्वत भी धीरे–धीरे घिसकर चूर्ण बन जाता है और बाण भी अपने सूक्ष्म लक्ष्य तक पहुँच जाता है। मनुष्य जिस–जिस वस्तु का लगातार चिन्तन करता है, अभ्यास वश उसी–उसी की ओर मन का झुकाव हो जाता है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
जिनके हृदय में उत्साह होता है, वे पुरुष कठिन से कठिन कार्य आ पड़ने पर भी हिम्मत नहीं हारते हैं। पुरुषार्थ 0 – भेजें
हमारी उन्नति का एक मात्र उपाय यह है कि हम पहले वह कर्त्तव्य करें जो हमारे हाथ में है और इस प्रकार धीरे–धीरे शक्ति संचय करते हुए क्रमश: हम सर्वोच्च अवस्था को प्राप्त कर सकते हैं। पुरुषार्थ 0 – भेजें
मानव के सभी गुणों में साहस पहला गुण है क्योंकि वह सभी गुणों की जिम्मेदारी लेता है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
कई बार हम सोचते हैं कि परिवर्तन के लिए समय लगता है, लेकिन परिवर्तन तो उसी क्षण से संभव है जिस क्षण आपने सोच लिया कि बदलना है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
संकट पहले अज्ञान और दुर्बलता से उत्पन्न होते हैं और फिर ज्ञान और शक्ति की प्राप्ति कराते हैं। पुरुषार्थ 0 – भेजें
प्रतिभा को बढ़ाने के लिए अभ्यास से संस्कार को ताजा करने के अतिरिक्त दूसरा उपाय नहीं है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
धर्म, विद्या और धन का प्रतिदिन लेशमात्र भी संग्रह करते रहने से वे समुद्र से भी अधिक हो जाते हैं। पुरुषार्थ 0 – भेजें
जो कार्य अचानक कभी हो वह दोष है लेकिन जिसे सुधारा जा सकता है उस कर्त्तव्य में उदासीनता करना प्रमाद है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
जूतों पर पॉलिश करने वाला अपाहिज पॉलिश कराने वालों को पहले पढ़ने पुस्तक देता था ताकि उतनी देर वह समय का सदुपयोग करें कुछ गुण ग्रहण करें और मेरी दयनीय दशा देखकर सहयोग न करें मैं कर्मयोग करूँ। पुरुषार्थ 0 – भेजें
जब तक आप रुकते नहीं हैं तब-तक सफलता आपके पीछे चलती है, वह ये मायने नहीं रखती कि आप कितनी धीमी गति से आगे बढ़ रहें हैं। पुरुषार्थ 0 – भेजें
मंजिल तो मिल ही जायेगी, भटकने से ही सही। गुमराह तो वे लोग हैं जो घरों से निकलते ही नहीं ॥ पुरुषार्थ 0 – भेजें
जिन्होंने भय को जीवन में आने नहीं दिया और स्वप्रेरणा को प्रबल रखा उन सबने इतिहास रचा जैसे अब्दुल कलाम, सचिन, नरेन्द्र मोदी, गाँधी आदि। पुरुषार्थ 0 – भेजें
पशुओं का चाम तो मरने पर भी काम आता है, तेरे चाम का क्या होगा? अरे! जब तक आरोग्य है तब तक दीन दुःखियों की सेवा और महापुरुषों की वैय्यावृत्ति कर ले। तेरा शान्ति पथ प्रशस्त होगा। आगामी काल की चिंता सम्यक्त्व का अतिचार है। अतः क्या होगा? यह भय मत करो और न अतिभविष्य के प्रोग्राम बनाओ, वर्तमान परिणमन पर ध्यान दो। त्याग तृप्ति का और पर सम्पर्क असंतोष का कारण है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
लीक-लीक गाड़ी चले, लीक ही चले कपूत। दूसरों से लीक छोड़ तीनों चले सायर संत, सपूत!! अतः आप अपना रास्ता स्वयं बनायें। पुरुषार्थ 0 – भेजें
पेड़ की हर डाल हिलने पर भी पक्षी नहीं घबराता है क्योंकि उसे अपने पंखों पर विश्वास है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
खुद को बिखरने मत देना कभी किसी हाल में, गिरे मकान की ईंटें तक ले जाते हैं लोग तेरे गिरने में तेरी हार नहीं क्योंकि तू आदमी है अवतार नहीं। पुरुषार्थ 0 – भेजें
कितनी भी विपरीतता आये, पर आप विचलित मत होना क्योंकि लोगों का काम ही इतना है कि आपको निर्बल कर दें, संकट आते ही इसलिए हैं कि आप निर्बल हो जाओ, लोग आलोचना भी करेंगे कि आप निर्बल हो जाओ, पर आप निर्बल मत होना आपका कोई कुछ नहीं बिगाड़ पायेगा। पुरुषार्थ 0 – भेजें
जिन्दगी में कई मुश्किलें आती हैं और आदमी जरा सी बात में घबराता है। न जाने हजारों काँटों के बीच रहकर भी एक फूल रोज कैसे मुस्कुराता है ॥ पुरुषार्थ 0 – भेजें
कितनों की तकदीर बदलनी है तुम्हें, कितनों को रास्ते पर लाना है तुम्हें। अपने हाथों की लकीरों को मत देखो, इन लकीरों से भी आगे जाना है तुम्हें ॥ पुरुषार्थ 0 – भेजें
मुसीबत की बेला में आँसू मत ढुलकाइए अपनी श्रेष्ठ बुद्धि का उपयोग कीजिए भाग्य के ९९ द्वार बंद होने के बावजूद भी आपके लिए कोई न कोई द्वार अवश्य खुला होगा। पुरुषार्थ 0 – भेजें
हर व्यक्ति को भगवान् सुबह से दो रास्ते दिखाता है—१. उठिये और मनचाहे सपने पूरे कीजिए, २. सोते रहिये और मन चाहे सपने देखते रहिए। पुरुषार्थ 0 – भेजें
आलसी, अज्ञानी, अविवेकी व्यक्ति ही कहते हैं कि भाग्य से अधिक और समय से पहले नहीं मिलता, जबकि वैज्ञानिक युग में जीने वाले पुरुषार्थी पुरुष कहते हैं समय से पहले भाग्य से अधिक मिलता है, आज किसान समय से पहले भाग्य से अधिक फसल पैदा करते हैं, बांझ स्त्री भी संतान सुख प्राप्त कर सकती हैं, यहाँ तक पुरुष स्त्री और स्त्री पुरुष बन सकते हैं। पुरुषार्थ 0 – भेजें
विकल्प मिलेंगे बहुत मार्ग भटकाने के लिए, संकल्प एक ही काफी है मंजिल तक जाने के लिए। अगर निगाहें हों मंजिल पर और कदम हों राहों पर तो ऐसी कोई राह नहीं जो मंजिल तक न ही जाती है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
इस संसार में प्यार करने लायक दो वस्तुएँ हैं, एक दुःख और दूसरा श्रम। दुःख के बिना हृदय निर्मल नहीं होता और श्रम के बिना मनुष्यत्व का विकास नहीं होता है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
जब तक शरीर स्वस्थ और नीरोग है, जब तक बुढ़ापा दूर है, जब तक सभी इन्द्रियों में भरपूर शक्ति है, जब तक प्राण शक्ति क्षीण नहीं हुई है, तभी तक अपने आत्म कल्याण और उत्थान का प्रयत्न करते रहना बुद्धिमानी है, अन्यथा घर में आग लग जाने पर कुंआ खोदने से क्या लाभ? पुरुषार्थ 0 – भेजें
महामति मनुष्य उच्चाभिलाषा रखकर ऊँचे से ऊँचे चढ़ता चला जाता है, जबकि नीच व्यक्ति गिरने के भय से नीचे ही नीचे चला जाता है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
जो कायर हैं, जिसमें पराक्रम का नाम नहीं है, वही भाग्य का भरोसा करता है, बुद्धिमान लोग तो पुरुषार्थ से उत्कृष्ट पद प्राप्त करते हैं। पुरुषार्थ 0 – भेजें
यदि जगत् में आलस्य रूपी अनर्थ न होता तो संसार में कौन धनी मनुष्य या विद्वान् न होता? आलस्य के कारण ही यह समुद्र पर्यन्त पृथ्वी नर-पशुओं से भरी हुई है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
क्रमशः एक-एक बूँद गिरने पर कलश भर जाता है, यही रहस्य सभी विद्याओं धर्म और धन के सम्बन्ध में है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
कटा हुआ वृक्ष भी बढ़ने लगता है, क्षीण हुआ चन्द्रमा भी पुनः बढ़कर पूरा हो जाता है इस बात को समझकर संत पुरुष अपनी विपत्ति से नहीं घबराते हैं। पुरुषार्थ 0 – भेजें
ऐसे सभी कामों से बचाव रखना जो निश्चय से असफल होंगे तथा अपने उद्देश्य से बाधाओं के कारण विचलित न होना ये दोनों सिद्धान्त विद्वान् के पथ प्रदर्शक है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
बुद्धिमान लोगों के सामने असमर्थ और असफल सिद्ध होना धर्म मार्ग से पतित हो जाने के समान है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
स्वाध्याय, ध्यान, भक्ति, पठन-पाठन आदि कार्यों में समय बिताते ही रहो, बेकार बैठे रहने में दुष्कल्पना का उद्भव होने लगता है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
जीवन के अंतिम समय में जो कार्य हम नहीं करना चाहते उन्हें आज ही स्थगित कर दें... और जो कार्य करने जैसा लगे उसे आज से ही करना प्रारम्भ कर दें, अन्त में नहीं। पुरुषार्थ 0 – भेजें
उपवास करने से चित्त अन्तर्मुखी होता है, दृष्टि निर्मल होती है और देह हल्की बनी रहती है, पाप का नाश और पुण्य का बंध होता है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
त्याग और तपस्या तुम्हारे मुख मण्डल पर अंकित हो और तत्परता और क्रियाशीलता तुम्हारे कामों पर हो। पुरुषार्थ 0 – भेजें
जो मन, वाणी और कर्म से पाप नहीं करते हैं, वे ही महात्मा तपस्वी हैं मात्र शरीर सुखा देना ही तपस्या नहीं है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
जैसे किसान घर के घूरे के गोबर को मिट्टी में मिलाकर श्रेष्ठ फसल को उगाता है, वैसे आप भी घूरे रूपी इस शरीर के माध्यम से रत्नत्रय की खेती करके सिद्धि रतन को प्राप्त करो। पुरुषार्थ 0 – भेजें