Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
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संतोष

330 सूत्र · पृष्ठ 2 / 5

जो व्यक्ति थोड़ी चीजों से संतुष्ट नहीं होता है, वह जिन्दगी में कभी भी संतुष्ट नहीं हो सकता है।
संतोष
हर परिस्थिति में अपने को ढालें, कभी बिना ए. सी. पंखे के भी सोने की आदत डालें, हर जगह, हर समय हर चीज उपलब्ध हो जरूरी नहीं है।
संतोष
योग्यता और परिस्थिति को ध्यान में न रखकर महत्त्वाकांक्षा गढ़ने वाला दुःखी रहता है और उपहास का पात्र होता है।
संतोष
यदि तुम्हें शान्ति पसंद है तो तुम अपना ऐसा व्यवहार रखो कि जिस व्यवहार के निमित्त से दूसरों को अशान्ति न पैदा हो क्योंकि तुम्हारे व्यवहार से दूसरों के अशांत होने पर तुमको शान्ति न होगी। कितने ही टूटी टाँग वाले हैं, तुम तो चलते-फिरते हो, कितने ही अंधे हैं तुम्हें तो कुछ दिखता भी है, कितने ही दारिद्रय या अजीर्ण से खा नहीं पाते हैं, तुम तो खाते भी रहते हो, फिर भी शान्ति नहीं रखते?
संतोष
यदि सुखमय जीवन चाहते हो तो अपरिचित रहना सीखो।
संतोष
एक डण्डा मारकर बताया कि एक बज गया, पूछने वाला खुश हुआ। उससे पूछा क्यों हँस रहे? उसने कहा—एक घंटे पहले पूछता तो ये १२ डण्डे मारता, जो हर हाल में राजी है, उसे कोई दुःखी नहीं कर सकता है।
संतोष
जीवन में आप न सबको प्रसन्न रख सकते हो और न सबसे प्रसन्न रह सकते हो अतः शान्ति धारण करो।
संतोष
मैंने सरिता से सीखा है जीने का तरीका, चुपचाप से बहना और अपने मौज में रहना।
संतोष
मैं मानता हूँ जिसकी आशा नष्ट हो गयी वही पुण्यात्मा है, निष्पृह मनुष्य इस लोक-परलोक में इन्द्र तथा चक्रवर्तियों के द्वारा स्तुत्य होता है।
संतोष
सच्चा सुख अनन्त इच्छाओं की पूर्ति के लिए भागने में नहीं है बल्कि जीवन में सादगी, संतोष और सदाचरण अपनाने में है।
संतोष
वस्त्रों का साफ होना जरूरी है, बहुमूल्य होना नहीं।
संतोष
किसी से भी सब खुश नहीं हो सकते अतः अपने संतोष से सन्तुष्ट रहना बुद्धिमत्ता है।
संतोष
जो परिस्थितियों से सामंजस्य करना जानता है, प्रसन्नता परछाई की तरह उसका साथ देती है।
संतोष
वस्त्रों का साफ होना जरूरी है, बहुमूल्य होना नहीं।
संतोष
किसी से भी सब खुश नहीं हो सकते अतः अपने संतोष से सन्तुष्ट रहना बुद्धिमत्ता है।
संतोष
संतोष रूपी अमृत से जो लोग तृप्त होते हैं, उन्हें जो शान्ति और सुख मिलता है, वह धन के लोभियों को इधर-उधर दौड़ने से भी प्राप्त नहीं होता है।
संतोष
जरूरत के मुताबिक जिंदगी जियो ख्वाहिशों के मुताबिक नहीं क्योंकि जरूरत तो फकीरों की भी पूरी होती हैं और ख्वाहिशें बादशाहों की भी अधूरी रह जाती हैं।
संतोष
सद्भाव में तो दुनिया सुखी रहती है पर सन्तों की विशेषता है कि वे अभाव में भी सुखी रहते हैं।
संतोष
एक दिन की खुशी के लिए पिकनिक मनाइये, एक माह की खुशी के लिए शादी कर लीजिए और यदि जीवन भर के लिए खुशी चाहिए हो तो मस्त रहने की आदत बना लीजिए।
संतोष
प्रसन्न-मुख होना मोतियों के खजाने के दान से भी अच्छा है।
संतोष
प्रसन्नता पूर्वक उठाया गया बोझ हल्का प्रतीत होता है।
संतोष
हम जो चाहते हैं यदि वह नहीं पा सके तो उसमें खुश रहें जो हमें मिला है।
संतोष
तीनों लोकों में ये मैत्री, दया, दान और प्रियवचन मनुष्य को सदैव प्रसन्न चित्त रखती हैं।
संतोष
अपने पास प्रतिक्षण प्रसन्नता का गुलाब जल रखें।
संतोष
सदैव प्रसन्न रहो, इससे मस्तिष्क में अच्छे विचार आते हैं और चित्त शुभ कार्यों की ओर लगा रहता है।
संतोष
प्रसन्नचित्त व्यक्ति जहाँ कहीं भी जाता है, वहाँ अपना प्रभाव छोड़ आता है, वह सबको उत्साहित करने के साथ-साथ प्रेरणा देना, प्रसन्न रहना सिखाता है, ऐसा प्रसन्नचित्त व्यक्ति धूप की वह किरण है जिसका अत्यन्त सुखद प्रभाव खेतों और वनस्पतियों पर पड़ता है।
संतोष
मुस्कुराहट के द्वार पर बुढ़ापा दस्तक नहीं देता, इसलिए परमात्मा कभी बूढ़े नहीं होते। सम्पन्नता में सुख नहीं, प्रसन्नता में सुख है।
संतोष
आपको जो भी चाहिए हो उसे अपनी मुस्कुराहट से प्राप्त करो न कि तलवार के जोर से। जीवन में प्रसन्नता उत्पन्न करो क्योंकि प्रसन्न व्यक्ति सबका प्रिय होता है।
संतोष
मन की प्रसन्नता ही व्यवहार में उदारता बन जाती है।
संतोष
मुस्कुराहट से खर्च कुछ नहीं होता किन्तु इससे मिलता बहुत है।
संतोष
मुस्कुराहट थके हुओं के लिए आराम है, निराश लोगों के लिए आशा की किरण है, दुःखी लोगों के लिए सूर्य की रोशनी है और कष्टों के लिए प्रकृति की सबसे बेहतरीन दवा है।
संतोष
मुस्कुराहट मोल नहीं मिलती, न ही इसे चुराया जा सकता है, न ही उधार लिया जा सकता है, न ही भीख में मिलती है क्योंकि इसका तब तक कोई मोल नहीं है, जब तक कि इसे दूसरों को नहीं दिया जाता है।
संतोष
संसार में प्रसन्न रहने का एक ही उपाय है कि अपनी आवश्यकताओं को कम से कम रखो।
संतोष
इस संसार में वही जीव सुख का अधिकारी है जो लौकिक निमित्तों के मिलने पर हर्ष और विषाद से अपने को बचा सकता है।
संतोष
मुस्कान पाने वाला मालामाल हो जाता है, परन्तु देने वाला दरिद्र नहीं होता है।
संतोष
यदि विश्व में कोई ऐसा सद्गुण है जिसकी प्राप्ति सदैव हमारा लक्ष्य होना चाहिए तो वह है प्रसन्नता।
संतोष
जिसके पास प्रसन्नता है समझो उसकी आवश्यकता एवं इच्छाएँ कम हैं।
संतोष
कोई व्यक्ति सिर्फ इसलिए प्रसन्न नहीं दिखाई देता कि उसको कोई परेशानी नहीं है। बल्कि इसलिए प्रसन्न रहता है कि उसका जीवन जीने का दृष्टिकोण सकारात्मक है।
संतोष
यदि प्रसन्न रहना चाहते है तो प्रशंसा सुनने के साथ आलोचना सुनने की शक्ति बढ़ाएँ।
संतोष
फूलों की तरह महकते रहो, सितारों की तरह चमकते रहो, किस्मत से मिली है ये जिन्दगी, खुद भी हँसों औरों को भी हँसाते रहो।
संतोष
हँसी मन की गाँठें बड़ी आसानी से खोल देती है, हँसकर भी जीना है रोकर भी जीना है जब जीना ही है तो क्यों न हँसते-हँसते जिया जाये। अमीर दिल ही मुस्करा सकता है।
संतोष
हँसी मनुष्य के लिए सबसे बड़ा वरदान है क्योंकि जीव जगत् में सिर्फ मनुष्य ही हँस सकता है।
संतोष
चेहरे की हँसी से गम को भुला दो, कम बोलो पर सब कुछ बता दो, खुद न रुठो पर सबको हँसा दो, यही राज है जिन्दगी का, जियो और जीना सिखा दो।
संतोष
पता है तुम्हारी और हमारी मुस्कान में क्या फर्क है? तुम खुश होकर मुस्कुराते हो, हम तुम्हें खुश देखकर मुस्कुराते हैं। मुस्कुराना एक ऐसा उपहार है बिना मोल के भी जो अनमोल है, देने वाले का कुछ कम नहीं होता पाने वाला निहाल हो जाता है।
संतोष
हम अपने प्रण का पालन करते हैं, डाटफटकार सहते हैं और खुश रहते है क्योंकि रंज करना अधर्म कहा है।
संतोष
दूसरों को प्रसन्न रखने की कला स्वयं प्रसन्न होने में है। सौम्य होने का अर्थ स्वयं से व दूसरों से संतुष्ट होना है।
संतोष
जो व्यक्ति प्रसन्न स्वभाव का होता है वह निश्चय ही किसी भी कठिन से कठिन कार्य को सफलतापूर्वक करके संतोषप्रद परिणाम ले सकता है। एक प्रसन्न चित्त युवक जीवन के अभिशाप को वरदान में बदल सकता है।
संतोष
चित्त प्रसन्न रहने से मनुष्य के सब दुःख दूर हो जाते हैं एवं बुद्धि शीघ्र ही अच्छी प्रकार स्थिर हो जाती है।
संतोष
मुस्कुराओ! गुलाब काँटों में मुस्कुराता है, आप भी प्रतिकूलता में मुस्कुराओ तो लोग आपसे गुलाब की तरह प्रेम करेंगे। जीवन में सुख आये तो हँस लेना और दुःख आये तो उसे हँसकर उड़ा देना।
संतोष
तुम हँसोगे तो संसार हँस पड़ेगा किन्तु रोते समय तुम्हें अकेले ही रोना पड़ेगा।
संतोष
कर्ज होना गृहस्थ का कष्ट है, धन रखना योगियों का कष्ट है, आभूषण धारण करना विधवा का कष्ट है, भागना राजा का कष्ट है, पति का परस्त्री आसक्त होना स्त्री का कष्ट है, पुत्र का कुपुत्र होना माता-पिता का कष्ट है, स्त्री का योग्य न होना पति का कष्ट है और मन में संतोष न होना सभी का कष्ट है।
संतोष
आदमी में गुण तभी तक हैं जब तक वह तृष्णा से दूर रहता है।
संतोष
कटोरा लेकर माँगने वाला ही भिखारी नहीं है अपितु संग्रह करने वाला ही सबसे बड़ा भिखारी है।
संतोष
मनुष्य की इच्छापूर्ति तो ईश्वर भी नहीं कर सकता है।
संतोष
महत्त्वाकांक्षाओं का ज्वर ही जीवन को विषाक्त करता है।
संतोष
जिस वस्तु को प्राप्त करने में सन्ताप होता है उसे दूर से ही छोड़ देना चाहिए।
संतोष
भीतर में लोभ न हो तो आवश्यक वस्तु अपने-आप प्राप्त होती है; क्योंकि वस्तु का लोभ ही वस्तु की प्राप्ति में बाधक है।
संतोष
जिस प्रकार काठ अपने ही अंदर से प्रकट हुई अग्नि द्वारा भस्म होकर खत्म हो जाता है, उसी प्रकार मनुष्य अपने ही भीतर रहने वाली तृष्णा से नाश को प्राप्त होता है।
संतोष
लोभी उपकारी नहीं हो सकता है।
संतोष
संतोषरूपी अमृत से जो लोग तृप्त होते हैं उन्हें जो शान्ति व सुख की प्राप्ति होती है, वह धन के लोभियों को जो इधर-से-उधर दौड़ते हैं, उन्हें प्राप्त नहीं होती है।
संतोष
शान्ति ठीक वहाँ से आरंभ होती है, जहाँ महत्त्वाकांक्षाओं का अंत हो जाता है।
संतोष
दासता का कारण स्थूल पदार्थों तथा सांसारिक वस्तुओं की इच्छा करना ही है।
संतोष
सत्य तो निकट है लेकिन अपनी अशान्ति उसे सदा अपने पास नहीं रहने देती है।
संतोष
सन्त नहीं बन सकते तो सन्तोषी बन जाओ।
संतोष
सर्वोत्कृष्ट मानव वह है जिसे सर्वोत्तम सन्तोष है।
संतोष
दुनिया में कोई भी सन्तुष्ट नहीं है—गरीब अमीर होना चाहता है, अमीर सुन्दर दिखना चाहता है, कुँवारे शादी करना चाहते हैं और शादीशुदा मरना चाहते हैं।
संतोष
वे ही सम्पदाशाली हैं जिनको कोई आवश्यकता ही नहीं है।
संतोष
सुख का मूल संतोष है, एक आदमी जल और स्थल के सारे रत्न पाकर गरीब रह सकता है और एक आदमी फटे वस्त्रों और रूखी रोटियों में भी धनी हो सकता है।
संतोष
अनासक्ति और सन्तोष के बिना सुख की कल्पना करना व्यर्थ है।
संतोष
सच्चा सुख तो इस जगत् के सत्य को समझकर सन्तोष प्राप्त करने में हैं।
संतोष
संतोषी सदा सुखी और लालची सदा दुःखी रहता है।
संतोष
वस्तु के अभाव से दुःख नहीं होता, प्रत्युत वस्तु मिल जाए-इस इच्छा से दुःख होता है।
संतोष
सुनना चाहते हैं इसीलिए न सुनने का दुःख होता है। देखना चाहते हैं इसीलिए न दिखने का दुःख होता है। बल चाहते हैं इसीलिए निर्बलता का दुःख होता है। जवानी चाहते हैं इसीलिए वृद्धावस्था का दुःख होता है। तात्पर्य है कि वस्तु के अभाव में दुःख नहीं होता, वस्तु की चाहत से, उसके अभाव का अनुभव करने से दुःख होता है।
संतोष
अजीब चाहत होती है इंसान की जो प्राप्त है उसका आनंद नहीं उठाता क्योंकि इंतजार है थोड़ा और प्राप्त हो जाए और यह थोड़ा कभी खत्म ही नहीं होता है।
संतोष
इस जगत् के पथ में विविध प्रलोभन के गर्त हैं उनसे बचकर रहो अन्यथा सांसारिक यातनाओं के सहने में ही समय बिताना होगा।
संतोष