सीता जी की प्राप्ति के बाद रामचन्द्रजी ने हनुमान जी से कहा मैने अङ्गद, विभीषण सुग्रीव आदि को प्रत्युपकार के रूप में एक-एक पद दिया है, तुम्हे कौन सा पद चाहिए? उन्होंने मना किया रामचन्द्रजी के आग्रह पर बोले मैं दो पद लूँगा, रामचन्द्रजी ने कहा तुम्हारी मर्जी, हनुमान जी बोले मर्जी नहीं अर्जी है वैसे पद से मद आता है, रामचन्द्रजी की स्वीकृति के बाद हनुमान जी ने दोनों पैर पकड़ लिये और कहा प्रभु ये दोनों पद हृदय में रहेंगे तो तीन लोक की सम्पति मिल जायेगी, बाकी के पद अपद हैं, आपद के आस्पद हैं एवं पद में राजी होने वाला भूतपूर्व बन जाता है तथा प्रभु में राजी होने वाला अभूतपूर्व बन जाता है, रामचन्द्रजी ने हनुमान जी के शीश पर आशीष का हाथ रख दिया। भक्ति 0 – भेजें
परिणामों का परिणाम- दोष अर्थात् दुर्बलता या विकारों से मुक्ति ही दुःखों से मुक्ति का उपाय है। विवेक 0 – भेजें
‘जैसा सोचो वैसा पाओ सोऽहम्, शुद्धोऽहम्, बुद्धोऽहम्’ मैं भगवान् जैसा शुद्ध, बुद्ध, ज्ञानी हूँ ऐसा बार-बार ध्यान करने से आत्मा में स्थिरता होती है, आत्म सुझाव, आत्म सम्बोधन, हिंसा छोड़ता हूँ अहिंसा ग्रहण करता हूँ आदि आत्मा को सम्बोधित करके आत्मा को अच्छा बनने की सलाह दें, अवगुण छोड़कर गुणों को ग्रहण करें इससे आत्मा में स्थिरता प्राप्त होती है। ध्यान 0 – भेजें
आत्मा में ही समीचीन भावना उत्पन्न होती है, आत्मा ही हित का ज्ञाता होता है, आत्मा स्वयं ही हित में लगता है इसलिए आत्मा का गुरु आत्मा है और यदि आत्मा पापों को कषायों को अवगुणों को नहीं छोड़ता है तो आत्मा स्वयं का ही शत्रु है। संयम 0 – भेजें