Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 56

अभिमन्यु। मदालसा।

7 सूत्र

पहले बाल परीक्षा फिर वैसी शिक्षा- पूर्व में बच्चे पाँच वर्ष के हो जाते थे, तव उनके सामने तलवार, माला, तराजू, आदि रख देते थे, उससे कहते उठाओ तुम्हें क्या पसन्द है, यदि तलवार उठाई तो सैनिक बनेगा, माला उठाई तो माला जपेगा, तराजू उठाई तो व्यापारी बनेगा, वैसी ही शिक्षा उसको देते थे।
ज्ञान
कपूत का जबाव, माँगा माँ से दवा का हिसाब- बेटा बोला, माँ मैंने तुम्हारी साड़ी और दवाई में इतना खर्च किया है उसका बिल दो, माँ ने कहा बेटा तुम्हें याद नहीं मैंने तुम्हारे लिये कितना खर्च किया, नौ माह पेट में रखा, गर्मी, ठण्डी, वर्षा में स्वयं न सोकर तुम्हें सुलाया भूखे रहकर तुम्हे खिलाया, मैं गीले में तुम्हे सूखे में सुलाया, सभाओं में अपमान सहा, मैंने तुमसे कभी बिल नहीं माँगा?
परिवार
न्याय पूर्वक धन का अर्जन न होने से सन्तान भाग रही है, तलाक दे रही है, सलफ़ास खा रही है।
धन
जिस प्रकार घड़ा बनने पर यदि अग्नि में नही पकाते हैं तो पानी नही भर सकते, उसी प्रकार सन्तान को उत्पन्न किया पर संस्कार नहीं दिया तो कच्चे घड़े की तरह काम में नहीं आएगी।
परिवार
बच्चे गुरुओं (माता-पिता-गुरु) से संस्कार पाते थे तो गुरू बनते थे, अब नौकरों से संस्कार पाते हैं तो नौकर बनते हैं।
परिवार
संस्कारित शिला- उद्यान में लतायें अपनी सुगन्धी दशों दिशाओं में फैला रही थी, वहीं एक विशाल शिला पड़ी थी, लतायें उसको देखकर हँसती और कहती की तुम इतने विशालकाय होकर भी पैरों से रौंदे और ठुकराये जाते हो, वह लज्जित होता था, उस उद्यान में एक शिल्पी आया, उसने संस्कारित करके मूर्ति बना दी, पुष्प मूर्ति के चरणों में पड़ा था, पुष्प ने पूँछा आपकी ये अवस्था कैसे हुयी कि मैं लोगों के सिर पे बैठने वाला, आज आपके चरणों में पड़ा हूँ? उत्तर दिया! शिल्पी ने 'अनावश्यक कलेवर हटाकर' संस्कारित कर दिया गुरु ने प्राणप्रतिष्ठा करके मुझे पूज्य बना दिया, 'जन्मतो जायते शूद्रः संस्कारात् द्विजमुच्यते' अर्थात् जन्म से सभी शूद्र होते हैं, संस्कार से ही उच्च कुलीन माने जाते हैं।
चरित्र
मिट्टी का घड़ा, महिला के शिर पर खड़ा- जमीन में पड़ी मिट्टी ने घड़े से पूँछा, तुम्हारा और हमारा अंश और वंश एक है, फिर तुम सिर पर विराजे हो और मैं पैरों के नीचे पड़ी हूँ? घड़े ने कहा बहिन सत्य है किन्तु हमने खूब संस्कार रूप यातनाएँ सही हैं, कुम्हार ने सबसे पहले परिवार से जुदा किया, खोदा, पानी में गलाया, फिर रौंदा, लौंदा बनाकर चाक पर रखकर घुमाया, चीवर(कपड़े) से काटा, लकड़ी से पीटा, धूप में सुखाया, अवा में पकाया, इतने कष्ट सहे, तब सुन्दरी के सिर का सिंहासन मिला है, इसी प्रकार मानव को संस्कार मिलता है, तो पूज्य बनता है, गर्भ में भी संस्कार मिलता है, अभिमन्यु ने चक्रव्यूह में प्रवेश करना गर्भ में ही सीख लिया था, किन्तु सुभद्रा को नींद आने से चक्रव्यूह से निकलना नहीं सीख पाया था, संस्कार से मुनि या राजा बनते हैं, राजरानी मदालसा ने अपने बैटों को मुनि के संस्कार डाले, खिलाती, सुलाती, झुलाती, पिलाती तब 'सिद्धोऽसि बुद्धोऽसि निरञ्जनोऽसि, संसार माया परिवर्जितोऽसि। संसारस्वप्नं तज मोहनिद्रां, मदालसा वाक्यमुवाच पुत्र!॥' हे पुत्र! तु सिद्धों के समान है, केवलज्ञानियों के समान है, कर्म कलुषता से रहित है, संसार की माया से रहित है, तु संसार को स्वप्न के समान समझकर मोह रूपी निद्रा को छोड़ इत्यादि संस्कारों से सात बेटे मुनि बन गये, तब ससुरजी ने कहा बेटा एक पुत्र ऐसा दो, जो राज्य को चला सके, तब मदालसा ने उसको राजा बनने के संस्कार डाले 'त्वं शूरोऽसि (तुम शूर हो), त्वं वीरोऽसि (तुम वीर हो)' इत्यादि संस्कार देने से वह राजा बना।
चरित्र