Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 411

आठ प्रकार की मुक्ति।

7 सूत्र

खास दास की आस बस, श्वाँस-श्वाँस पर वास, पार्श्व करो मत दास को, उदासता का दास। न तो सुर सुख चाहता, शिव सुख की न चाह, तव थुति सरवर में, सदा होवे मम अवगाह।।
भक्ति
हे भगवन्! आप भक्तों को कैसे तारते हैं? वे ही आपको अपने हृदय में धारण करके पार उतर जाते हैं अथवा ठीक है मशक जो पानी में तैरती है, उसका कारण उसके अन्दर रहने वाली हवा है, उसी प्रकार संसार से पार होने में भगवान् आप ही कारण हैं।
भक्ति
हे जनबान्धव! मैंने आपका नाम सुना, पूजा दर्शन भी किये, किन्तु भक्ति पूर्वक हृदय में धारण नहीं किया, इसलिए दुःखों का पात्र हुआ हूँ, क्योंकि भाव शून्य क्रिया पूर्ण फलदायी नहीं होती है।
भक्ति
यह पर्व हमें उपसर्ग, परिषहों को सहन कर हर बाधा को उत्सव के रूप में समझकर निर्माण नहीं, निर्वाण की ओर बढ़ने की शिक्षा देता है।
समाधि
यह बैर न बैर मिटाता है यह बैर निरन्तर प्राणी को भव सागर में भटकाता है.....।
क्षमा
भगवान् ने संसार के चार मार्ग पार कर पञ्चम गति को प्राप्त किया है।
धर्म
मोह मुक्ति का फार्मूला- सच्चाई के पत्ते एक ग्राम, ईमानदारी की जड़ तीन ग्राम, परोपकार के बीज पाँच ग्राम, सङ्गठन के बहेड़े तीन ग्राम, करुणा का छिलका ग्यारह ग्राम, मिलाप के आँवले दस ग्राम, सत्सङ्ग का रस एक ग्राम, स्वदेश प्रेम का रस पाँच ग्राम इन सब को मिलाकर, परमात्मा की हाण्डी में डालकर, भक्ति के चूल्हे पर रखकर, प्रेम की अग्नि में पकायें, अच्छी तरह पक जाने पर नीचे उतार कर ठण्डा करें, फिर शुद्ध मन के कपड़े से छानकर, मस्तिष्क की शीशी में भर लें। सेवन विधि- इस औषधि को प्रति दिन सन्तोष के गुलकन्द के साथ, इन्साफ की चम्मच से सेवन करें, परहेज- क्रोध की मिर्च, अहङ्कार का तेल, लोभ की मिठाई, धोके के पापड़, दुराचार के मसाले से बचें।
अनासक्ति