Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भक्ति

त्वं तारको जिन! कथं भविनां त एव, त्वामुद्वहन्ति हृदयेन यदुत्तरन्तः। यद्वा दृतिस्तरति यज्जलमेष नून, मन्तर्गतस्य मरुतः स किलानुभावः।।

हे भगवन्! आप भक्तों को कैसे तारते हैं? वे ही आपको अपने हृदय में धारण करके पार उतर जाते हैं अथवा ठीक है मशक जो पानी में तैरती है, उसका कारण उसके अन्दर रहने वाली हवा है, उसी प्रकार संसार से पार होने में भगवान् आप ही कारण हैं।

O Lord! How do you ferry your devotees across? It is they themselves who, holding you in their hearts, cross over. Just as a leather bag floats on water because of the air held within it, so too, O Lord, you alone are the cause of crossing beyond this world.

— आराध्य सूत्र · #2

इसी विषय के और सूत्र

सभी भक्ति →
हे जिनेन्द्र भगवान्! हे देवों के देव! बाल्यावस्था से आज तक आपके श्रीचरणों की सेवा में आसक्त शिष्यों को कल्पलता सम सेवा से जो काल व्यतीत हुआ है, आज उस सेवा का वह फल आपसे चाहता हूँ कि प्राणों के निकलते समय आपके नाम से सहित अक्षरों के पढ़ने में मेरा गला कुण्ठित न हो।
भक्ति