जहाँ तहाँ मिल जात है, सम्पति तिय सुत भ्रात। बड़े भाग ते अति कठिन, सुगुरू कहीं मिल पात।। भक्ति 0 – भेजें
सद्गुरु एक-एक तन्तु को ताना-बाना बुनकर वस्त्र बना देने वाले जुलाहे की तरह हैं, गुरु अनावश्यक अवगुणों को निकाल कर मूर्ति बनाने वाले शिल्पकार की तरह हैं, गुरु माटी को योग्य आकार देने वाले कुम्भकार की तरह हैं। भक्ति 0 – भेजें
मुनि निन्दा- एक व्यक्ति साधुओं की बहुत निन्दा करता था, तो एक सेठजी ने कहा कि मैं अष्टान्हिक में मुनि को आहार देकर ही आहार करता हूँ, आप आठ दिन के लिए मुनि बन जाएँ, आपको बहुमूल्य वस्तु का इनाम एवं बढ़िया आहार करायेंगे, वह व्यक्ति लोभ वश तैयार हो गया, पर केश लोंच करने में दाँतों पसीना आ गया एवं उस दिन उपवास करना पड़ा तो दिन में तारे दिख गये, पारणा के दिन हलुआ पूड़ी भर पेट खा लिया, पानी की कमी पड़ गयी, तो नानी याद आ गयी, दूसरे दिन सेठजी से हाथ जोड़ कर बोले ! ये तपस्या हमारे वश की नहीं है और उस दिन से उन्होंने मुनि निन्दा करना छोड़ दिया। संगति 0 – भेजें
चैत्र मास- ना हो दीक्षा प्रयास-चैत्र में दीक्षा स्वीकार करना बहुत दुःख रूप फल को देने वाला है, वैशाख में रत्नलाभ, ज्येष्ठ में मरण, आषाढ़ में बन्धुनाश, श्रावण में शुभदायक, भाद्रपद में प्रजाहानि, आश्विन में सर्वत्र सुख, कार्तिक में धनवृद्धि, मार्गशीर्ष में शुभदायक, पौष में ज्ञानहानि, माघ में बुद्धि की वृद्धि और फाल्गुन में सर्वत्र सुख-सौभाग्य की प्राप्ति होती है। इस प्रकार मासों में दीक्षा लेने का शुभ-अशुभ फल कहा है। समय 0 – भेजें
शिष्य लक्षण- जो खेल व कौतूहल से रहित हो, लज्जावान हो, अधिक और अतिमधुर आहार करने वाला न हो, दयालु हो, छलरहित हो, ब्रह्मचारी हो, विनय एवं नीति से सहित हो, ज्ञान का उपयोग करने वाला हो, प्रमाद रहित हो, समीचीन उच्चारण करने वाला हो, कृतज्ञ हो, अनेक बार गुरु की आज्ञा का पालन करने वाला हो, शान्त हो, एकाग्रचित्त हो, मधु के समान मधुरभाषी हो तथा अभिमानी न हो वह उत्तम शिष्य माना गया है। चरित्र 0 – भेजें