कुलकर वंश और भवन- प्रथम कुलकर प्रतिश्रुति महाप्रभाव से सम्पन्न एवं अपने पूर्व भव के स्मरण से सहित थे। प्रतिश्रुति कुलकर के स्वर्गस्थ होने पर उन्हीं का पुत्र सन्मति द्वितीय कुलकर हुआ इसी प्रकार सभी कुलकर एक ही वंश के थे। उस समय भरत क्षेत्र में कल्पवृक्ष रूप प्रासाद अन्यत्र नष्ट हो गये थे परन्तु राजा नाभिराय का जो कल्पवृक्ष रूप प्रासाद था वही पृथ्वी निर्मित बन गया था, राजा नाभिराय के उस प्रासाद का नाम सर्वतोभद्र था, उसके खम्भे स्वर्ण मय थे, दीवालें नाना प्रकार के मणियों से निर्मित थीं वह पुखराज तथा मोती आदि की मालाओं से सुशोभित था, इक्यासीखण्ड से युक्त था और कोट, वापिका तथा बाग-बगीचों से अलङ्कृत था। वह अधिष्ठाता नाभिराय के प्रभाव से अकेला ही अनेक कल्पवृक्षों से आवृत था तथा पृथ्वी के मध्य अपने स्थान पर अधिष्ठित था। परिवार 0 – भेजें
आदिनाथ भगवान् का माता के गर्भ में वैसा ही निवास था जैसा कि जल में सूर्य प्रतिबिम्बित होता है। Misc. 0 – भेजें
राजा श्रेयांस-आहारदान- राजा श्रेयाँस के जीव श्रीमति और आदिनाथ जी के जीव वज्रजङ्घ ने दस भव पूर्व चारण ऋद्धि के धारक अपने ही दो पुत्रों के लिए जिस विधि से दान दिया था, वह सब विधि भगवान् के दर्शन करते ही श्रेयाँस की स्मृति में आ गयी, आहार के बाद ऋषभ देव तप की वृद्धि के लिए वन को गये तब देवों ने अभिषेक पूर्वक दान तीर्थङ्कर राजा श्रेयाँस की पूजा की थी। दान, पूजा, तप और शील यह गृहस्थ का चार प्रकार का धर्म शरीर से करने योग्य है। दान 0 – भेजें
सेनापति जय कुमार की दीक्षा- भरत चक्रवर्ती के सेनापति जयकुमार के साथ एक सौ आठ राजाओं ने दीक्षा धारण की और उनकी पत्नी सुलोचना ने अनेक सपत्नियों के साथ ब्राह्मी और सुन्दरी आर्यिका के पास दीक्षा ली। दीक्षोपरान्त जयकुमार शीघ्र ही द्वादशाङ्ग के पाठी होकर भगवान् के गणधर हो गये और आर्यिका सुलोचना ग्यारह अङ्गों की धारक हो गयी एवं नमि-विनमि भी छिहत्तर-सतत्तर वें गणधर हुये थे। धर्म 0 – भेजें
श्रीकृष्ण के पिता वसुदेव के बैरी सूर्पक नामक देव ने वसुदेव का हरण किया, उन्होंने मुक्कों से उसकी पिटाई की तो छूटकर गझ्झा नदी में गिरे, वहाँ से निकलकर जङ्गल में घूमने लगे वहाँ म्लेच्छों के राजा ने उन्हे देखा जिससे म्लेच्छराज की जरा नामक कन्या को व्याहकर वहीं रहने लगे और उस कन्या से जरत्कुमार नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। नेमिनाथ भगवान् जब गर्भ में आये तब प्रतिदिन, दिन में तीन बार साढ़े तीन करोड़ रत्नों की वर्षा होती थी, चौदह रत्नों की एक-एक हजार देव रक्षा करते थे। Misc. 0 – भेजें