Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 348

आहार होता नीहार नहीं। भोग भूमि का वैभव।

12 सूत्र

दुषमादुषमा काल के अन्त में ज्येष्ठ कृष्ण पञ्चमी से आषाण शुक्ल पूर्णिमा तक कुवृष्टि होती है तथा सुषमासुषमा काल के प्रारम्भ में श्रावण कृष्ण प्रतिपदा से भाद्रपद शुक्ला चतुर्थी तक शुभ वर्षा होती है।
समय
सात राजू में एक लाख चालीस हजार योजन(मध्यलोक का प्रमाण) कम करने पर ऊर्ध्व लोक का प्रमाण होता है और अधोलोक सात राजू प्रमाण है।
Misc.
जिनसेनाचार्य के मत से एक सौ अड़तालीस कल्पकाल के बाद हुण्डावसर्पिणी काल आता है, अन्य आचार्यों के मत से असंख्यात कल्पकाल के बाद हुण्डावसर्पिणी काल आता है।
समय
हुण्डावसर्पिणी काल के दोष से चौथे काल में अठ्ठावन शलाका पुरुष, तीर्थङ्कर की पुत्रियाँ, चक्रवर्ती की हार, तीसरे काल में आदिनाथ जी का मोक्ष इत्यादि अनहोनी हुई हैं।
Misc.
भोगभूमि में सात दिन तक उत्तानाशय (पीट के सहारे लेटना), सात दिन तक अङ्गूठा चूसना, सात दिन तक रेंगना, सात दिन तक लड़खड़ाकर चलना, सात दिन तक स्थिर चलना, सात दिन में कलाएँ प्राप्त करना, सात दिन में गुणों की प्राप्ति करना, इस प्रकार जघन्य भोगभूमि में मनुष्य उनञ्चास दिन में जवान, मध्यम भोगभूमि में पैंतीस दिन में और उत्तम भोगभूमि में इक्कीस दिन में जवान हो जाते हैं।
Misc.
भोग भूमि में खाने को है पर भूख नहीं है और नरकों में भूख है पर खाने को नहीं है।
Misc.
भोगभूमि में भाई-बहिन ही पति-पत्नि बन जाते हैं और उनको सम्यक्त्व हो जाता है और वे स्वर्ग ही जाते हैं, यदि कर्मभूमि में ऐसा हो तो वे भाई-बहन नरक चले जायेंगे।
Misc.
भोगभूमि का वैभव- भूमि निर्मल दर्पणवत् साफ-स्वच्छ, कीड़ों से रहित, पाँच वर्ण की चार अङ्गुल प्रमाण मधुर सुगन्धित घास। जल जन्तु रहित वापिकाएँ। औषधि युक्त अमृत तुल्य निर्मल जल। अनेक प्रकार के अनुपम आसनो से युक्त मृदु शय्याओं वाले प्रासाद, स्वर्ण एवं रत्न मयी पर्वत, नदियों के दोनों तटों पर रत्नों से युक्त सीढ़ियाँ। विकलत्रय असंज्ञी जीवों से रहित जल, रोग-कलह-ईर्ष्या का अभाव। रात-दिन एवं सर्दी-गर्मी-अन्धकार के भेद से रहित मौसम। पापों से रहित, पति पत्नी के अलावा परिवार-ग्राम-नगरादि से रहित। एक पुरुष में नौ हाथियों का बल। प्रशस्त बत्तीस लक्षणों से युक्त कवलाहारी होकर भी नीहार से रहित। दस प्रकारके कल्पवृक्ष, बत्तीस प्रकार के पेय पदार्थ, नाना प्रकार के वादित्र, सोलह प्रकार के आहार। सत्रह प्रकार के व्यञ्जन, चौदह प्रकार के छाल, एक सौ आठ प्रकार के खाद्य पदार्थ, तीन सौ त्रेसठ प्रकार के (मिष्टान्न) स्वाद्य पदार्थ। त्रेसठ प्रकार के रस, सोलह हजार प्रकार की फूल मालाएं, सोलह प्रकार के भवन-स्वस्तिक-नन्द्यावर्त, ''चक्रवर्ती के भोग से अनन्तगुणे भोग'', विक्रिया द्वारा अनेक प्रकार के शरीर, भोग सामग्री, पुरूष के सोलह प्रकार व स्त्री के चौदह प्रकार के आभूषण, चौसठ कलाओं से युक्त कला गुण, वज्रवृषभनाराच संहनन, सम चतुरस्र संस्थान युक्त शरीर। पुरुष का छींक से व स्त्री का जम्भाई से कष्ट रहित मरण होता है एवं स्वर्ग ही जाते हैं।
Misc.
इस जम्बूद्वीप में सात क्षेत्र, एक मेरू, दो कुरू(देवकुरु उत्तरकुरु), जम्बू और शाल्मलि दो वृक्ष, छह कुलाचल, कुलाचलों पर स्थित छह महा सरोवर, चौदह महानदियाँ, बारह विभङ्ग नदियाँ, सोलह वक्षारगिरि, चार गजदन्त, चौंतीस नगरियाँ, चौंतीस रजतगिरि, चौंतीस वृषभाचल, अड़सठ गुफाएँ, चार गोलाकार नाभिगिरि एवं सैंतीस सौ चवालीस विद्याधर राजाओं के नगर हैं, इन सभी से यह जम्बूद्वीप अत्यधिक सुशोभित है। इस से दूने धातकीखण्ड में और पुष्करार्ध में हैं। लक्ष्मणजी के समान कृष्णजी ने भी कोटि शिला उठाई प्रतिनारायण जरासन्ध को मारने का निश्चय किया।
Misc.
विजयार्द्ध का माप- जम्बूद्वीप के भरत क्षेत्र के विजयार्ध की ऊँचाई पच्चीस योजन है, सवा छ: योजन पृथ्वी के नीचे स्थित है, पचास योजन चौड़ा है और चाँदी के समान सफेद वर्ण वाला है।
Misc.
समुद्रों के जल का स्वाद- लवण समुद्र के जल का स्वाद नमक के समान है। वारुणीवर समुद्र के जल का स्वाद शराब के समान है, घृतवर का जल घी और क्षीरवर का जल दूध के समान है। कालोदधि और अन्तिम स्वयम्भूरमण समुद्र का जल पानी के समान है। पुष्करवर समुद्र का मधु और पानी के समान तथा बाकी समस्त समुद्र इधु रस के समान स्वाद वाले हैं।
Misc.
समुद्रों में मत्स्यों की अवगाहना- लवण समुद्र के तीर पर सम्मूच्छन जन्म से उत्पन्न हुये महामत्स्य नौ योजन लम्बे तथा समुद्र के मध्य में अठारह योजन लम्बे हैं, गर्भ जन्म से उत्पन्न होने वाले मत्स्यों की लम्बाई सम्मूच्छन मत्स्यों की लम्बाई से आधी होती है। स्वयम्भूरमण समुद्र के तीर पर मत्स्यों की लम्बाई पाँचसौ योजन की, समुद्र के मध्य में एक हजार योजन लम्बे, पाँच सौ योजन चौड़े, ढ़ाई सौ योजन ऊँचे मत्स्य हैं, राघवमत्स्य का घनफल साढ़े बारह करोड़ योजन से ज्यादा निकलता है। लवणसमुद्र में नौ योजन, कालोदधि में अठारह योजन और स्वयम्भूरमण में एक हजार योजन इन तीन समुद्रों के सिवाय अन्य समुद्रों में मत्स्यादि जलचर जीव नहीं होते हैं।
Misc.