आभ्यन्तर निवृत्ति में आत्मा के प्रदेश जो इन्द्रियाकार हुये हैं, वे प्रदेश स्थिर रहते हैं। ज्ञान 0 – भेजें
कामदेव का रूप किशोर अवस्था में सुन्दर होता है किन्तु तीर्थङ्कर का रूप वृद्धावस्था में भी सुन्दर होता है। Misc. 0 – भेजें
जैसे मिट्टी में अनाज का दाना हो तो अङ्कुर उत्पन्न होता है, उसी प्रकार विकलत्रय की संवृत योनी जानना चाहिए, कुछ अनाज जो ठण्ड में होते हैं उनकी शीत योनी होती है और जो गर्मी में होते हैं उनकी ऊष्ण योनी होती है, मनुष्य मिश्र योनिवाले होते हैं, इस प्रकार योनियों के चौरासी लाख भेद होते हैं। प्रकृति 0 – भेजें
शरीर उत्पत्ति का क्रम- माता के उदर में वीर्य प्रवेश के बाद रज-वीर्य के संयोग रूप दस दिन तक कलल दशा में, फिर दस दिन कालिमा दशा में, दस दिन स्थिर होता है, तांबा और चाँदी का रस मिलने पर जो दशा होती है, वही रज और वीर्य के संयोग से होती है, एक माह तक स्थिर अवस्था होती है, दो माह में बुलबुले जैसा होता है, तीसरे माह में घट के आकार होता है, चार माह में मांस के पिण्ड रूप होता है, पाँच माह में उस आकार में पाँच अङ्कुर होते हैं, जिनसे दो हाथ, दो पैर और सिर बनता है, छ: माह में आँख, कान, नाक आदि उपाङ्गों की रचना होती है, सातवें माह में चर्म-रोम, हाथ-पैर के नख उत्पन्न होते हैं, आठवें माह में हलन-चलन होता है, नौ या दस माह में गर्भ से बाहर आता है। प्रकृति 0 – भेजें
सप्त धातु की मात्रा- मनुष्य के शरीर में दुर्गन्ध मज्जा से भरी तीन सौ हड्डियाँ होती हैं, सम्पूर्ण शरीर में तीन सौ सन्धि, नौ सौ स्नायु, सात सौ शिराएं, पाँच सौ मांसपेशियाँ, चार शिराओं के जाल, सोलह रक्त से पूर्ण 'महाशिराएँ', छ: शिराओं के मूल हैं, दो माँस रज्जू जो एक पीठ और एक पेट के आश्रित हैं, सातत्वचाएँ, सातकालेचक, 'अस्सीलाख करोड़ रोम', पक्वाशय और आमाशय में सोलह आँते, दुर्गन्धित मल के सात आशय, तीनस्थूण, एक सौ सात मर्म स्थान, नौमल द्वार जिनसे नित्य मल बहता है, स्वयं के एक अञ्जुलि प्रमाण मस्तक, एक अञ्जुलि प्रमाण मेद, एक अञ्जुलि प्रमाण वीर्य, एकअञ्जुलि प्रमाण ओज (शुक्र), तीन अञ्जुलि प्रमाण बसा, छ: अञ्जुलि प्रमाण पित्त, छ: अञ्जुलि प्रमाण कफ, आधा आठक प्रमाण खून, एकआठक प्रमाण मूत्र, छ: प्रस्थ प्रमाण विष्ठा, बीस नख, बत्तीस दाँत, जैसे घाव में कीड़े भरे रहते हैं वैसे ही शरीर बहुत से कीड़ों से भरा है इस प्रकार शरीर के सभी अवयव अशुभ पुद्गल रुप हैं एक भी अवयव ऐसा नहीं है जो पवित्र और सुन्दर हो। अनासक्ति 0 – भेजें
तीर्थङ्कर उत्पन्न होते ही परिवार में वासना उत्पन्न नहीं होती है, सभी संयमी हो जाते हैं। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें