Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 328

देशभूषण-कुलभूषण।

6 सूत्र

सीता हरण के बाद रामचन्द्रजी लक्ष्मण से पूँछते हैं, क्या ये जमीन में पड़े हुए बाजूबन्द, कुण्डल आदि आभूषण सीता के हैं ? लक्ष्मण जी कहते है मैंने केवल नित्य चरणों का वन्दन किया है, इसलिए बिछिया मात्र पहचानता हूँ अन्य आभूषण नहीं, पहले के लोग कितनी मर्यादा पालते थे।
चरित्र
जैसे लोक में कोई पुरुष पर वस्तु को 'यह पर वस्तु है' ऐसा जानकर छोड़ देता है, उसी प्रकार ज्ञानी पुरुष समस्त परद्रव्यों के भावों को परभाव जानकार छोड़ देता है।
अनासक्ति
हे श्रमण ! तुम इसी (ज्ञायक स्वरूप) में नित्य रमण करो, इसी में नित्य सन्तुष्ट रहो, इसी से तृप्ति होगी, इसी विधि से तुम्हें उत्तम सुख की प्राप्ति होगी।
ध्यान
काजल की कोठरी में कैसो हु सयानो जाय- उन जम्बूस्वामी का ध्यान करना चाहिये, जिनने माँ के आदेश से शादी की लेकिन सुहागरात की बात थी, तो एक तरफ से राग का जाल डाला जा रहा था, दूसरी तरफ से विराग की छुरी उस जाल को छेदती जा रही थी, विद्युच्चर चोर चोरी करने आया था, वह सङ्गोष्ठी सुनता रहा, सुबह जम्बूस्वामी के साथ दीक्षित हो गया, इसी तरह गजकुमार का भी विचार करना चाहिए।
ब्रह्मचर्य
एक पत्नि व्रत का पालन करने वाले सेठ सुदर्शन ने अपने मन को अडिग रखा, रानी सारी रात विषयों की मारी तड़पती रही, पुरोहिता, वेश्या आदि के अनेक उपसर्ग सहे, ब्रह्मचर्य का पालन किया और मुनि बनकर पटना गुलजार बाग से मोक्ष गये।
ब्रह्मचर्य
देशभूषण कुलभूषण- उस समय बच्चों की शिक्षा गुरुकुल में हुआ करती थी, पाँच वर्ष की उम्र में कुलभूषण देशभूषण राजपुत्रों के माता-पिता ने पुत्रों को गुरू के पास भेज दिया, विद्याध्ययन करके वापस आये, नगर प्रवेश के समय स्वागत हुआ, झरोखे में बैठी सुन्दर कन्या को देख कर शादी का भाव हुआ, एक दूसरे में द्वन्द हो गया, अन्त में मालूम हुआ ये उनकी ही बहिन है, घर में प्रवेश किये विना दीक्षा ग्रहण कर ली, रामचन्द्र जी ने उपसर्ग निवारण किया, केवली हुये, दिव्यध्वनि खिरी, कुन्थलगिरी से मोक्ष को प्राप्त हुए थे।
ब्रह्मचर्य