स्नेह रहित मनुष्य निर्वाण को प्राप्त होता है तथा स्नेह अनर्थ का कारण है, यह रहस्य स्नेह (तैल) रहित दीपक ने प्रकट किया है, भावार्थ- जब तक दीपक में तैल रुपी स्नेह रहता है तब तक उसे जलना पड़ता है और जब तैल रुपी स्नेह समाप्त हो जाता है तब वह निर्वाण को प्राप्त हो जाता है (बुझ जाता है), इसी प्रकार संसारी प्राणी स्नेह-प्रीति के कारण निरन्तर आकुलता में पड़कर दुःखी रहते हैं और प्रीति का त्याग करने वाले मुनिराज निर्वाण को प्राप्त होते हैं। अनासक्ति 0 – भेजें
अर्थ की ओर दृष्टि लगाने वाले एक दिन अर्थी पर आ जाते हैं, जीवन को व्यर्थ कर दुर्गति के गर्त में चले जाते हैं, दूसरी ओर आत्मा की ओर दृष्टि लगाने वाले एक दिन परमात्मा बन जाते हैं, जीवन को पावन बना लेते हैं और संसार से पार हो जाते हैं। अनासक्ति 0 – भेजें
पण्डित जगन्मोहनलाल जी मूर्ति खरीदने जयपुर गये, कृष्ण, राम, हनुमान आदि की मूर्ति चार हजार रुपये की थी, एवं महावीर भगवान् की चालीस हजार रुपये की थी, पण्डितजी ने कहा कि जैनियों को लूटते हो, शिल्पी ने कहा अन्य मूर्तियों के दोष को हम रङ्ग में ढँक देते हैं, पर वीतराग मूर्ति के दोष को कहाँ ढँके, जैनियों की मूर्ति दस-बीस पत्थरों में एक बनती है उसकी प्रकार आकिञ्चन्य धर्म में दोषों को स्थान नहीं होता है। धर्म 0 – भेजें
परमात्मा के दर्शन- शिष्य ने गुरू से कहा 'गुरू चरणों में रहते वर्षों बीत गये किन्तु परमात्मा के दर्शन नहीं हुए' गुरू ने कहा! चलो आज उस पहाड़ी पर इन पत्थरों को लेकर परमात्मा का दर्शन करायेगें ।गुरू पहाड़ी पर पहुँच गये, किन्तु पत्थर के बोझ से शिष्य पीछे रह गया, बोझ से थक कर एक-एक पत्थर फेकना शुरू कर दिया, पहाड़ तक जाते-जाते सारे पत्थर फेंक दिये, ऊपर जाकर जब गुरू से मिले तब गुरु ने पूँछा, पत्थर कहाँ हैं? शिष्य ने कहा पत्थर के बोझ से चल नहीं पा रहे थे, इसलिये फेंक दिये, तब गुरू ने कहा बाहरी बोझ की अपेक्षा अन्दर का बोझ कम करो, अर्थात् क्रोध, मानादि पत्थरों को जिस दिन फेंक दोगे उस दिन परमात्मा के दर्शन हो जायेंगे। अनासक्ति 0 – भेजें
सुकुमाल मुनि को घर में राई का दाना चुभता था पर अब स्यालिनी के दाँत नहीं चुभ रहे थे, यही राग और वैराग्य में अन्तर है। अनासक्ति 0 – भेजें