अन्तर दृष्टि का अभ्यास करो, लौकिक ख्याति से क्या होगा? मोह कृष करो, शरीर कृष करने से क्या होगा, ये दोनों अगर नहीं हैं तो बहुत सारे आवश्यकों का पालन करने से एवं प्रचुर काय क्लेश करने से क्या होगा? विवेक 0 – भेजें
जिसके पास कुछ भी नहीं है, जितेन्द्रिय है, शान्त है, समता धारी है, सदा सन्तुष्ट रहता है उसके लिए सभी दिशाएं सुखकारी हैं। संतोष 0 – भेजें
जिसकी मोक्ष में भी इच्छा नहीं वह मोक्ष पाता है ऐसा कहा गया है इसलिए आत्मार्थी किसी भी पदार्थ की इच्छा न करें। अनासक्ति 0 – भेजें
अनाथपने का बोध- वन में घूमते हुये श्रेणिक ने मुनिराज को शिलातल पर विराजे हुये देखकर कहा, आपका कोई संरक्षक नहीं है, अनाथ हो तो मेरे राज में चलो? मुनिराज ने कहा राजन्! एक बार मैं बीमार पड़गया था, मेरा दुःख कोई बटा नहीं सका, अतः स्वयं का नाथ बनने आया हूँ, तब राजा को अपने अनाथपने का बोध हुआ था और अहङ्कार चूर हो गया था। विनम्रता 0 – भेजें
निज की ओर वापसी- एक नगर का राजा मर गया, राजा किसको बनाया जाए? मन्त्रियों ने विचार किया कि प्रातः काल गेट खोलने पर जिसका प्रथम दर्शन होगा उसे राजा बनायेंगे, प्रातः काल गेट खोला तो एक लंगोटी वाले संयासी दिखे, उनसे कहा तुम्हे राजा बनना है, उसने मना कर दिया, लोग नहीं माने, उन्हें लाकर राजसी वेश पहना कर राजा बना दिया, पर उन्होंने अपनी लंगोटी सुरक्षित रखी, दो वर्ष बाद एक राजा ने चढ़ाई कर दी, राजा के पास बैठकर मन्त्रियों ने सलाह की, क्या करना चाहिए? संयासी ने अपना सन्दूक बुलवाया लंगोटी पहनी, जङ्गल की ओर चले गये, 'तेरा तुझको सौंपते क्या लागे है मोर' इसी तरह गृहस्थी में जीवन व्यतीत करना चाहिए, जिसने जो माँगा दे दिया। अनासक्ति 0 – भेजें
साधु ने सेठ से कहा! ये कोठी नही धर्मशाला है, सेठ कहता है महाराज ये तो कोठी है धर्मशाला आपको छुड़वा देते हैं, साधु ने कहा इसको किसने बनवाया? पिताजी ने, कितने दिन रहे? पाँच वर्ष, वो छोड़कर चले गये तुम भी छोड़कर जाओगे तब धर्मषाला नहीं तो क्या है। अनासक्ति 0 – भेजें