Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 275

त्याग धर्म-काटे कर्म।

8 सूत्र

मयूरपिच्छि देने वाला सपरिवार दीर्घायु होता है और कमण्डलु देने से निर्मल शरीर तथा निर्दोष व्रत का धारक होता है।
दान
हिंसा और अहिंसा- व्रतादि के अनुष्ठान रूप निष्ठा से हीन भी व्यक्ति द्रव्य और भाव हिंसा के त्याग से निष्ठाशाली होता है और उत्कृष्ट निष्ठावाला भी व्यक्ति हिंसा करने से चाण्डाल से भी नीच होता है।
अहिंसा
वर्तमान में जितना मिला वह पूर्व दान का ही फल है।
दान
व्याज से कुछ समय में धन दूना हो जाता है, व्यापार से चौगुना, भूमि में बोने से सौ गुना एवं पात्र को दान देने से अनन्त गुना फल प्राप्त होता है।
दान
दाता निम्न कुल में भी हो तो भी लोग उसके पास जाते हैं, कञ्जूस उच्च कुल वाला भी हो तो भी लोग उसके पास नहीं जाते जैसे समुद्र के पास कोई नहीं जाता और कुंए के पास सब लोग जाते हैं।
दान
जो मोक्षमार्गी साधु का नाम मात्र लेता है, उसके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं तब जो भोजन, औषध और आश्रय आदि देकर उपकार करता है वह मनुष्य संसार समुद्र से पार हो जाता है इसमें कोई आश्चर्य नहीं है।
दान
वह देव कैसा जो रागी द्वेषी हो, वह धर्म कैसा जहाँ दया न हो, भारी तप कैसा जहाँ ज्ञान न हो और वह विभूति किस काम की जो पात्र दान के काम न आए?
विवेक
जिसका धन दान के लिए, शरीर व्रतों के पालन के लिए और शास्त्र अध्ययन परम शान्ति के लिए नहीं है, उसका जन्म केवल जन्म-मरण की परम्परा के लिए ही है।
धर्म