Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 244

शुभचन्द्र और भर्तृहरि।

8 सूत्र

जिसकी दृष्टि निर्जरा पर होती है, वह हर प्रसङ्ग हँस कर निकाल देता है।
कर्म
पाश्चात्य संस्कृति कहती हैं विश्व एक व्यापार है, सिर्फ मनुष्य को जीने का अधिकार है, भारतीय संस्कृति कहती है विश्व एक परिवार है सबको जीने का अधिकार है।
अहिंसा
साधक साधना में जितने कठोर, भावना में उतने ही कोमल होते हैं।
चरित्र
सुकमाल स्वामी को असंयमी दशा में राई का दाना चुभता था, वैराग्य होने पर स्यालनी के दाँत नहीं चुभ रहे थे, क्योंकि वैराग्य से सहनशीलता आती है।
अनासक्ति
त्याग के विना राग मिट नहीं सकता, जल के विना मल छूट नहीं सकता। तप संयम के विना भगवान् बनने वालों, साधु हुये विना मोक्ष मिल नहीं सकता।।
धर्म
चरित्र रूपी औषधि से लोभ रूप सर्प का जहर दूर हो जाता है।
चरित्र
आचार्य श्री शान्तिसागर जी से एक व्यक्ति ने कहा पञ्चम काल में मोक्ष प्राप्त नहीं होता है, तब आप कष्ट क्यों सह रहे हैं, आचार्यश्री ने कहा यह पेड़ किसका है? व्यक्ति ने कहा- आम का, आचार्यश्री ने कहा- तो फल तोड़ लाओ, व्यक्ति बोला- मौसम में मिलेगा, आचार्यश्री ने कहा- इसी तरह मोक्ष का फल भी इसी मुनि मुद्रा में लगेगा। वे व्यक्ति आगे चलकर मुनि पायसागर बने।
पुरुषार्थ
शुभचन्द्र और भर्तृहरि–राजा सिंहल के शुभचन्द्र और भर्तृहरि दो पुत्र हुए, 'राज समाज महा अघ कारण बैर बढावन हारा' अर्थात् राज और समाज को बैर एवं पाप का कारण जानकर दोनों विरक्त हो गये, एवं शुभचन्द्र जी ने वन में जाकर एक मुनिराज के निकट मुनि दीक्षा ले ली एवं घोर तप करना प्रारम्भ कर दिया, एवं भर्तृहरि पञ्चाग्नि तप करने वाले तापस का चेला बन गया, बारह वर्ष रहकर भर्तृहरि बहुत सी विद्या, तन्त्र, मन्त्र, यन्त्र, सीखकर जब जाने लगा, तब योगी ने एक सतविद्या और रसतुम्बी दी जिससे ताम्बा स्वर्ण बन जाता था, कुछ दिनों में भर्तृहरि के सैकड़ों शिष्य हो गये, और तन-मन से सेवा करने लगे, एक दिन उन्हें अपने भाई शुभचन्द्र की याद आई, वे कहाँ रहते हैं, और किस प्रकार हैं, और पता लगाने एक शिष्य को भेजा, जाकर देखा तो न कोई खाने की व्यवस्था है, न तन पर एक लङ्गोटी, सुन कर भर्तृहरि को बहुत दुःख हुआ, और शिष्य के हाँथ आधा तुम्बी रस भेजा, शुभचन्द्र जी ने कहा की पत्थर पर डाल दो, यह सुनकर भर्तृहरि को बहुत दुःख हुआ, और स्वयं आधा तुम्बी रस लेकर भाई से मिलने चले गये, प्रणाम करके रस तुम्बी भेंट की, शुभचन्द्र जी ने उसे पत्थर पर फेंक दिया, देख कर भर्तृहरि को दुःख हुआ, और कहा की आपने मेरी बारह वर्ष की कमाई नष्ट कर दी, आपने अभी तक क्या प्राप्त किया है? दिखाइये, तब शुभचन्द्र जी ने पैर के नीचे की थोड़ी सी धूल उठा कर शिला पर डाल दी, तो शिला स्वर्णमय हो गयी, भर्तृहरि अवाक् हो गए और चरणों में गिरकर दीक्षा की प्रार्थना की, तब शुभचन्द्र जी ने विस्तृत धर्मोपदेश देकर उनके हृदय के कपाट खोल दिए, भर्तृहरि को दीक्षित करके योग का अध्ययन कराने के लिए ज्ञानार्णव ग्रन्थ की रचना की।
अनासक्ति