Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 211

कड़ा के लोभ में जान गँवाई।

7 सूत्र

क्रोध प्रीति का, मान विनय का, माया मित्रता का और लोभ सबका विनाश कर देता है।
क्षमा
आनन्द दायक मोक्ष को छोड़कर कष्टकारी सांसारिक विभूति को जो स्वीकार करते हैं, वे चन्दन युक्त जल को छोड़कर कीचड़ युक्त जल को पीते हैं।
अनासक्ति
शरीर शिथिल हो गया है, बाल सफेद हो गए हैं, सारे दाँत गिर गए हैं, वृद्धावस्था आ गई है, हाथ में डण्डा ले रखा है फिर भी तृष्णा पीछा नहीं छोड़ती है।
संतोष
परिग्रह से विषयों की इच्छा, उससे क्रोध, क्रोध से हिंसा, हिंसा से पाप, पाप से नरक, नरक में वचनातीत कष्ट प्राप्त होते हैं।
अनासक्ति
तृष्णा जीर्ण नहीं हुई हम ही जीर्ण हो गए, काल बीता नहीं हम ही बीत गए, भोग नहीं भोगे हम ही भुक्त हो गए, तप नहीं तपा हम ही सन्तप्त हुये।
संतोष
धन के इच्छुक प्राणी श्मशान में भी सेवा करते हैं और अनेकों अनर्थों को करते हैं जिससे दुर्गति को प्राप्त होते हैं।
धन
कड़ा के लोभ में जान गवायी– एक व्याघ्र ने एक राहगीर से कहा कि मेरे पास एक सोने का कड़ा है, वह तुम्हे देना चाहता हूँ। पथिक ने कहा तुम्हारा हमे विश्वास नहीं, तब उसने कहा कि मेरे दाँत टूट गये हैं, नख गिर गये हैं, मैं बूढ़ा हो गया हूँ, अब इस कड़ा को दान देकर मुक्ति चाहता हूँ, पथिक उसके माया जाल में फँस गया, बेचारा जैसे ही निकट आया व्याघ्र ने उसे मार डाला।
धन