Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 186

जिसने अपने को कुछ माना।

10 सूत्र

भ्रष्ट हुये चार हजार मुनि पुनः मुनि बन गये पर अहङ्कारी मारीच पुनः मुनि नहीं बन सका।
विनम्रता
अहङ्कारी की सोच छिपकली की तरह होती है, छत पर चिपक कर सोचती है, 'मेरी बदोलत छत टिकी है'।
विनम्रता
मुर्गा कहता है मैं बाङ्ग देता हूँ, तब सुबह होती है, इसी प्रकार संसारी प्राणी को भ्रम होता है कि वह पर का कर्ता है।
विनम्रता
भूल व्यक्ति को चूल पर पहुँचा देती है सचेत न होने पर धूल में मिला देती है।
विवेक
जो भूत और भविष्य की सोचता है उसका वर्तमान का सुख चला जाता है।
समय
दही बड़ा- पहले मैं दही के चरणों में पड़ा तभी तो बना दहीबड़ा, बड़ा ने बहुत परीक्षायें दी हैं तभी बड़ा बना है, जो फूलता है वह पिटता है जैसे दाल रात भर फूलती है तो घुटाई होती है।
विनम्रता
जङ्गल में तप कर रहे साधु से पथिक ने रास्ता पूँछा, साधु ने उत्तर दिया इस रास्ते में मत जाओ, वहाँ मौत है। मानी पथिक नहीं माने, चले गये। आगे चलकर जङ्गल में उनकों स्वर्ण मुद्राओं का ढेर मिला, वे प्रसन्न हो गयें। चारों ने मुद्राएँ बाँट लीं एवं एक को मिठाई लेने भेजा। उसके मन में आया कि, 'मिठाई में जहर मिला देते हैं, वे तीनों खाकर मर जायेंगे और मुझे सारी मुद्राएँ मिल जायेंगी'। वहाँ उन तीनों ने सोचा कि 'जैसे ही वह मिठाई लेकर आयेगा और हम लोग उसको मार डालेंगे, जिससे कि चार नहीं तीन हिस्से करने पड़ेंगे'। जैसे ही वह मिठाई लेकर आया और तीनों ने उसे मार डाला और मिठाई खाकर स्वयं भी मर गये, इस प्रकार अहङ्कारी लोग गुरुजनों की बात को ठुकरा कर दुर्दशा को प्राप्त होते हैं।
धन
रूप का मद सनत चक्रवर्ती ने किया था तो शरीर में कुष्ट रोग हो गया था।
विनम्रता
जिसने अपने को कुछ माना सो पिटा- एक राजभवन में शिष्यों सहित साधु का आगमन हुआ, गुरू जी ने समझाया कि आज यहाँ विश्राम करना है, कोई आये तो कुछ बोलना नहीं, गुरूजी ध्यान में लीन हो गये, उसी वक्त राजा की सवारी आयी, राजा ने शिष्यों को पूँछा-तुम कौन हो ? उत्तर आया-साधु हैं, राजा ने उनको बाहर कर दिया, अन्त में गुरू के पास गये तो वे मौन हो गये कुछ बोले नहीं, राजा ने उनको कुछ नहीं कहा और चला गया।
विनम्रता
भरत चक्रवर्ती की प्रशस्ति- दिग्विजय के बाद भरत चक्रवर्ती अपने प्रथम चक्रवर्ती होने की प्रशस्ति लिखने के लिए वृषभाचल पर्वत के पास जब गये, तो वहाँ उन्होंने देखा कि पूरा पर्वत...
विनम्रता