गुरूजी ने कौरव-पाण्डव को क्रोध त्याग का पाठ याद करने को दिया, सबने याद करके सुना दिया युधिष्ठिर को याद नहीं हुआ, चार-पाँच दिन बाद गुरुजी ने पूँछा पाठ याद हो गया ? युधिष्ठिर ने कहा नहीं, गुरुजी ने पिटाई कर दी, जब क्रोध नहीं आया तब बोले अब याद हो गया, युधिष्ठिर ने सोचा यह पाठ आचरण में लाने का है, रटने का नहीं है। क्षमा 0 – भेजें
सूक्ष्मदर्शीदूरदर्शी यन्त्र- (सोच की वजह से एक को लाभ दूसरे को हानि)दो मित्र मेले से सूक्ष्मदर्शी और दूरदर्शी यन्त्र लेकर आते है, एक मित्र तो सूक्ष्म दर्शी यन्त्र से सोने-चाँदी का मेल देखकर खरीदता जिससे व्यापार में कई गुना लाभ होने लगा एवं जब व्यापार से थक कर घर में आता और दूरदर्शी यन्त्र से दूरवर्ती बाग बगीचों को देखकर मनोरञ्जन करता और मौज मनाता, दूसरा मित्र रोटी के छोटे चिट्ठों को सूक्ष्मदर्शी यन्त्र से देखता वे बड़े दिखाई देते तो पत्नी को डाँटता, इसी प्रकार घर के सूक्ष्म कचरे को देखता ज्यादा दिखाई देता तो नौकरों को डाँटता और दुःखी रहने लगा, वस्तु के सदुपयोग की कला न आने से व्यक्ति दुःखी होता है और सोच सही होने से सुखी होता है। विवेक 0 – भेजें
मेरा देश महान, सौ में से सौ भगवान- एक बार द्रोणाचार्य ने धर्मराज युधिष्ठिर से सूची देकर कहा ! जाओ नगर में कितने दुर्जन हैं देखकर आओ और इसी प्रकार दुर्योधन को सूची देकर कहा ! जाओ नगर में कितने सज्जन हैं देखकर आओ, दोनों खाली सूची लेकर आ गये, धर्मराज बोले हमें एक भी दुर्जन नहीं मिला, और दुर्योधन बोले कि हमें एक भी सज्जन नहीं मिला, बस यही सकारात्मक और नकारात्मक दृष्टि-कोण में अन्तर होता है। विवेक 0 – भेजें
अभिनन्दन आदि पाँच सौ मुनियों की क्षमा- दण्डक राजा ने कारण जाने विना रानी के कहने से मुनियों को पाखण्डी जानकर घानी में पेल दिया, लेकिन मुनियों ने क्षमा भाव धारण कर आत्म कल्याण किया था। क्षमा 0 – भेजें
देवरानी जिठानी को पन्द्रह लड्डुओं ने श्मशान तक भेज दिया- एक बार देवरानी जिठानी ने पन्द्रह लड्डू बनाये, उनमें से एक को सात एक को आठ मिल रहे थे, उनमें से कोई सात लड्डू लेने को तैयार नहीं था तब निर्णय लिया, कि कल जो सुबह पहले उठकर मौन खोलेगा वह सात लड्डू लेगा दूसरे दिन दोनो नहीं उठीं, लोगों ने सोचा की दोनों मर गई, तब एक ही अर्थी पर दोनों को श्मशान ले गये, जैसे ही आग लगाने को तैयार हुए तब एक बोली 'तू आठ खा लेना हम सात खा लेंगे' जो लोग जलाने ले गये थे वे भी पन्द्रह लोग थे, लोगों ने समझा की दोनों मरकर डाकिनी-शाकिनी बन गयी हैं अतः हम लोगों को खाने को कह रहीं हैं, इसलिए लोग भागे, पीछे-पीछे दोनों भाग रहीं थीं, सारे नगर में अशान्ति फैल गयी, लोगों को वास्तविकता का पता चलने पर दोनों बहुत शर्मिन्दा हुईं। संतोष 0 – भेजें