Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 142

धर्म कि पुस्तक। परोपकार के तीन प्रश्न।

5 सूत्र

महात्मा ने घायल पड़े सिपाही से कहा शास्त्र सुनोगे? सिपाही बोला नहीं, पानी पीऊँगा, महात्मा पानी ले आया, कहा सिर ऊँचा करोगे? कर दिया, सेवा से द्रवीभूत होकर मरणोन्मुख सिपाही की आँखों में आँसू आ गये और उसने कहा महाराज मैंने धर्म ग्रन्थ नहीं पढ़े लेकिन आपके सेवा भाव से धर्म ग्रन्थों का रहस्य समझ में आ गया है कि परोपकार के समान कोई धर्म नहीं है और पर को पीड़ा देने से बड़ा कोई अधर्म नहीं है।
दान
बुढ़िया को कूबड़ हो गया, लोग चिढ़ाते थे, वह दुःखी थी, एक व्यक्ति ने कहा माँ दुःखी मत होओ इसका समाधान मैं जानता हूँ, बुढ़िया ने पूँछा क्या ठीक करना जानता है? व्यक्ति ने कहा हाँ, तो ठीक कर दूँ? बुढ़िया बोली जब ठीक करना जानता है, तो लगाना भी जानता है? व्यक्ति बोला हाँ जानता हूँ, तब बुढ़िया ने कहा, मेरी कूबड़ रहने दे, जो मेरी मजाक करते हैं, उनकी पीठ पर एक-एक कूबड़ लगा दे, बस मेरा दुःख खत्म हो जायेगा, व्यक्ति दूसरों के दुःख को देखकर सुखी होना चाहता है जो असम्भव है।
चरित्र
परोपकार से स्वोपकार भी होता है, कीचड़ में फँसे हुए गधे को देखकर न्यायाधीश अपनी गाड़ी से उतर कर उसे बाहर निकालने लगे, ड्राईवर ने कहा अरे साहब आप क्या कर रहे हैं मैं निकाल देता हूँ, उन्होंने नहीं सुना और गधे को निकाल दिया, कपड़े गन्दे हो गये थे, किन्तु समय नहीं था कि कपड़े बदल सकें, उसी हालत में अदालत पहुँच गये, मित्रों ने पूँछा कि आपको आज क्या हो गया इतने गन्दे कपड़े क्यों हैं? नौकर ने सारा समाचार सुनाया और कहा साहब बड़े दयालु हैं, जज ने कहा! नहीं भैया मैंने कुछ नहीं किया, मैंने अपनी ही पीड़ा कम की है।
दान
1978 में आचार्य श्री विद्यासागर जी के पास जापान से एक दल आया, आचार्य श्री ने उन्हें एक पुस्तक दी उन्होंने पूँछा ये पुस्तक किस धर्म की है? आचार्य श्री ने कहा जैन धर्म की, उन्होंने कहा हम नौजवान हैं धर्म नहीं मानते, आचार्य श्री ने कहा! दुनिया में ऐसा कोई नहीं जो धर्म को न मानता हो, आप कैसे कह रहे हैं? तब आचार्य श्री ने कहा, आपके शिर में कोई लाठी मारे तो कैसा लगेगा, युवक बोला! बुरा लगेगा, और कोई पट्टी बाँधे तो कैसा लगेगा? युवक बोला! अच्छा लगेगा, आचार्य श्री बोले! बस यही तो अधर्म और धर्म है, तब युवक बोला कि धर्म ऐसा है तो हम मानते हैं, आचार्य श्री ने कहा धर्म विशाल है, मात्र विधि विधान को ही धर्म नहीं कहते हैं।
धर्म
एक बहुत गरीब परिवार था, एक बार जङ्गल में एक भविष्य वक्ता सन्त आये थे, माँ ने बेटे से कहा! तुम जाकर पूँछो हमारे दुःख के दिन बीतेंगे या भूखे ही मरते रहेंगे, माँ के आग्रह से बेटा सन्त के पास चला, चलते-चलते शाम हो गयी, एक गाँव में सेठानी की कोठी के पास जाकर पूँछा क्या हम यहाँ रात व्यतीत कर सकते हैं? स्वीकृति दे दी, सेठानी ने पूँछा कहाँ जा रहे हो? लड़का बोला! माँ का प्रश्न पूँछने सन्त के पास जा रहा हूँ, सेठानी ने कहा एक प्रश्न मेरा भी पूँछ आना, मेरी बेटी गूँगी है, वह कभी बोलेगी या नहीं, शादी होगी या नहीं? आगे बढ़ा तो जङ्गल में प्यास बुझाने तापस की झोपड़ी में गया, तापस ने पानी पिलाकर पूँछा कहाँ जा रहे हो? सन्त के पास प्रश्न का उत्तर लेने, तापस ने कहा, एक प्रश्न मेरा भी पूँछ आना, मुझे पच्चीस वर्ष तप करते हो गये परमात्मा का दर्शन क्यों नहीं हो रहा है? आगे बढ़ा भूख से पीड़ित हुआ तो हल जोत रहे किसान से भोजन माँगा, उसने भोजन करा दिया और पूँछा कहा कहाँ जा रहे हो? उसने बताया तो किसान बोला हमारा भी एक प्रश्न पूँछ आना, मेरे खेत में फसल होती है पर फल नहीं लगते क्या कारण है? सन्त के पास पँहुच कर अभिवादन कर कहा कृपया हमारे चार प्रश्नों का समाधान करें, सन्त ने कहा! हम एक दिन में तीन प्रश्नों का ही समाधान करते हैं, उसने सोचा किसका प्रश्न छोड़ दूँ? माँ का प्रश्न छोड़कर सबसे पहले सेठानी का प्रश्न पूँछा, सन्त ने कहा! जिसको देखकर लड़की बोलने लगेगी, वही उसका वर होगा, तापस के प्रश्न के उत्तर में कहा! तापस की दाढ़ी में जब तक मणि रहेगी तब तक परमात्मा का दर्शन नहीं होगा, किसान के खेत में जब तक सोने-हीरे के घड़े गढ़े रहेंगे, तब तक फसल नहीं आयगी, उत्तर लेकर वापस चला, किसान को बताया तो उसने घड़े निकाल कर उसी को दे दिये, तापस ने भी मणि उसी लड़के को दे दी, सेठानी की लड़की उसी लड़के को देखकर बोलने लगी, तो उसने उसी के साथ शादी कर दी, माँ के पास गया माँ आश्चर्य में थी, उसने कहा माँ परोपकार करने वाले का उपकार स्वयं हो ही जाता है।
दान