Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 13

संस्कार शिविर।

20 सूत्र

कैसे अदा करेंगे उपकार हम तुम्हारे, हम तो बने सितारे, गुरु आपके सहारे। तन को रचा सम्हारा माता-पिता ने मेरे, जीवन सम्हारा तुमने, भर ज्ञान उर में मेरे।।कैसे।। तुम देवता से बढ़कर, मेरे लिये हो गुरुवर, चरणों में शीश मेरा है गुरु जी तुम्हारे।।कैसे।। जब तक है हम जमीं पर, विस्मृत न कर सकेंगे, पथ के प्रदीप मेरे, गुरुदेव हो सहारे।।कैसे।। तुमसे मिला है सब कुछ, तुम को क्या भेंट दूं मैं, सूरज के आगे जुगनू की बात क्या करुं मैं।।कैसे।। जीवन सजाने वाले बस इतनी आरजू है, नजरे न मोड़ लेना दर से कभी हमारे।।कैसे।।
भक्ति
मंगलाचरण का प्रयोजन-पुण्य प्राप्ति, निर्विघ्न कार्य सम्पन्न, नास्तिकता का परिहार, शिष्टाचार का पालन।
धर्म
चित्र अनावरण का प्रयोजन चित्त अर्थात् मन का अनावरण अर्थात् उज्ज्वलता है।
मन
दीप प्रज्वलन का प्रयोजन अज्ञान का नाश हो, ज्ञान का प्रकाश हो।
ज्ञान
शास्त्र भेंट का प्रयोजन गुरु शिष्य को ज्ञान दान देकर अपने जैसा बनाए।
ज्ञान
ज्ञान की आग में जलकर व्यक्ति सूरज बने या न बने, पर दीपक तो बन ही जाता है।
ज्ञान
पाँच तत्त्व शिक्षा में बाधक- अहङ्कार, क्रोध, अरुचि, रोग, आलस्य।
ज्ञान
अजगर करे न चाकरी,पञ्छी करे न काम। दास मलूका कह गए सब के दाता राम।। ऐसा मानकर आलसी बने रहना अच्छा नहीं है।
पुरुषार्थ
अर्थात्-जो तत्त्वज्ञान से रहित हैं उनको हमेशा दु:ख ही प्राप्त होता है।
ज्ञान
सैकड़ों मूर्ख पुत्रों की अपेक्षा एक गुणवान पुत्र अच्छा है, क्योंकि एक चन्द्रमा अन्धकार को दूर कर देता है सैकड़ों तारें नहीं।
चरित्र
संसार में गुरू कृपा सबसे निराली, होली यही दशहरा यह ही दीवाली। जो शिष्य है वह सदैव ऋणी रहेगा, कोई कभी न उपकार चुका सकेगा।।
भक्ति
यदि एक साल की योजना बनाना चाहते हो तो उर्वरा भूमि में बीजों की बुवाई करो, यदि दस साल की योजना बनाना चाहते हो तो पेड़ लगाओ, और सौ साल की योजना बनाना चाहते हो तो एक पीढ़ी को संस्कारित करो, एक पाठशाला खोलना अर्थात् एक जेल बन्द कर देना है।
ज्ञान
शिक्षक में ये छ: चीजें होना आवश्यक हैं- उच्चाचरण हो, शिष्य पर प्रेम हो, उसकी उन्नति का भाव हो, निर्लोभ हो, कर्तव्य परायण हो, (डॉ- पं.पन्नालाल जी साहित्याचार्य सागर वालों ने बावन वर्ष मोराजी में सर्विस की लेकिन छुट्टी एक भी नहीं ली वे सहिष्णु थे)।
ज्ञान
आपको ए ग्रेड का बनना है तो सिगरेट पीना छोड़ो।
चरित्र
जीवन में धर्म का लायसेंस नहीं, धर्म होना चाहिए।
धर्म
चिकित्सक बिगड़ता है तो एक मरीज बिगड़ता है, वकील बिगड़ता है तो एक केस बिगड़ता है, एक इञ्जीनियर बिगड़ता है तो एक बिल्डिंग बिगड़ती है और एक टीचर बिगड़ता है तो हजारों विद्यार्थी बिगड़ जाते हैं।
ज्ञान
आज कल के विद्यार्थी विद्या का सदुपयोग न कर विद्या की अर्थी निकालते हैं, यदि अनूकूल नहीं हुआ तो हड़ताल करते है, हजारों विद्यार्थियों को अन्तराय डालते हैं।
चरित्र
अहङ्कार, क्रोध, आलस, भूख शिक्षा में बाधक तत्त्व हैं।
ज्ञान
धर्मात्मा होने का सम्बध शास्त्रों से नहीं, स्वयं के आचरण से है।
धर्म
नेत्र, आरोग्य, आदि के अनेक शिविर लगते हैं, इन शिविरों में शरीर के एक-एक अङ्ग का कल्याण होता है, लेकिन सम्यग्ज्ञान शिक्षण शिविर में पूर्ण आत्मा का कल्याण होता है।
ज्ञान