सद्भाव सहित और मायाचारी से रहित होकर साधर्मियों की यथायोग्य सेवा करना वात्सल्य कहलाता है। संगति 0 – भेजें
अपना हित करना चाहिए व जितना बने पर का भी करना चाहिए, परन्तु अपने और पर के हित में आत्महित अच्छा करना चाहिए। विवेक 0 – भेजें
एक आचार्य के दो शिष्य थे, एक ने वेश्या के बगीचे में चातुर्मास करने की आज्ञा ली, दूसरे ने शेर की गुफा में बैठकर चतुर्मास की आज्ञा ली, चतुर्मास के बाद जिन्होंने वेश्या के बगीचे में चातुर्मास किया, गुरु ने उनको विशेष आशीर्वाद दिया, शेर की गुफा वाले मुनि ने अगला चातुर्मास वेश्या के बगीचे में माँगा, गुरू ने रोका तो भी नहीं माने, वेश्या का राग सुनकर वे विचलित हो गये, वेश्या से अपनी भावना प्रकट की, वेश्या ने रत्नकम्बल की माँग की, साधु बारह वर्ष का कठोर परिश्रम करके रत्नकम्बल लाये और वेश्या को दे दिया, वेश्या ने पैर पोंछकर उसे नाली में फेंक दिया, साधु चकित हो गये, पूँछने पर वेश्या ने कहा जिस प्रकार आपने अपने कीमती संयम को खो दिया, वह रत्नकम्बल को फैकने के ही समान है, ऐसा कहकर वेश्या ने साधु का स्थितिकरण किया था। अनासक्ति 0 – भेजें
व्यक्ति चरित्र से भ्रष्ट भले ही हो जाये, पर ज्ञान पूज्य होता है, जैसे आचार्य माघनन्दी जी चरित्र से भ्रष्ट हो गये थे, फिर भी मुनि महाराज उनसे समाधान करने उनके घर गये थे, इस निमित्त से उनका स्थितिकरण हो गया था, सोना गन्दे स्थान पर पड़ा हो तो भी मूल्यवान होता है। ज्ञान 0 – भेजें