Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 120

स्थितिकरण अङ्ग।

7 सूत्र

सम्यग्दर्शन से अथवा चारित्र से चलायमान होने वालों को धर्मात्माओं के द्वारा फिर से उसी में स्थापित करना बुद्धिमानों ने स्थितिकरण अङ्ग कहा है।
विवेक
हमेशा मार्दव आदि भावना के द्वारा आत्म धर्म की वृद्धि करनी चाहिये पर के दोषों को ढ़कना चाहिए इसे उपगूहन अङ्ग कहते हैं।
विवेक
काम, क्रोध, मद आदि के द्वारा मोक्ष मार्ग से स्वयं अथवा दूसरों के चलायमान होने पर श्रुत एवं युक्ति के द्वारा स्थितिकरण करना चाहिये, धर्म में स्थित करना अधर्म में नहीं, अज्ञानी जन धर्म...
विवेक
आत्मीय गुणों की वृद्धि करना ही इसका लक्षण है, आत्मशुद्धि में दुर्बलता नहीं आने देना उपबृह्रण अथवा उपगूहन है, आत्मा को रत्नत्रय भाव से च्युत नहीं होने देना ही उपबृह्रण है, इससे गुण श्रेणी रूप से निर्जरा होती है। जिनेन्द्रभक्त सेठ की तरह, निन्दा उसी के कान में करें और प्रशंसा माइक से करें।
विवेक
उपगूहन अङ्ग पालन नहीं होने से नीच गोत्र का बन्ध एवं अशुभ नाम कर्म का बन्ध होता है।
कर्म
जो दूसरों के दोष देखने में जागृत हैं और अपने दोष देखने के लिए हाथी की तरह आँख बन्द किये हुए हैं, वे बेचारे जैन मत के योग्य ही नहीं हैं।
विवेक
अपनी आँखों की लालिमा स्वयं को नहीं दिखती है, स्वयं के दोष भी स्वयं को नहीं दिखते हैं, इसलिए दूसरा बताता है तो सुधारना चाहिए, नाराज नहीं होना चाहिए, अशुभ सूचना सुनकर नाराज होना फ़ोन फेंकने के सामान है।
क्षमा