Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 111

इत्र, मित्र, चरित्र, पवित्र।

9 सूत्र

मैं अन्धेरी रातों में बेधड़क चलता हूँ। बुद्धि- मैं प्रकाश में भटक जाती हूँ। श्रद्धा- मैं पाषाण को भगवान् बना देती हूँ। तर्क- मैं भगवान को पाषाण बना देता हूँ।
भक्ति
साईकिल चलाना आता नहीं और ढलान में बैठ गए तो हाथ-पैर टूटेंगे और गिरने के भय से बैठेंगे ही नहीं तो सीख नहीं पायेंगे, विना सीखे पानी में कूदेंगे तो डूबेंगे और डूबने के भय से पानी में उतरेंगे ही नहीं तो सीखेंगे कैसे? इसी प्रकार योग्य गुरु से शिक्षा दीक्षा लेकर रत्नत्रय की आराधना करना चाहिए।
पुरुषार्थ
बेटी से माँ कहती है, तुम काम मत करो, ससुराल से थककर आई हो। बेटी कितना भी खाये, माँ यही कहेगी, बेटी कुछ खाती ही नहीं, वही माँ बहु के लिये कहती है न जाने कहाँ से आयी राक्षसी खाती है ढेर सारा, काम कुछ नहीं करती। बहु को उदार दृष्टि से देखें और अवगुणों को भी गुण समझें, सम्यग्दृष्टि सास वही है जो बहु-बेटी दोनों को समान देखे, सम्यग्दृष्टि बहु वह है जो माँ और सास को एक जैसा देखे।
परिवार
मिथ्यात्व पागल बना देता है, अनन्तानुबन्धी स्वगृह में प्रवेश नहीं करने देती है।
विवेक
मोह को निद्रा की उपमा दी है जैसे स्त्यानगृद्धि निद्रा में व्यक्ति बड़े-बड़े काम कर लेता है पर उसे खुद होश नहीं रहता मैं क्या कर रहा हूँ अथवा शराबी की चेष्टाओं के तुल्य मिथ्यादृष्टि की चेष्टाएँ होती है।
विवेक
करोड़पति बाप का बेटा करोड़ रुपये का भान न होने से रोड़पति बना रिक्शा चला रहा था, पिता के मित्र से पता चलते ही रिक्शा वहीं छोड़ देता है, उसी प्रकार संसारी प्राणी को आत्मा की भगवत्ता पता न होने से विषय कषाय में सुख खोज रहा है। सम्यग्दृष्टि होते ही विषय-कषाय से विरक्त हो जाता है।
विवेक
जिनेन्द्र देव की पूजा शान से नही भक्ति से होती है, भक्ति के लिए शान्ति की आवश्यकता होती है।
भक्ति
अज्ञानी जीव धतूरे में इत्र, वैश्या में चरित्र, दुर्दिन में मित्र और पापी हृदय में पवित्रता संसार में सुख खोजने में लगा है।
विवेक
प्रयत्न पूर्वक शरीर का एक-एक कण तपश्चरण में लगा करके, जीवन का एक-एक क्षण ज्ञान की साधना में अर्पण करके मानव जीवन को वरदान सिद्ध करना चाहिए अतः देव-शास्त्र-गुरु की निंदा नहीं विनय करके सम्यग्दर्शन की रक्षा करना चाहिए क्योंकि सम्यग्दर्शन लोक की सम्पत्ति से श्रेष्ठ है।
विवेक