Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 16

लड़के व्यसन में-परिवार टेंशन में

258 सूत्र · पृष्ठ 5 / 5

वैराग्य के बिना चारित्र विधवा स्त्री के शृंगार के समान है।
अनासक्ति
गुप्ति, समिति, परीषहजय चारित्र की रक्षा करने वाली भावनाएँ हैं।
संयम
यदि धन नष्ट हुआ तो कुछ नहीं हुआ, यदि स्वास्थ्य नष्ट हुआ तो कुछ नष्ट हुआ, यदि...
चरित्र
जो लोग अपने कर्त्तव्य को जानते हैं और अपनी योग्यता बढ़ाना चाहते हैं, उनकी दृष्टि में सभी अच्छे कार्य कर्तव्य स्वरूप हैं।
चरित्र
सार्वजनिक प्रेम, सलज्जता का भाव, सबके प्रति सद्व्यवहार, दूसरों के दोषों को ढाँकना और सत्य प्रियता ये पाँच भाव शुभाचरण रूपी भवन के आधारस्तम्भ हैं।
चरित्र
योग्यता की कसौटी क्या है? यही कि दूसरों में जो बड़प्पन और श्रेय है, उसे स्वीकार कर लिया जाये; फिर चाहे वह श्रेष्ठता ऐसे ही लोगों में क्यों न हो, जो कि तुम से अन्य बातों में हीन हों।
विनम्रता
योग्य पुरुष की योग्यता तब किस काम की, जबकि वह अपने को क्षति पहुँचाने वालों के साथ भी सद्व्यवहार नहीं करता है।
चरित्र
करुणा, बुद्धि और शुभ संस्कारों के मेल से ही मनुष्य में प्रसन्नता उत्पन्न होती है।
चरित्र
जो लोग न्याय, निष्ठा और धर्म पालन के द्वारा अपना और दूसरों का भला करते हैं; संसार उनके स्वभाव का बड़ा आदर करता है।
धर्म
हास-परिहास में भी कटुवचन मनुष्य के मन में लग जाते हैं इसलिए सुपात्र पुरुष अपने वैरियों के साथ भी असभ्यता से नहीं बोलते हैं।
वाणी
रेती तीक्ष्ण भी हो पर वह युद्ध में लाठी से बढ़कर नहीं हो सकती है इसी प्रकार आचरण हीन मनुष्य विद्वान् भी हो फिर भी वह सदाचारी से बढ़कर नहीं होता है।
चरित्र
जो लोग धन उपार्जन के लिए सदा हाय-हाय करते फिरते हैं पर यश प्राप्त करने की परवाह नहीं करते उनका अस्तित्व पृथ्वी के लिए केवल भार स्वरूप है।
धन
योग्य पुरुषों का लजाना उन कामों के लिए होता है जो उनके अयोग्य होते हैं इसलिए वह सुन्दर स्त्रियों की लज्जा से सर्वथा भिन्न है।
चरित्र
आहार, वस्त्र और सन्तान इन बातों में तो सभी मनुष्य समान हैं, यह तो एक लज्जा की ही भावना है जिससे मनुष्य में पात्रता और योग्यता वास करती है।
चरित्र
लज्जाशीलता क्या सत्पात्रों के लिए रत्न के समान नहीं? और जब वे उससे रहित होते हैं तब उनकी शेखी और श्रेष्ठता क्या देखने वाली आँखों को पीड़ा पहुँचाने वाली नहीं होती है?
चरित्र
जो लोग दूसरों का अपमान देखकर भी उतने ही लज्जित होते हैं, जितना कि स्वयं अपने अपमान से उन्हें लज्जा आती है वे ही लोग लज्जा और संकोच की मूर्ति कहलाते हैं।
चरित्र
ऐसे साधनों के सिवाय कि जिनसे उन्हें लज्जित न होना पड़े, अन्य साधनों के द्वारा योग्य व्यक्ति राज्य तक पाने के लिए मना कर देते हैं।
चरित्र
निर्दयी लोग जीवित होकर भी मरे के समान हैं, डोरी के द्वारा चलने वाली कठपुतलियों की तरह उनमें भी एक प्रकार का कृत्रिम जीवन ही होता है।
चरित्र