Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
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परिवार

320 सूत्र · पृष्ठ 2 / 5

बच्चों को बदलना हो तो स्वयं को बदलना जरूरी है।
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बच्चों को धनवान नहीं संस्कारवान बनायें क्योंकि संस्कार से ही संस्कृति का रक्षण हो सकता है।
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यदि आप अपनी सन्तान को महावीर या राम बनाना चाहते हैं, तो पहले आपको भी सिद्धार्थ और दशरथ बनना होगा।
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बच्चों की शिक्षा माँ के पेट से ही शुरू होती है।
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रूढ़िवादी लोग धार्मिक शिक्षा के अभाव में अपना अज्ञान, अपना अंधविश्वास, अपने रोग और अपनी शत्रुताएँ सन्तान को दे रहे हैं।
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माँ सिर्फ जन्मदाता ही नहीं बल्कि जीवनदाता भी होती है क्योंकि जन्म तो जंगली गधे भी देते हैं पर वे सुसंस्कारित जीवन नहीं दे पाते हैं।
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बच्चों का भविष्य माता-पिता के हाथ में होता है।
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घर में प्रेम होना पृथ्वी पर स्वर्ग के समान है।
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गृहस्थ का घर भी एक तपोभूमि है। सहनशीलता और संयम को खोकर कोई गृहस्थी में सुखी नहीं रह सकता है।
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बच्चे वह ज्यादा सीखते हैं जो आप करते हैं बजाय उसके जो आप सिखाते हैं।
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आज गुरु को छोड़कर शिष्य, माता-पिता को छोड़कर बेटा-बेटी क्यों भाग रहे हैं? क्योंकि जन्म तो दिया पर संस्कार नहीं दिये हैं।
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इंसान की जिन्दगी के हार जीत का फैसला उसकी सन्तान करती है, अगर संस्कारित और कमाऊ संतान है तो जीत है अगर आवारा बेकार है तो करोड़ों की कमाई हुई पूँजी होते हुए भी हार है। आने वाली पीढ़ी को महावीर के चित्र ही नहीं चारित्र भी सौंपने होंगे क्योंकि चित्र से चित्त और चारित्र से जीवन पवित्र होता है।
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शादी के बाद बेटे की बुद्धि बिगड़ जाती है अतः भविष्य की सोचकर अपने बुढ़ापे के लिए कुछ बचाकर रखिए।
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अपनी संतानों में माँ ही संस्कार के बीज डालती है और पिता उन संस्कारों का संरक्षण व संवर्द्धन करते हैं।
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संस्कृति की सुरक्षा संस्कारित संतानों पर ही निर्भर है।
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माँ रोती थी जब रोटी नहीं खाता था बेटा, माँ आज भी रोती है जब रोटी नहीं खिलाता है बेटा।
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बूढ़े माँ-बाप दौलत नहीं कमाते पर दौलत व सन्तान की रक्षा अवश्य करते हैं।
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जो माँ बाप को स्वर्ग ले जाता है वो बेटा होता है, जो स्वर्ग को घर ले आए वो बेटी होती है और घर को ही स्वर्ग बना दे वो बहु होती है।
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रिश्ते चाहे कितने ही बुरे हों मगर उन्हें तोड़ना मत क्योंकि पानी चाहे कितना भी गंदा हो अगर प्यास नहीं बुझा सकता तो आग तो बुझा सकता है।
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अभिभावक अपने बच्चों को बहुमूल्य समय दें। पैसों से सब खुशियाँ खरीदना संभव नहीं है। बड़ी खुशियाँ पाने के लिए छोटे-छोटे बलिदान आवश्यक हैं।
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बच्चों के मित्र बनकर उन्हें मार्गदर्शन देवें उनसे दूरी बनाकर न रखें।
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बच्चा ८वीं कक्षा में आये तो कुछ वर्षों के लिए आप गरीब बन जायें।
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जब तक बच्चे स्वयं नहीं कमाते उन्हें पेट्रोल या मोबाइल पर खर्च करने का कोई अधिकार नहीं है।
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जब बच्चे मित्र बनाते हैं तो इस पर नजर रखें और समझाये कि ये रिश्ते अच्छी मित्रता तक ही सीमित रहें, जीवनसाथी का चयन जाति के अन्तर्गत ही हो।
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पिता पुत्र में मित्रता का माहौल बच्चों को अपने भविष्य निर्माण में अहम् भूमिका निभाता है। 'लक्ष्य को गुप्त रखकर दृढ़ रहिये।'
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अच्छा पुत्र वह नहीं जो माँ-बाप को अपने पास रखता है, बल्कि वह है जो खुद माँ-बाप के पास रहता है।
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हम परिवार में सिर्फ एक-दूसरे की कमियाँ ही न देखें वरन् उनकी खूबियाँ भी स्वीकार करें। परिवार का हर सदस्य मुखिया न बने बल्कि बुजुर्ग को ही मुखिया रहने दें लेकिन इस बात का ध्यान रहे कि मुखिया को हिटलर नहीं होना चाहिए।
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पिता के प्रति पुत्र का प्रत्युपकार लोगों से यह कहलाना ही है कि न मालूम इसके पिता ने ऐसे पुत्र की प्राप्ति के लिए कैसा तप किया था?
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फल रहित वृक्ष की छाया भी शीतल होती है, भाई गुण हीन भी अच्छा होता है, जो पराया है, वह तो पराया ही है।
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तुम्हारा घर जहाज का लंगर न बने, बल्कि मस्तूल बने।
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बालकों को लाड़ करने में दोष हैं और ताड़ना करने में बहुत गुण हैं अतः पुत्र और शिष्य की ताड़ना करते रहना चाहिए।
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पाँच वर्ष तक पुत्र को प्यार करना चाहिए, उसके बाद दस वर्ष तक पुत्र को दंड आदि देकर अच्छे मार्ग पर चलने को प्रेरित करना चाहिए और सोलह वर्ष के बाद पुत्र को मित्र की भाँति व्यवहार करना चाहिए।
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जिस प्रकार एक सूखे पेड़ को आग लगा दी जाये तो वह पूरा जंगल जला देता है, इसी प्रकार एक पापी पुत्र पूरे परिवार को बर्बाद कर देता है।
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माँ, महात्मा, परमात्मा की तिजोरी की भाँति स्वयं रक्षा करना चाहिए अपनी तथा घर की रक्षा चौकीदार कर सकता है।
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आपका घर बहुत बड़ा हो आवश्यक नहीं, लेकिन उस घर में आपके जरूरत की प्रत्येक चीज उपलब्ध हो और हर चीज सही जगह पर रखी हो यह आवश्यक है और सर्व सुविधा युक्त जगह में हो जो शान्ति सुकून दे सके।
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किसी ने पूजा की और किसी ने उपवास रखा, हमने कुछ नहीं किया बस माँ-बाप को अपने पास रखा है।
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आप दुनिया के लिए एक व्यक्ति हैं पर परिवार के लिए पूरी दुनिया आप ही हैं, अतः परिवार का ख्याल रखें।
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बैठना भाईयों के बीच चाहे वैर हो, खाना माँ से चाहे जहर हो।
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माता-पिता के मुख से निकला आशीर्वाद जन्म-जन्मान्तर तक रक्षा करता है।
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अगर इंसान शिक्षा के पहले संस्कार, व्यापार के पहले व्यवहार, भगवान् से पहले माता-पिता को पहचान ले तो जिन्दगी में कोई कठिनाई न आये।
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घर तो मधुमक्खियों का स्थान है, यदि छत्ते से एक मक्खी टूटी तो फिर सब गिरती हैं।
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जिस घर में उल्लू या कबूतर आने लगें, तो वह घर रहने के लायक नहीं रहता है क्योंकि उन उल्लू कबूतर जैसे परिणाम घर वालों के होने लगते हैं।
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भगवान् सबके घर जाकर प्रेम नहीं दे सकता इसलिए उसने माँ बनाई, इसी तरह सबके घर जाकर सजा नहीं दे सकता इसलिए पत्नि बनाई है।
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पिता की मौजूदगी सूरज की तरह होती है, सूरज गर्म जरूर होता है अगर न हो तो अँधेरा छा जाता है।
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तीर्थंकर भगवान् ने अपनी माँ के १६ स्वप्न साकार कर दिये तो आप माँ-बाप का एक स्वप्न पूरा करो बुढ़ापे में उनकी सेवाकर उनके ऋण से मुक्त हो जाओ।
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मंजिल मिल ही जायेगी भटकते हुए ही सही, गुमराह तो वो होते हैं जो घर से निकलते ही नहीं हैं। आज रोटी के पीछे भागता हूँ तो याद आता है कि मुझे एक रोटी खिलाने के लिए माँ मेरे पीछे भागती थी।
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बूढ़े माँ-बाप की आँखें घर का वैभव नहीं पारिवारिक एकता देखकर खुश होती हैं।
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जीवन में ज्यादा रिश्ते होना जरूरी नहीं, पर जो रिश्ते हैं उनमें जीवन होना जरूरी है। 'याद करने से रिश्ते मजबूत हो जाते हैं।'
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कभी उसको नजर अन्दाज ना करो, जो आपकी बहुत परवाह करता हो, वरना आपको किसी दिन एहसास होगा कि पत्थर जमा करते-करते आपने हीरे को गँवा दिया है।
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आपकी सोच देखो–बेटी ससुराल में खुश है तो आप खुश होते हैं और बहु ससुराल में खुश है तो आपको खराब लगता है, दामाद बेटी की मदद करें तो आपको अच्छा लगता है और बेटा बहु की मदद करें तो जोरू का गुलाम कहा जाता है, बेटी जींस पहने तो खुश होते हैं कि मॉडर्न फैमिली है और बहु जींस पहने तो उसे बेशर्म कहते हैं, बेटी के ससुराल में अकेले काम करना पड़े तो सास खराब है कि मेरी बेटी थक जायेगी और बहू सारा दिन अकेले काम करे फिर भी कामचोर है, बेटी की सास और ननद काम न करे तो गुस्सा आता है और सब अपने घर में बहू की मदद न करे तो सही लगता है, बेटी की ससुराल वाले ताना मारे तो अच्छा नहीं लगता, स्वयं बहू को ताना मारो तो सही लगता है, बेटी को रानी बनाकर रखने वाली ससुराल चाहिए और स्वयं को बहू काम वाली चाहिए, लोग यह क्यों भूल जाते है कि बहू भी किसी के घर की बेटी है, वो भी तो अपने माता-पिता भाई-बहन दोस्तों को छोड़कर आयी है आपके साथ नया जीवन शुरू कर रही है।
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गुरु को विनय, प्रशंसा और सेवा से, प्रभु को भक्ति अथवा ध्यान से, लोभी को धन से, बच्चों को प्रेम से, बड़ों को विनय और सम्मान से, पत्नि को प्रशंसा से, पति को समर्पण से, माँ-बाप को सेवा से वश में किया जाता है।
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प्यार और विश्वास कभी मत खोना क्योंकि प्यार हर किसी से नहीं होता और विश्वास हर किसी पे नहीं होता है।
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यह सच है कि किस्मत और फ्नी भले ही परेशान करती है लेकिन जब साथ देती है तो जिन्दगी बदल देती है।
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जहाँ बात-बात पर सफाई देनी पढ़े वे रिश्ते कभी गहरे नहीं होते हैं।
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एक दिन हम सब एक दूसरे को सिर्फ यही सोचकर खों देंगे कि वो हमें याद नहीं करते तब हम उन्हें याद क्यों करें।
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जो जैसा है उसे वैसा ही अपना लो रिश्ते निभाना आसान हो जायेगा।
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रिश्ते भी अब हो गये ज्यों दैनिक अखबार, आज पढ़ लिया प्रेम से कल फिर बेकार।
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रिश्ते, आज रोटी की तरह हो गये जरा सी आँच तेज क्या हुई कि जल भुनकर खाक हो जाते हैं।
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जिन्दगी के पाँच सच—१. माँ के सिवा कोई वफादार नहीं। २. गरीब का कोई मित्र नहीं। ३. लोग अच्छी सीरत (स्वास्थ्य) को नहीं अच्छी सूरत को महत्त्व देते हैं। ४. इज्जत सिर्फ पैसे की है इंसान की नहीं। ५. इंसान जिस व्यक्ति को दिल से चाहता है वो ही व्यक्ति दुःख देता है।
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'सुख' आपको उतना मिलेगा जितना आपने पुण्य किया है, लेकिन शान्ति उतनी मिलेगी जितनी आप की घर वाली चाहेगी।
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कोई अच्छा 'इंजीनियर' मिले तो बताना मुझे इंसान को इंसान से जोड़ने वाला पुल बनवाना है, बहते आँसुओं को रोकने वाला बांध बनवाना है और सच्चे सम्बन्धों में पड़ती दरारों को भरवाना है।
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लोग अब व्यवहारिक नहीं व्यवसायिक हो गये हैं अतः सम्बन्ध उनसे ही मधुर होते हैं जिनसे 'मुनाफा' ज्यादा मिलता है।
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एक सिक्का हो तो आवाज नहीं आती जैसे ही दो हुए कि ऐसे ही घर में दो हुए कि महाभारत शुरू हो जाती है।
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यह सच है कि अनाथाश्रम में बच्चे गरीबों के मिलते हैं और वृद्धाश्रम में बुजुर्ग अमीरों के मिलते हैं।
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ऐसे माता-पिता शत्रु के समान हैं, जो अपनी संतान को पढ़ाते नहीं, उनको शिक्षित व संस्कारित नहीं करते।
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सुंदरता मनोभावों पर निर्भर करती है, माता अपने कुरूप बालक को भी सुन्दर समझती है।
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भोजन पुत्रों के साथ, बैठक मित्रों के साथ, आत्मा शास्त्रों के साथ और घर बन्धुजनों के साथ हो तो उत्तम है।
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सास को बहू की जवानी और बहू को सास का बुढ़ापा नहीं दिखता इसलिए विवाद होता है।
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संसार में किसी मनुष्य के तो स्त्री नहीं है, किसी के यदि है तो पुत्र नहीं है, किसी के पुत्र है तो शरीर रोगी है, यदि किसी के शरीर निरोग भी है तो धन धान्य नहीं है, यदि धन-धान्य भी है तो किसी की स्त्री दुराचारिणी है, किसी का पति जुआ आदि दुर्व्यसनों में रत है, किसी के दुर्योधन के समान कलह करने वाले भाई हैं, किसी की पुत्री दुराचारिणी है, किसी के पति का जवानी में शीघ्र ही मरण हो जाता है, अतः कह सकते हैं कि संसार में कोई भी व्यक्ति पूर्ण सुखी नहीं है।
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एक माँ अपने बेटे को मनुष्य बनाने में २० साल लगा देती हैं, लेकिन उसी बेटे को मूर्ख बनाने के लिए पत्नी को २० मिनट भी नहीं लगते हैं।
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भागकर माँ-बाप की मर्जी के बिना शादी करने वालों के दिल से भगवान् भी भाग जाते हैं, जिससे उसके भाग्य फूट जाते हैं क्योंकि जिसने जन्म देने वाले अपने माँ-बाप की बात नहीं मानी उसकी फिर परमात्मा भी बात नहीं मानता है।
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कन्या का पैदा होते ही मर जाना उत्तम है परन्तु उसका नीच कुल वाले वर के साथ विवाह करना अच्छा नहीं है।
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गृह के कार्यों में लगाए रखना, सीमित धन देना, अधिक स्वछन्द न होने देना, नीति व सदाचार की शिक्षा देते रहना और बड़ी वृद्ध स्त्रियों के मध्य रोके रहना अर्थात् अन्यत्र न जाने देना आदि ये सब कुल वधुओं की सुरक्षा के उपाय हैं।
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आप घर में बहु लाना बहुरानी नहीं क्योंकि यदि बहु आयेगी तो घर को स्वर्ग बनाएगी और यदि बहुरानी आएगी तो सासू को नौकरानी और ससुर को स्वर्गीय बनाएगी।
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यदि लड़का कहना न माने तो परेशान मत होना बस उससे अपनापन छोड़ देना, सब चिन्ताएँ खत्म हो जायेंगी जैसे शरीर में जूँ पैदा हो जाती है तो उसे आप अपना नहीं मानते, इसी प्रकार बेटा पैदा हो गया है क्योंकि जो कहना न माने वह अपना कैसा?
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