Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 66

पानी छानने की क्या आवश्यकता है ?

24 सूत्र

दया से परिपूर्ण हृदय वाला जो गृहस्थ छने हुए जल से सब कार्य करता है वह मोक्ष को प्राप्त होता है।
अहिंसा
सत्पुरुषों ने जैनधर्म के नीति मार्ग में ऐसा ही कहा है कि पानी का छानना धर्म है, जैनियों का यह धर्म तीनों लोकों में प्रसिद्ध है।
अहिंसा
जिनेन्द्र भगवान ने पृथ्वी पर जीव दया की सिद्धि के लिए सघन वस्त्र से पानी छानने को पुण्य कहा है।
अहिंसा
अन्धकार के समूह से जिसके नेत्र आच्छादित हो रहे हैं, तथा पाप में जिसकी बुद्धि लग रही है, ऐसा पापी जीव मक्खी, कीड़े तथा बाल आदि को खा जाता है।
आहार
जो रात्रिभोजन करता है, वह डाकिनी-शाकिनी तथा भूत-प्रेतादि निन्द्य प्राणियों के साथ खाता है।
आहार
जो रात्रि में खाता है उसने कुत्ता, चूहा, बिल्ली आदि मांसाहारी जीवों के साथ खाया, अथवा व्यर्थ के विस्तार से क्या? इतना ही कहा जाता है, कि रात्रि में खाने वाले ने सब अपवित्र पदार्थ खाये, रात्रि में दीपकों के ऊपर जो चींटी आदि जीव पड़ते हैं, रात्रि में खाने वाले पुरुष ग्रासों के साथ उन्हें भी निगल जाते हैं।
आहार
जिन लोगों ने रात्रिभोजन रूप अधर्म को धर्म मान रखा है, उन पापकर्म से क्रूर मनुष्यों को समझाना कठिन है।
आहार
सूर्य की किरणों से अछूता भोजन प्रेतों के समूह से जूठा हो जाता है, तथा सूक्ष्म जीवों से युक्त होता है, अत: रात्रि में खाना उचित नहीं है।
आहार
जो रात-दिन खाता है ''वह जिनधर्म से विमुख'', व्रतरहित व नियम से दूर है, ऐसा मनुष्य पर भव में सुखी कैसे हो सकता है?
आहार
रात्रिभोजन के लोभी मनुष्य परभव में तिर्यञ्च तथा नरकादि गतियों में अन्धे, बौने, अत्यन्त विकलाङ्ग, अल्पायु, शोक, क्लेश, विषाद तथा दुःख से परिपूर्ण, कोढ़ आदि रोगों से सहित, दरिद्रता से पीड़ित अत्यन्त चञ्चल और अल्प आदर वाले नियम से होते हैं।
आहार
रात्रि में अन्न के बर्तन तथा अग्नि आदि में अनेक जीव पड़ते हैं, जिससे मांस खाने का दोष तथा हिंसा होती है, अत: रात्रिभोजन छोड़ने के योग्य है।
आहार
जैनधर्म में निपुण तथा दयालु मनुष्यों को पानी छानने की शुभ क्रिया में प्रमाद नहीं करना चाहिए।
अहिंसा
जो छनाजल पीते हैं वे भव्य एवं बुद्धिमान है, विना छना जल पीने वाले पाप से विकल हृदय पुरुष पशु तुल्य हैं।
अहिंसा
छने, निर्मल, णमोकार मन्त्र से पवित्र किये हुए जल से जिनपूजा के लिए विधि पूर्वक प्रतिदिन स्नान करना चाहिए।
अहिंसा
स्त्री समागम, आहार, मल विसर्जन तथा आरम्भादि में लीन रहने वाला और अशुद्ध वस्तुओं को स्पर्श करने वाला गृहस्थ स्नान कर तथा धुले हुए पवित्र वस्त्र धारण कर ही जिनपूजा करें।
धर्म
पूजा के लिए स्नान करने से जीवघात होता है, ऐसा जो कहता है वह पसीना आदि मल को दूर करने के लिए स्नान करता हुआ लज्जित क्यों नहीं होता है?
धर्म
नदियों और तालाबों का जो गहरा पानी, वायु तथा घाम से अच्छी तरह प्रासुक है, उस जल में प्रवेश कर स्नान के योग्य कहीं-कहीं माना गया है।
अहिंसा
वायु से ताड़ित, पत्थर तथा घटीयन्त्र से ताड़ित एवं सूर्य की किरणों से सन्तप्त वापिका के जल को मुनि प्रासुक मानते हैं, यद्यपि उपर्युक्त लक्षण वाला जल आगम में प्रासुक कहा गया है तथापि अत्यावश्यकता वश उससे स्नान ही करना चाहिए, उसे विना छाने पीना नहीं चाहिए।
अहिंसा
जो वस्त्र छत्तीस अङ्गुल लम्बा और चौबीस अङ्गुल चौड़ा है, उसे दुहरा कर पानी छानना चाहिए।
अहिंसा
वस्त्र के मध्य आये हुए जीवों को जल के मध्य में छोड़(जीवानी) कर जो पानी पीता है वह उत्कृष्ट गति को प्राप्त होता है।
अहिंसा
छना हुआ पानी एक मुहूर्त(48मिनिट) तक, प्रासुक दो पहर(6 घण्टे) तक और अत्यधिक गर्म किया हुआ पानी दिन-रात अर्थात् चौबीस घण्टे तक चलता है, पश्चात् उसमें सम्मूर्छन जीव उत्पन्न हो जाते हैं।
अहिंसा
एक मुहूर्त के बाद पानी को फिर से नहीं छानना, अथवा सछिद्र या मलिन वस्त्र से छानना और जीवानी को अन्य जलाशय में डालना, जलगालन व्रत में योग्य नहीं माना गया है।
अहिंसा
इस प्रकार जो सदा पानी छानने में यत्न करते हैं, वे धर्मस्नेही भव्य जीव निरन्तर सुखी रहते हैं।
अहिंसा
जिस जलाशय से यत्न पूर्वक छानकर जल लाया गया है, ज्ञानी पुरुष जिवानी को उसी जलाशय में डालें।
अहिंसा