Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 65

रात्रि में भोजन क्यों नहीं करना चाहिये ?

24 सूत्र

नरक के चार द्वार हैं रात्रिभोजन, परस्त्रीगमन, अचार भक्षण और जमीकन्द भक्षण।
आहार
सूर्य के अस्त हो जाने पर पानी खून कहलाता है एवं अन्न को वैष्णव मार्कण्डेय महर्षि ने मांस के समान कहा है।
आहार
चातुर्मास में जो रात्रि में भोजन करता है उसकी चन्द्रायण व्रत अर्थात् कृष्ण पक्ष के चन्द्रमा की कलाओं के समान एक-एक ग्रास घटाना और शुक्ल पक्ष के चन्द्रमा की कलाओं के समान एक-एक ग्रास को बढ़ाना एक चन्द्रायण व्रत कहलाता है ऐंसे सैकड़ों व्रत करने से भी शुद्धि नहीं हो सकती है।
आहार
भोजन के साथ पेट में मक्खी जाने से उलटी होती है, चींटी जाने से पेशाब में जलन होती है, बाल जाने से स्वर भंग होता है, जुंआ-लीख जाने से जलोदर रोग होता है, मकड़ी जाने से कोढ़ होता है, छिपकली जाने से मृत्यु होती है, इसलिए भोजन में सूर्य का प्रकाश विवेक और शोधन क्रिया आवश्यक है।
आहार
अहिंसा व्रत की रक्षा व मूलगुण की शुद्धि के लिए धीरपुरुष मन-वचन-काय से रात्रि में चारों प्रकार के आहार का त्याग करें।
आहार
जो स्वभाव से रात्रिभोजन का त्याग करता है, वह अपने कुल के आभूषणपने को व तीन जगत के स्वामियों की सम्पदा को प्राप्त होता है।
आहार
रत्नत्रय से परिपूर्ण तथा अणुव्रतों को धारण करने में तत्पर भव्य जीव सूर्योदय के रहते दोष रहित भोजन करते हैं।
आहार
जो दयालु पुरुष रात्रि में भोजन नहीं करते, वे वैमानिक देव होते हैं और वहाँ उत्कृष्ट भोगों को प्राप्त करते हैं और स्वर्ग से आकर प्रशंसनीय मनुष्य पर्याय प्राप्त कर चक्रवर्ती आदि के वैभव से प्राप्त सुख का उपभोग करते हैं।
आहार
जगत् में जो धनवान, गुणों से उदार, सुन्दर, दीर्घायु, सम्यग्ज्ञान से सहित और प्रधान पद पर स्थित हैं वे सब दिन में भोजन करने से हुए हैं।
आहार
जो दिन में भोजन करते हैं, वे सूर्य के समान प्रभा वाले, चन्द्रमा के सामान सौम्यदर्शन तथा स्थायी भोगों से युक्त होते हैं।
आहार
दिन में भोजन करने से मनुष्य संसार में उत्कृष्ट प्रताप से युक्त, नगरों के स्वामी, नाना प्रकार के वाहनों से सहित, सामन्तों से पूजित, भवनवासी देव, वैमानिक देव, चक्रवर्ती के वैभव से सहित और उत्कृष्ट लक्षणों से सम्पन्न होते हैं।
आहार
दिन में भोजन करने से मनुष्य उन नगरियों में ऐसे विद्याधर राजा होते हैं, जो कलाओं में निपुण हैं, जिनके शरीर, नेत्र और हृदय में स्नेह उत्पन्न करने वाले हैं, जो अमृत झराने वाली वाणी से समस्त जगत् को आह्लादित करते हैं तथा उत्साह से युक्त होते हैं, दिन में भोजन करने से मनुष्य नारायण, बलदेव, चक्रवर्ती, बिजली और लाल कमल के समान कान्ति वाले देदीप्यमान सुन्दर कुण्डलों से युक्त एवं राजाओं से सम्बन्ध करने वाले होते हैं।
आहार
दया में तत्पर रहने वाले जो लोग रात्रि में भोजन नहीं करते हैं उन्हें सेवकों के द्वारा तैयार किया हुआ इच्छानुकूल भोजन प्राप्त होता है।
आहार
जो लोग रात्रिभोजन से दूर रहते हैं, वे शान्त हृदय, ब्रह्मचर्य सहित तथा साधु समूह के लिए हितकारी होते हैं।
आहार
दिन में भोजन करने से स्त्रियाँ श्रीकान्ता, सुप्रभा तथा सुभद्रा के समान लक्ष्मी तुल्य कान्ति वाली होती हैं।
आहार
जिन्होंने पहले रात्रि भोजन का त्याग किया था वे स्त्रियाँ यान तथा हाथी आदि वाहनों पर लीलापूर्वक गमन करती हैं और सुन्दर भवनों में निवास करती हैं, वे स्त्रियाँ स्वर्ग में इच्छानुकूल भोग को प्राप्त होती हैं, तथा मस्तक पर हाथ रख आज्ञा की प्रतीक्षा करने वाले परिवार से घिरी रहती हैं।
आहार
जिन पुरुषों ने पहले रात्रिभोजन का त्याग किया है, वे सुरीली आवाज वाले, निर्मल शरीर से युक्त तथा सुन्दर वस्त्राभूषणों से सहित मनुष्य होते हैं, इस लोक में जो सुन्दर राजा दिखाई देते हैं, वह सब निःसन्देह रात्रिभोजन त्याग का ही फल है।
आहार
जो मनुष्य सूर्यास्त हो जाने पर भोजन करते हैं, वे विद्वानों के द्वारा मनुष्यता से युक्त पशु कहे गये हैं।
आहार
जो रात्रि में भोजन करता है, वह अल्पआयु, अल्पधन से युक्त, रोग से पीड़ित और परभव में सुख से हीन होता है।
आहार
जो दुर्बुद्धि रात्रि में भोजन करता है, वह हजारों उत्सर्पिणी-अवसर्पिणी काल तक खोटी योनियों में दुःख को प्राप्त होता है।
आहार
रात्रि में भोजन करने से पुरुष स्त्री वेद को प्राप्त होते हैं, और वे स्त्रियाँ अनाथ, सौभाग्यहीन, माता-पिता तथा भाई से रहित, शोक एवं दरिद्रता से युक्त होती हैं, जिनके हाथ-पैर आदि अङ्ग रूक्ष तथा फटे हुए हैं, जिनकी नाक चपटी है, जिनका देखना ग्लानि को उत्पन्न करता है, जिनके नेत्र कीचड़ से भरे हैं, जिनके लक्षण दुष्ट हैं, जिनके शरीर से दुर्गन्ध आती है, जिनके होठ कटे तथा मोटे हैं, जिनके कान विरूप हैं, जिनके केश पीले तथा रूक्ष हैं, जिनके दाँत तूमड़ी के बीज के समान हैं, शरीर सूखा है, जो कानी, लंगड़ी और कान्ति रहित हैं, विरूप हैं, कठोर चमड़ी वाली हैं, अनेक रोगों से सहित हैं, मलिन हैं, फटे वस्त्र वाली हैं, खराब भोजन से जीवित हैं, दूसरों के कार्य पर आश्रित हैं, दुःखों के भार से दबी हुई हैं, बाल्यावस्था में ही पति के मरण के दुःख से दुःखी हैं, पानी भरती हैं, लकड़ियाँ ढोती हैं, बड़े दुःख से पेट भर पाती हैं, सब लोगों से तिरस्कृत हैं, कुवचन रूप वसूला से जिनका मन नष्ट हो गया है, तथा शरीर सैकड़ों घावों का आधार है, ऐसी स्त्रियाँ रात्रिभोजन करने से ही होती हैं।
आहार
रात्रिभोजन में तत्पर लोग कटेकान, कटीनासिका, धन तथा बन्धुओं से रहित पति को प्राप्त होते हैं, जो रूक्ष शरीर वाले दास दासी आदि हैं, जो पुत्र, पत्नि और पति आदि से रहित हैं और जो दुर्भाग्य रूपी ग्रह से ग्रस्त हैं, वे रात्रिभोजन से ही होते हैं।
आहार
रात्रिभोजन के पाप से जीव दुर्गति को प्राप्त होते हैं, लोक में जो रोगी, दरिद्र और क्रूर पुरुष दिखाई देते हैं, वे भी रात्रिभोजन के पाप से दिखाई देते हैं, जिनके हाथ-पैर फटे हैं, जो दीन हैं, लकड़ी और घास ढोते हैं, मलिन वस्त्र वाले हैं तथा नीच कुल में उत्पन्न हैं, वे सब रात्रिभोजन करने से ही होते हैं, रात्रिभोजन के फल से मनुष्य रोग से पीड़ित, दूसरों के घरेलू नौकर तथा अपने बन्धुजनों से रहित होते हैं, रात्रि में भोजन करने वाला मिथ्यादृष्टि मनुष्य सूकर, भेड़िया, बिलाव, उल्लू तथा कौआ आदि की योनियों में उत्पन्न होता है।
आहार
भोजन की तीव्र लालसा रखने वाला जो पापी जीव सूर्य के अस्त हो जाने पर भी भोजन करता है, वह दुर्गति को नहीं जानता, यह नहीं समझता कि इस रात्रिभोजन के पाप से मुझे नरकादि
आहार