Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 63

सप्त व्यसन।

9 सूत्र

जुआ मांस और मदिरा वेश्या हिंसा चोरी जारी। सप्त व्यसन का सेवन करके करी नरक तैयारी।।
चरित्र
कफ काटन, वादी हरन, धातु हीन, तन छीन। लोहू को पानी करे, दो गुण अवगुण तीन।।
स्वास्थ्य
तकारतन नाशनं, मकारमति भ्रष्टकं। ककारकफ दायकं, अदन्ति ते मतिनाशकं।।
स्वास्थ्य
इच्छा झगड़ा ज्ञान अरु, विद्या निद्राहार। खुजली मैथुन अरु व्यसन, सेवन ते बढ़ जाय।।
संयम
'जुँआ' से धर्म, लक्ष्मी, सद्बुद्धि, सुख, सत्य, सन्तोष, प्रतिष्ठा, निष्ठा, विश्वास और सद्गति ये दस वस्तुएँ नष्ट हो जाती हैं।
चरित्र
जुँआ- छोटा सा जुँआ सिर पर चढ़ जाये तो बैचेन होते हैं, यदि जुआ व्यसन शिर पर चढ जाये तो तन, मन, परिवार बैचेन होता है, जुआ हारने वाले को मृगमरीचिका की डोर में बाँध कर सर्वनाश के कगार पर लाता है, जीतने वाला लालच के मकड़जाल में फँसकर मारा जाता है, जुआ का खेल आग का खेल है, बर्बादी का अड्डा है, घर फूँककर देखा जाने वाला तमाशा है, देता कुछ है और लेता सब कुछ है, प्रलोभन का विष देता है और कुप्रवृत्तियों और विनाश को देता है।
चरित्र
'मांस' खाने वाला जीव भव-भव में अल्पायु, विकलाङ्ग, रोगी, नेत्र रहित, बहरा, दुर्जन, छोटे कद का, कोढ़ी और नपुंसक होता है।
आहार
कोई कहता है कि मांस जीव का शरीर है और फल-शाक आदि भी जीव का शरीर है, फिर मांस अखाद्य है और फल आदि खाद्य क्यों है? इसके उत्तर में कहा गया है कि मांस तो जीव का शरीर है पर जीव का शरीर मांस हो, ऐसा नियम नहीं है, त्रस जीव का शरीर मांस है पर स्थावर का शरीर मांस नहीं है, जैसे पिता पुरुष ही है पर सब पुरुष पिता नहीं होते हैं।
आहार
जो अन्न मात्र अग्नि पर पकाया गया है अथवा घी मिलाकर पकाया गया है, मांस भक्षण का त्यागी मनुष्य उस अन्न को बासी नहीं खावें, जहाँ मांस का दोष होने से बासा अन्न आदि भक्ष्य नहीं है वहाँ मदिरा, मुरब्बा तथा अचार आदि की कथा ही क्या है?
आहार